तारतम वाणी में प्रयुक्त ‘धुतार’ और ‘छल’ आदि शब्दों के समग्र अर्थ का विवेचन

तारतम वाणी में प्रयुक्त 'धुतार' और 'छल' आदि शब्दों के समग्र अर्थ  का विवेचन:

माया, देह, बुद्धि, प्रपंच और आत्म-जागृति के संदर्भ में

 

 

सारांश

तारतम वाणी में प्रयुक्त "धुतार", "धुतारी", "छल", "छलिया", "प्रपंच", "मोह" और "माया" जैसे शब्द सामान्य नैतिक धोखे का संकेत नहीं करते, बल्कि चेतना की उस गहरी विस्मृति को व्यक्त करते हैं जिसमें जीव अपने वास्तविक स्वरूप, अपने मूल घर और परम संबंध की पहचान खो देता है। इस भूल के कारण मनुष्य अस्थायी को स्थायी, देह को आत्मा और क्षणिक अनुभवों को परम आनंद समझ बैठता है। यही स्थिति माया का छल कहलाती है। यह भ्रम केवल मानसिक स्तर तक सीमित नहीं रहता; यह देह, इन्द्रिय, विचार, सांस्कृतिक धारणाओं, धार्मिक पंथों और सामाजिक संरचनाओं में भी विभिन्न रूपों में कार्य करता है। परिणामस्वरूप संसार एक आकर्षक किंतु उलझाने वाला तंत्र बन जाता है जिसमें चेतना अपने मूल स्रोत से दूर भटकती रहती है।

"धुतार" शब्द की विशेषता यह है कि उसका अर्थ एकांगी नहीं है। एक ओर यह माया की ठगिनी प्रवृत्ति को दर्शाता है जो जीव को आकर्षण और मोह के जाल में बाँधती है, वहीं दूसरी ओर प्रेम-लीला के संदर्भ में यह परम प्रिय के उस मधुर चातुर्य का द्योतक है जिसके द्वारा आत्मा को संसार की उलझनों से हटाकर दिव्य प्रेम और जागृति की ओर खींचा जाता है। इस प्रकार छल का एक पक्ष अज्ञान और मोह का जाल है, जबकि दूसरा पक्ष जागृति और प्रेम का सूक्ष्म रहस्य है।

आधुनिक समग्र दर्शन के संदर्भ में Ken Wilber द्वारा प्रतिपादित एकीकृत दर्शन इस विषय को समझने का एक उपयोगी ढाँचा प्रदान करती है। इस सिद्धांत के अनुसार वास्तविकता चार आयामों में प्रकट होती है—व्यक्ति का आंतरिक मन, उसका बाह्य व्यवहार और शरीर, सामूहिक संस्कृति तथा व्यापक सामाजिक व्यवस्था। यदि इस दृष्टि से तारतम वाणी के "छल" को देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि यह सभी स्तरों पर सक्रिय है: मन में अज्ञान और मोह के रूप में, देह में आसक्ति के रूप में, संस्कृति में पंथ और बाह्याचार के रूप में तथा सामाजिक जीवन में कर्म-जाल और प्रपंच के रूप में।

एकीकृत दर्शन यह भी इंगित करता है कि मानव चेतना अक्सर दो चरम प्रवृत्तियों में उलझ जाती है—आसक्ति (Addiction) और प्रतिकर्ष या द्वेष (Aversion / Allergy)। यही द्वंद्व माया के खेल का एक प्रमुख रूप है। कभी मनुष्य विषय, प्रतिष्ठा या विचारों के प्रति अत्यधिक आसक्त हो जाता है, और कभी किसी भिन्न दृष्टि या अनुभव को तीव्रता से अस्वीकार कर देता है। दोनों ही स्थितियाँ चेतना के संतुलन और स्पष्टता को बाधित करती हैं।

एकीकृत सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण सूत्र "Transcend and Include" है—अर्थात चेतना का विकास पूर्व अवस्थाओं को नष्ट नहीं करता बल्कि उन्हें समझकर और समाहित करके उनसे आगे बढ़ता है। तारतम ज्ञान भी इसी दिशा में संकेत करता है कि संसार या देह को पूर्णतः अस्वीकार करना समाधान नहीं है; बल्कि उनकी सीमाओं को समझकर उनसे परे अपने मूल संबंध की पहचान करना ही वास्तविक मुक्ति का मार्ग है।

इस प्रकार तारतम ज्ञान और समग्र दर्शन मिलकर यह स्पष्ट करते हैं कि माया का छल केवल बाहरी भ्रम नहीं है, बल्कि चेतना, मनोविज्ञान, संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था में व्याप्त एक बहुस्तरीय अनुभव है। उससे मुक्त होने का उपाय संसार से पलायन नहीं, बल्कि विवेक, संतुलन, प्रेम और आत्म-पहचान की जागृति है। जब यह पहचान स्थिर होती है, तब माया का प्रपंच अपनी शक्ति खोने लगता है और चेतना धीरे-धीरे अपने वास्तविक स्रोत की ओर लौटने लगती है।

