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शील और संतोष: आत्मा का “राइट टू स्टे”

शील और संतोष:    आत्मा का "राइट टू स्टे" (तारतम वाणी के आलोक में आंतरिक स्थिरता का आध्यात्मिक पाठ) विश्वभर में आज ठहरने के अधिकार ("राइट टू स्टे") की समस्या बहुत व्यापक हो चुकी है। दुनिया के करोड़ों लोग ऐसे हैं जो अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि मजबूरी में अपने घर, गाँव या शहर छोड़ने को विवश हैं। कहीं युद्ध और हिंसा के कारण, कहीं विकास परियोजनाओं, महँगे मकानों, खेती छिन जाने या जलवायु आपदाओं के कारण लोग उजड़ रहे हैं। स्थिति यह है कि दुनिया में हर कुछ दर्जन लोगों में से एक व्यक्ति ऐसा है जो अपने ही घर में सुरक्षित रूप से टिक नहीं पा रहा।  इसका अर्थ यह है कि यह समस्या किसी एक देश या समुदाय तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक वैश्विक संकट बन चुकी है—जहाँ लोगों का सबसे बुनियादी अधिकार, यानी अपने स्थान पर सम्मान और सुरक्षा के साथ रहने का अधिकार, लगातार कमजोर होता जा रहा है। यह तो हुई आज की बाहरी समस्या की बात।  ठीक उसी प्रकार जैसे बाहरी दुनिया में लोगों का ठहरने का अधिकार   छीना जा रहा है, वैसे ही भीतर की मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक दुनिया में भी मनुष्य को अपने ही मन में टिकने नहीं...

सामाजिक संतुलन हेतु सुन्दरसाथ नेतृत्व / सत्संग संचालकों के लिए आचरण

सामाजिक संतुलन हेतु सुन्दरसाथ नेतृत्व / सत्संग संचालकों के लिए आचरण  ✔️ To-Do List (क्या करें) 1. सत्संग में भाषा को सरल, समावेशी और प्रेमपूर्ण रखें। तीक्ष्णता नहीं, स्पष्टता लक्ष्य हो। 2. तारतम वाणी के ऐतिहासिक संदर्भ स्पष्ट करें। बताएँ कि कौन-सी बातें काल-विशेष के लिए थीं। 3. सार्वजनिक सत्संग और गूढ़ अध्ययन के मंच अलग रखें। 4. समन्वय को लक्ष्य बनाकर प्रस्तुति करें, प्रमाण नहीं। 5. नई पीढ़ी को पहचान-संघर्ष से बचाएँ। उन्हें तारतम को "सेतु" के रूप में समझाएँ। 6. असहमति रखने वालों को बाहर न करें। संवाद का द्वार खुला रखें। 7. स्वयं निरंतर अध्ययन और आत्म-संशोधन करते रहें। ❌ Don't-Do List (क्या न करें) 1. सत्संग को वैचारिक युद्धभूमि न बनाएं। 2. हर चौपाई को बिना विवेक के सार्वकालिक न घोषित करें। 3. हिंदू समाज की संवेदनशीलता को अनदेखा न करें। ऐसा ही आवश्यकतानुसार सभी परंपराओं का सम्मान करें । 4. भय के कारण पूरे विषय को "टैबू" न बना दें। यह दीर्घकाल में समुदाय को खोखला करता है। 5. शब्दों से लोगों को प्रभावित करने की कोशिश ...

