पश्चाताप का अर्थ केवल अतीत की भूलों पर दुख करना नहीं है
प्रकाश ९ — सत्संग के लिए ध्यानपूर्वक पठन प्रस्तावना तारतम वाणी में वर्णित यह प्रसंग मानव चेतना के एक अत्यंत गहरे आध्यात्मिक रहस्य को समझाता है। इसमें पश्चाताप, समय की अनुभूति, माया के स्वप्नस्वरूप स्वभाव और आत्मजागृति के मार्ग का गहन संदेश निहित है। "एक लवो याद आवे सही, तो जीव रहे क्यों काया ग्रही" जैसी पंक्ति यह संकेत देती है कि यदि आत्मा को परमस्वरूप और परमधाम का एक क्षण के लिए भी सच्चा स्मरण हो जाए, तो फिर शरीर और संसार के बंधनों के प्रति उसकी आसक्ति नहीं रहती। यहाँ पश्चाताप का अर्थ केवल अतीत की भूलों पर दुख करना नहीं है, बल्कि अपने मूल स्वरूप को पुनः पहचानने की आंतरिक जागृति है। सच्चा पश्चाताप वह है जिसमें मनुष्य अपनी भूल को पहचानकर चेतना में लौटता है और आत्मा को परमसत्य की ओर मोड़ता है। यह आत्मा को नम्र बनाता है और जागृति की ओर ले जाता है। लेकिन तारतम दृष्टि यह भी बताती है कि पश्चाताप की अधिकता भी उचित नहीं है। यदि मन लगातार अपनी भूलों पर ही अटका रहे, तो यह जागृति की ओर ले जाने के बजाय मन में दोषभाव और असहायता उत्पन्न कर सकता है। आध्यात्मिक मार्ग में पश्चाताप क...