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जागनी: संतुलन, समग्रता और एकीकरण का जीवंत दर्शन

जागनी: संतुलन, समग्रता और एकीकरण का जीवंत दर्शन अब जाग देखो सुख जागनी, ए सुख सोहागिन जोग। तीन लीला चैथी घर की, इन चारों को यामें भोग।। कहे सुन्दरबाई अछरातीत से, खेल में आया साथ। दोए सुपन ए तीसरा, देखाया प्राणनाथ।। इन चौपाइयों में श्री सुन्दरबाई में अवतरित श्री श्यामा जी का भाव अत्यंत गूढ़ और प्रेरक है। संकेत यह है कि अक्षरातीत परमधाम से ब्रह्मात्माएँ इस तीसरे खेल— जागनी —में पधारी हैं। धामधनी श्री प्राणनाथ जी ने मूल मिलावे में बिठाकर पहले  कालमयिक व्रज लीला और  योगमायिक रास लीला  का अनुभव कराया, और अब  कालमाया में जागनी लीला  का दर्शन करा रहे हैं। "तीन लीला चैथी घर की" का तात्पर्य स्पष्ट है: साधक को सभी लीला-आयामों का संतुलित अनुभव करना है, किसी एक पर रुक जाना नहीं। एक आयाम पर ठहरने की सूक्ष्म भूल:  साधना के पथ पर एक सामान्य लेकिन गंभीर जोखिम है—किसी  एक अनुभव ,  एक विचार , या  एक आध्यात्मिक आयाम  को ही सम्पूर्ण सत्य मान लेना। जैसे ही यह होता है, अन्य सम्भावनाओं का नकार शुरू हो जाता है। यही असंतुलन का आरम्भ है। चेतना का स्वभाव विस्तार है...

आत्मा-विहीन धर्म:हमारे ध्रुवीकृत युग का दर्पण: महामति प्राणनाथ की सनंध अध्याय 40

आत्मा-विहीन धर्म:  हमारे ध्रुवीकृत युग का दर्पण: महामति प्राणनाथ की सनंध अध्याय 40 : ( युवाओं   का   पुनःकेंद्रण ,  समाज   की   सुरक्षा ,  और   विवेक   की   पुनर्स्थापना )   मैंने जीवनभर यह समझने का प्रयास किया है कि धर्म मानवता को कैसे जगाता है—और जब वह आत्मा से रिक्त हो जाता है तो कैसे उसे तोड़ देता है। इसी दृष्टि-स्थान से , आगे के ये चिंतन— महामति प्राणनाथ के सनंध अध्याय 40 , prophetic history ( नबियों/पैगम्बरों के ऐतिहासिक संदर्भ) और आज की समकालीन वास्तविकताओं के आलोक में—हमारे समुदाय , विशेषकर युवा पीढ़ी , के हित में प्रस्तुत किए जा रहे हैं।   1) हमारे समय का संकट: विवेक के स्थान पर भय धार्मिक ध्रुवीकरण ( religious polarization) के युग में महामति प्राणनाथ हमें स्मरण कराते हैं कि   धर्म का सच्चा उद्देश्य मानवता को बाँटना नहीं , बल्कि उसे जगाना है । सनंध प्रकरण 40 किसी धर्म विशेष पर आक्रमण नहीं है ; वह   आत्मा-विहीन धर्म   का अनावरण है। इसकी प्रासंगिकता कालातीत है। ...