शील और संतोष: आत्मा का “राइट टू स्टे”
शील और संतोष: आत्मा का "राइट टू स्टे" (तारतम वाणी के आलोक में आंतरिक स्थिरता का आध्यात्मिक पाठ) विश्वभर में आज ठहरने के अधिकार ("राइट टू स्टे") की समस्या बहुत व्यापक हो चुकी है। दुनिया के करोड़ों लोग ऐसे हैं जो अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि मजबूरी में अपने घर, गाँव या शहर छोड़ने को विवश हैं। कहीं युद्ध और हिंसा के कारण, कहीं विकास परियोजनाओं, महँगे मकानों, खेती छिन जाने या जलवायु आपदाओं के कारण लोग उजड़ रहे हैं। स्थिति यह है कि दुनिया में हर कुछ दर्जन लोगों में से एक व्यक्ति ऐसा है जो अपने ही घर में सुरक्षित रूप से टिक नहीं पा रहा। इसका अर्थ यह है कि यह समस्या किसी एक देश या समुदाय तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक वैश्विक संकट बन चुकी है—जहाँ लोगों का सबसे बुनियादी अधिकार, यानी अपने स्थान पर सम्मान और सुरक्षा के साथ रहने का अधिकार, लगातार कमजोर होता जा रहा है। यह तो हुई आज की बाहरी समस्या की बात। ठीक उसी प्रकार जैसे बाहरी दुनिया में लोगों का ठहरने का अधिकार छीना जा रहा है, वैसे ही भीतर की मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक दुनिया में भी मनुष्य को अपने ही मन में टिकने नहीं...