परमात्मा का नित्य-नूतन स्वरूप, प्रतीक और चेतना
परमात्मा का नित्य-नूतन स्वरूप , प्रतीक और चेतना: एक समन्वित दार्शनिक प्रस्तुति तारतम वाणी में परमात्मा के स्वरूप को समझने का सबसे महत्वपूर्ण आधार यह है कि परमात्मा स्वयं नहीं बदलते , बल्कि आत्मा की चेतना , भाव और चितवन के अनुसार उनका अनुभव बदलता है । भारतीय परंपरा में जहाँ सगुण–निर्गुण और साकार–निराकार जैसे अनेक मत मिलते हैं , वहीं तारतम वाणी इन भिन्नताओं को विरोध नहीं मानती , बल्कि चेतना के स्तरों के अनुसार अनुभव की विविधता के रूप में देखती है। इस दृष्टि से परमात्मा एक ही हैं , पर प्रत्येक आत्मा उन्हें अपने भाव और अंतःस्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न रूपों में अनुभव करती है। इसलिए यह प्रश्न कि परमात्मा वास्तव में बदलते हैं या हमारी दृष्टि बदलती है—तारतम वाणी स्पष्ट करती है कि परिवर्तन अनुभव में है , परमात्मा में नहीं। तारतम का उद्घोष स्पष्ट है— “ सुर असुर सबो को ए पति , सब पर एकै दया। देत दीदार सबन को सांईं , जिनहूं जैसा चाह्या॥” अर्थात् परमात्मा सबके लिए एक ही हैं , पर सबको उनके अपने-अपने भाव और दृष्टि के अनुसार दर्शन होते हैं। तारतम वाणी के अनु...