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जोश और आवेश: रास–अरब–मेअराज–जागनी के आलोक में दो दृष्टिकोणों का तारतम्यपूर्ण तुलनात्मक अध्ययन

जोश और आवेश: रास–अरब–मेअराज–जागनी के आलोक में दो दृष्टिकोणों का तारतम्यपूर्ण तुलनात्मक अध्ययन (Josh & Aavesh: A Tārātamya-Based Comparative Study) 1) सारांश (Abstract) तारतम वाणी, बीतक और व्याख्या-परंपरा में "जोश" और "आवेश" शब्द साधारण शब्द नहीं हैं। ये शब्द किसी भावुकता या उत्तेजना मात्र के अर्थ में नहीं आते, बल्कि  परम सत्ता/परम चेतना की उस दिव्य शक्ति  को सूचित करते हैं, जो समय-समय पर अलग-अलग "लीला-स्तरों" में अलग भाषा-रूप लेकर प्रकट होती है। विद्वानों के बीच दो मुख्य पढ़त (readings) मिलती हैं—(1)  जोश और आवेश तत्त्वतः एक ही हैं , केवल भाषा बदलती है; (2)  दोनों में सूक्ष्म कार्यात्मक भेद है , जैसे कारण-रूप और फल-रूप। यह लेख दिखाता है कि तारतम्य (integrative ordering) की दृष्टि से ये दोनों पढ़तें विरोधी नहीं, बल्कि  एक ही तत्त्व को दो स्तरों पर समझने के तरीके  हैं—और "रास–अरब–मेअराज–जागनी" की प्रमाण-श्रृंखला (1–10) इस समन्वय को अधिक ठोस करती है। 2) भूमिका (Introduction): यहाँ विवाद क्यों पैदा होता है? आध्यात्मिक ग्रंथों में शब्द "defin...