सामाजिक संतुलन हेतु सुन्दरसाथ आचरण : इतना तो कभी न करें ❌ (DON’T DO LIST)

सामाजिक संतुलन हेतु सुन्दरसाथ आचरण : इतना तो कभी न करें ❌ (DON'T DO LIST) 1. तारतम वाणी को विवाद का औज़ार न बनाएं: धार्मिक या सामाजिक टकराव के लिए तारतम वाणी का उपयोग न करें। 2. "हम सही–वे गलत" की मानसिकता न पालें अहंकार-आधारित श्रेष्ठता-भाव तारतम की आत्मा के विरुद्ध है। 3. ऐतिहासिक भाषा को यथावत आज न थोपें अतीत के संदर्भों को बिना विवेक आज के व्यवहार में लागू न करें। 4. सार्वजनिक मंचों पर उत्तेजक संदर्भ न रखें इस्लाम, क़ुरान या अन्य परंपराओं के संदर्भ प्रचारात्मक या उकसाने वाले रूप में न रखें। 5. भय या दबाव में मौन या अति न अपनाएँ न सब कुछ छुपाएँ, न सब कुछ थोपें—दोनों असंतुलन के रूप हैं। 6. हिंदू समाज की संवेदनाओं की उपेक्षा न करें:  संप्रदाय का अस्तित्व और सम्मान व्यापक हिंदू समाज से जुड़ा हुआ है। 7. कठोर भाषा और आरोपात्मक स्वर से बचें:  कटु शब्द साधना नहीं, अहं को पोषित करते हैं। 8. व्यक्तिगत व्याख्या को अंतिम सत्य न घोषित करें: अपनी समझ को सार्वकालिक या सर्वमान्य न मानें। 9. सोशल मीडिया को सत्संग न बनाएं: डिजिटल मंचों पर संयम रखें—हर बात सार्वजनिक करने ...

सामाजिक संतुलन हेतु सुन्दरसाथ आचरण : ✅ (TO DO LIST) इतना अवश्य करें

सामाजिक संतुलन हेतु  सुन्दरसाथ  आचरण   : ✅ ( TO DO LIST) इतना अवश्य  करें तारतम  वाणी के आलोक में आचरण मार्गदर्शन (एकीकृत एकेश्वरवाद · 4-D चेतना · सामाजिक संतुलन) 1. भीतर स्पष्टता रखें अपने मन में भय, भ्रम और असुरक्षा को पहचानें। पहले स्वयं से पूछें—क्या   तारतम   मुझे   प्रेम ,  विवेक   और   करुणा   की   ओर   ले   जा   रहा   है ? 2. शब्दों से पहले भाव पर ध्यान दें सत्संग और संवाद में भाषा से अधिक  भाव, उद्देश्य और मर्यादा  को प्राथमिकता दें। 3. समय–स्थान–श्रोता का विवेक अपनाएँ हर सत्य हर मंच और हर श्रोता के लिए नहीं होता—यह तारतम की अनुशासनात्मक मर्यादा है। 4. तारतम को सेतु की तरह प्रस्तुत करें तारतम वाणी को  एकता, प्रेम और एकेश्वर सत्य  का माध्यम बनाएँ—टकराव का नहीं। 5. सच्चे हिंदू–सनातनी जीवन से जुड़ाव बनाए रखें हिंदू परंपरा, समाज और सांस्कृतिक संवेदनाओं के प्रति सम्मान और आत्मीयता बनाए रखें।  परिस्थिति के अनुसार अन्य सभी परंपराओं का भी सम्मान करें। 6. सार्वजनिक सत्संग सरल और...

Beetak teaches how we should conduct ourselves on Social Media too!

In this context, a deeply touching and instructive guidance from Shri Bitak Sahib becomes especially relevant. In a short handwritten note, Mahamati Shri Prannath Ji himself teaches the principle of restraint and dignity in service, saying: "Ab maryādā chaliyo, rākhiyo merī lāaj." ("Now walk in restraint; preserve my honor.") This single line encapsulates the entire social discipline of Tartam practice. Its meaning is not that truth should be hidden or that one should withdraw from service, but that all service in the name of dharma must be conducted within dignity and restraint. Shri Ji asks for only one thing from his followers—that in the name of religion, service, or truth, nothing should be done that compromises the dignity of dharma or diminishes the honor of the path he revealed. In the present age—especially in the context of digital platforms and public communication—this instruction becomes even more relevant. When words lose discipline, when e...