सनातन क्या है? — ‘सत्’, ‘सत्य’ और शाश्वतता की तारतम दृष्टि
सनातन क्या है? — ‘सत्’, ‘सत्य’ और शाश्वतता की तारतम दृष्टि आज “सनातन” शब्द का प्रयोग बहुत व्यापक रूप से होता है। कभी इसे भारतीय धार्मिक परंपरा के अर्थ में लिया जाता है, कभी वैदिक संस्कृति के पर्याय के रूप में और कभी सीधे “परम सत्य” के अर्थ में। इसी क्रम में यह कथन भी सुनने को मिलता है— “सनातन का अर्थ शाश्वत है; वस्तुतः वैदिक ज्ञान ही सनातन है और यही परम सत्य है।” इस कथन में वेदों के प्रति श्रद्धा का भाव स्पष्ट है, किंतु तारतम वाणी की दृष्टि से इसे कुछ अधिक सूक्ष्मता से समझने की आवश्यकता है। मूल प्रश्न यह नहीं है कि वेद सत्य हैं या नहीं; बल्कि यह है कि सनातन वास्तव में क्या है—कोई ग्रंथ, उसमें व्यक्त ज्ञान, या वह नित्य ‘सत्’ जिसकी ओर ज्ञान संकेत करता है? सनातन —केवल प्राचीन नहीं, नित्य “सनातन” का सामान्य अर्थ है— नित्य, शाश्वत, चिरस्थायी और अनादि से विद्यमान। किंतु केवल बहुत पुराना होना और सनातन होना एक ही बात नहीं है। कोई परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही हो सकती है और इस अर्थ में अत्यंत प्राचीन हो सकती है; पर आध्यात्मिक अर्थ में “सनातन” उस वास्तविकता की...