जागनी: संतुलन, समग्रता और एकीकरण का जीवंत दर्शन
जागनी: संतुलन, समग्रता और एकीकरण का जीवंत दर्शन अब जाग देखो सुख जागनी, ए सुख सोहागिन जोग। तीन लीला चैथी घर की, इन चारों को यामें भोग।। कहे सुन्दरबाई अछरातीत से, खेल में आया साथ। दोए सुपन ए तीसरा, देखाया प्राणनाथ।। इन चौपाइयों में श्री सुन्दरबाई में अवतरित श्री श्यामा जी का भाव अत्यंत गूढ़ और प्रेरक है। संकेत यह है कि अक्षरातीत परमधाम से ब्रह्मात्माएँ इस तीसरे खेल— जागनी —में पधारी हैं। धामधनी श्री प्राणनाथ जी ने मूल मिलावे में बिठाकर पहले कालमयिक व्रज लीला और योगमायिक रास लीला का अनुभव कराया, और अब कालमाया में जागनी लीला का दर्शन करा रहे हैं। "तीन लीला चैथी घर की" का तात्पर्य स्पष्ट है: साधक को सभी लीला-आयामों का संतुलित अनुभव करना है, किसी एक पर रुक जाना नहीं। एक आयाम पर ठहरने की सूक्ष्म भूल: साधना के पथ पर एक सामान्य लेकिन गंभीर जोखिम है—किसी एक अनुभव , एक विचार , या एक आध्यात्मिक आयाम को ही सम्पूर्ण सत्य मान लेना। जैसे ही यह होता है, अन्य सम्भावनाओं का नकार शुरू हो जाता है। यही असंतुलन का आरम्भ है। चेतना का स्वभाव विस्तार है...