छिपी हुई पीड़ा से सत्यपूर्ण अभिव्यक्ति तक
छिपी हुई पीड़ा से सत्यपूर्ण अभिव्यक्ति तक: तारतम वाणी के प्रकाश में कई बार देखा जाता है कि सुन्दरसाथ भीतर शारीरिक या मानसिक पीड़ा होते हुए भी ठीक होने का दिखावा करते हैं। इस से होने वाले नुकसान को टालने हेतु यह लेख सभी सुन्दरसाथ के लाभार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ। इस लेख की मूल समस्या केवल चिकित्सा-व्यवस्था की नहीं, बल्कि भीतर बैठे भय, लोकलाज और स्वीकृति पाने की इच्छा की भी है। रोगी—विशेषकर महिलाएँ—कई बार डॉक्टर को नाराज़ करने, “कठिन रोगी” कहलाने या उपचार प्रभावित होने के डर से अपनी पीड़ा कम करके बताती हैं। तारतम वाणी की दृष्टि से यह प्रश्न सत्य, आत्मसम्मान, विवेक, दया और जागनी से जुड़ता है। लेकिन तारतम वाणी में दर्द की एक अत्यंत सूक्ष्म और पवित्र अभिव्यक्ति भी मिलती है—प्रियतम श्री राज जी के विरह का ऐसा अंतरंग दर्द, जिसे आशिक आत्मा संसार के सामने प्रकट नहीं कर पाती। इसलिए हमें आध्यात्मिक विरह की गोपनीयता और भयवश दबाई गई शारीरिक अथवा मानसिक पीड़ा के बीच का अंतर समझना आवश्यक है। विरह की मौन भाषा तारतम वाणी में आशिक आत्मा कहती है: मीठा गुझ मासूक का, काहूं आसिक कहे...