प्रकृति और पदार्थ का समग्र दृष्टि से पुनर्विचार: “जड़” से “चेतन-अभिव्यक्ति…
प्रकृति और पदार्थ का समग्र दृष्टि से पुनर्विचार: “जड़” से “चेतन-अभिव्यक्ति” तक प्रस्तावना प्रकृति को “जड़” कहना भारतीय दार्शनिक परंपराओं में एक सामान्य अभिव्यक्ति रही है—विशेषतः जब हम पंचभौतिक, त्रिगुणात्मक, परिवर्तनशील संसार की बात करते हैं। परंतु यदि हम इसे एकीकृत दर्शन के प्रकाश में देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि “जड़” की यह धारणा आंशिक सत्य है, पूर्ण नहीं। एकीकृत दृष्टि हमें यह समझने में सहायता करती है कि प्रकृति केवल बाहरी पदार्थ (matter) नहीं, बल्कि एक ऐसी बहुआयामी वास्तविकता है जिसमें बाहरी रूप (form) और आंतरिक अनुभव (interiority) दोनों निहित हैं। 1. “जड़” की पारंपरिक समझ और उसकी सीमा पारंपरिक दृष्टि में “जड़ प्रकृति” का अर्थ है—ऐसी सत्ता जिसमें चेतना नहीं है, जो केवल भौतिक तत्वों (पंचभूत) से बनी है, और जो परिवर्तनशील तथा कारण-कार्य संबंधों में बंधी है। इस दृष्टिकोण में पदार्थ को निष्प्राण, inert और बाहरी माना जाता है। किन्तु यह दृष्टि मुख्यतः प्रकृति के बाहरी (exterior) आयाम को ही देखती है। यह उस सूक्ष्म आंतरिक पक्ष को ...