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How Can We Wish Well for Someone Who Hurts Us?

How Can We Wish Well for Someone Who Hurts Us? This is one of the most practical questions in the spiritual practice taught by Tartam Vani. When someone hurts us, insults us, betrays us, or treats us unfairly, the mind naturally reacts with anger, resentment, retaliation, or a desire to withdraw. But the path of love shown by Tartam Vani does not ask us merely to suppress these reactions. It invites us to understand and transform them. “Koi det kasālā tum ko, tum bhalā chāhiyo tin. Sarat Dhām kī na chhoḍiyo, surat pīchhe phirāo jin.” Meaning: If someone causes you pain, treats you harshly, or creates difficulties for you, do not wish them harm. Continue to wish for their well-being. Do not allow another person’s behavior to make you lose the remembrance of Dhām or the certainty of your original relationship with the Beloved. And do not allow your surat —your inner attention and awareness—to keep turning backward toward resentment, reaction, revenge, or the p...

हमें कसाला देने वाले को आखिर हम कैसे चाहें?

हमें कसाला देने वाले को आखिर हम कैसे चाहें? यह तारतम वाणी की साधना का अत्यंत व्यावहारिक प्रश्न है कि सामान्यतः जब कोई हमें कष्ट देता है , अपमान करता है या धोखा देता है , तो मन की स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है—क्रोध , द्वेष , प्रतिशोध या दूरी। परन्तु तारतम वाणी प्रेम का जो मार्ग बताती है , वह इन प्रतिक्रियाओं को दबाने का नहीं , बल्कि उन्हें रूपांतरित करने का मार्ग है। “कोई देत कसाला तुम को , तुम भला चाहियो तिन। सरत धाम की न छोड़ियों, सुरत पीछे फिराओ जिन ।। अर्थ: यदि कोई तुम्हें कष्ट दे , कटु व्यवहार करे या तुम्हारे लिए परेशानी पैदा करे , तब भी उसके लिए बुरा न चाहो ; उसके मंगल की ही कामना करो। किसी दूसरे के व्यवहार के कारण धाम की सुध और अपने मूल सम्बन्ध का निश्चय मत छोड़ो , और अपनी सुरता को पीछे—द्वेष , प्रतिक्रिया , बदला या उसी व्यक्ति के व्यवहार में—मत उलझने दो। यहाँ “सरत धाम की” का भाव धाम की सुध , स्मृति और अपने मूल धाम-सम्बन्ध की जागरूकता से है ; और “सुरत पीछे फिराओ जिन” का सुंदर व्यावहारिक संकेत है—जिसने तुम्हें दुःख दिया , अपनी...

सनातन क्या है? — ‘सत्’, ‘सत्य’ और शाश्वतता की तारतम दृष्टि

सनातन क्या है? — ‘सत्’, ‘सत्य’ और शाश्वतता की तारतम दृष्टि आज “सनातन” शब्द का प्रयोग बहुत व्यापक रूप से होता है। कभी इसे भारतीय धार्मिक परंपरा के अर्थ में लिया जाता है, कभी वैदिक संस्कृति के पर्याय के रूप में और कभी सीधे “परम सत्य” के अर्थ में। इसी क्रम में यह कथन भी सुनने को मिलता है— “सनातन का अर्थ शाश्वत है; वस्तुतः वैदिक ज्ञान ही सनातन है और यही परम सत्य है।”  इस कथन में वेदों के प्रति श्रद्धा का भाव स्पष्ट है, किंतु तारतम वाणी की दृष्टि से इसे कुछ अधिक सूक्ष्मता से समझने की आवश्यकता है। मूल प्रश्न यह नहीं है कि वेद सत्य हैं या नहीं; बल्कि यह है कि  सनातन वास्तव में क्या है—कोई ग्रंथ, उसमें व्यक्त ज्ञान, या वह नित्य ‘सत्’ जिसकी ओर ज्ञान संकेत करता है? सनातन —केवल प्राचीन नहीं, नित्य “सनातन” का सामान्य अर्थ है— नित्य, शाश्वत, चिरस्थायी और अनादि से विद्यमान।  किंतु केवल बहुत पुराना होना और सनातन होना एक ही बात नहीं है। कोई परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही हो सकती है और इस अर्थ में अत्यंत प्राचीन हो सकती है; पर आध्यात्मिक अर्थ में “सनातन” उस वास्तविकता की...