नाश से महाप्रलय तक — एक तात्त्विक यात्रा तारतम वाणी के आलोक में अंत, विलय और मुक्ति का विवेक
नाश से महाप्रलय तक — एक तात्त्विक यात्रा तारतम वाणी के आलोक में अंत, विलय और मुक्ति का विवेक प्रस्तावना मनुष्य के मन में सबसे गहरा भय एक ही है — अंत का भय। और उसी भय की जड़ में छिपा है एक और प्रश्न: यदि सब कुछ नष्ट हो जाता है, तो सत्य क्या है? मैं कौन हूँ? मेरा घर कहाँ है? श्री प्राणनाथजी ने तारतम वाणी में यही प्रश्न उठाया — “कौन तुम कहाँ ते आये, और कहाँ तुमारा घर। ए कौन भोम और कहाँ श्रीकृष्णजी, पाओगे कौन तर।।” — किरंतन १२/५ यह केवल दार्शनिक जिज्ञासा नहीं है। यह साधक की आत्मा की पुकार है। और इस पुकार का उत्तर तब तक नहीं मिलता, जब तक हम यह न समझें कि “अंत” के भी अनेक स्तर हैं — नाश, विनाश, विलय, लय, प्रलय और महाप्रलय। इन छः शब्दों में संपूर्ण सृष्टि-विज्ञान, आत्म-विज्ञान और मुक्ति-विज्ञान समाया हुआ है। एक — नाश : रूप का परिवर्तन, सत्ता का नहीं नाश सबसे स्थूल और व्यक्तिगत स्तर का अंत है। जब शरीर मृत्यु को प्राप्त होता है, जब कोई संबंध टूटता है, जब कोई वस्...