 

1. धुतार/छलिया का मधुर रूप: परब्रह्म का प्रेम-चातुर्य

 

तारतम वाणी में एक अत्यंत कोमल और रहस्यमय प्रयोग यह है कि परब्रह्म श्री राज जी को आत्मा प्रेम से धुतारोछलियागेहेलो वालो कहती है। यहाँ छल का अर्थ नैतिक बुराई नहीं, बल्कि ऐसा प्रेम-चातुर्य है जिससे प्रियतम प्रेमिका के हृदय को जीत लेता है, उसे अपने से अलग नहीं रहने देता, उसे जगाता है, छिपता है, फिर प्रकट होता है, विरह देता है, फिर मिलन देता है।

 

"सहु साथ कहे वालो दाव देसे, पेहेलो ते पिउजीनो वारो।

जो पेहेलो दाव आपण दऊं, तो ए झलाए नहीं धुतारो।।"

"हवे न मूकूं अधखिण, धुतारो छे अतिघण।

पल न वालूं पांपण, भूलियो पेहेल री।। "

"बाई रे गेहेलो वालो गेहेली वात करे रे, एहने कोई तमें वारो।

दुरजन देखतां अमने बोलावे, निलज ने धुतारो।।"

 

इन चौपाइयों में परब्रह्म को "छलिया" कहना वास्तव में उनके अलौकिक प्रेम-स्वभाव का सूचक है। वे आत्मा को संसार से चुराकर अपने प्रेम में लगा लेते हैं। वे अपने को ऐसे नहीं देते कि साधारण पकड़ में आ जाएँ। वे हृदय पर अधिकार करते हैं, विरह से तपाते हैं, फिर मिलन से धन्य करते हैं। अतः यहाँ "छल" का अर्थ है: प्रेम की लीला में प्रियतम का चमत्कारी चातुर्य। यह बुरा छल नहीं, बल्कि प्रेम-जागरण का दिव्य कौशल है।

 

2. छल क्या है? असत्य को सत्य, अनित्य को नित्य, दुःख को सुख मान लेना

 

तारतम दृष्टि से छल का मूल अर्थ है—वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप से विपरीत देखना। जो बदलने वाला है उसे स्थायी मानना, जो बाहरी है उसे आत्मा मानना, जो स्वप्नवत् है उसे परम सत्य मानना, जो बन्धन है उसे सुख मानना—यही छल है।

 

"जुओ भूलवी छेतरे केम, आगे छेतरी मूने जेम।

सुकजी तो पुकारे एम, जे छल पुरी ए भरम।।"

"लोक चौद मायानों फंद, सहु छलतणा ए बंध।

समझया विना सहुए अंध, तारतम केहेसे सहु सनंध।।"

"छल की भोम को तुम समझत नाहीं, ना सुनत मेरी बात जी।

जानत हो दिन दो पोहोर रेहेसी, पाओ पल में हो जासी रात जी।।"

 

इन चौपाइयों से स्पष्ट है कि छल केवल बाहरी धोखा नहीं, बल्कि अविद्या की संपूर्ण भूमि है। यह वह मानसिक-आध्यात्मिक स्थिति है जिसमें जीव अपनी जड़ता के कारण स्वयं को, अपने धनी को, अपने घर को और संसार की वास्तविकता को भूल जाता है। अतः संक्षेप में: छल = मोहजन्य विकृत दृष्टि। धुतार = वह शक्ति जो भटका दे, उलटा दिखाए, पकड़ में न आए, या चतुराई से दिशा बदल दे।

 

3. माया धुतारी है: स्वप्नवत् जगत का ठगिनी स्वरूप

 

तारतम वाणी बार-बार कहती है कि यह संसार स्वप्नवत् मिथ्यामृगतृष्णाकोहेड़ाजालफंदाप्रपंच और छल है। यहाँ छल का अर्थ है—जो आकर्षित तो करे, पर अंततः स्थायी सुख न दे; जो दिखे बहुत, पर हो न टिकाऊ; जो लुभाए, पर बाँध दे।

 

"बोहोत सबद को अर्थ न उपजे, या बल सुपन धुतार।। "

"जिन राचो मृग जल दृष्टे, जाको नाम प्रपंच।

ए छल मायाऐं किया, ऐसे रचे उलटे संच।।"

"ऐसा खेल छल का, छोड़ाए नहीं।

ब्रह्मांड की कारीगरी, सारी करी सही।। "

"कहा करूं तिन सुख को, जिनसे होइए निरास।

ए झूठा सुख है छल का, सो देत माया की फाँस।।"

 

यहाँ छल का आशय है—क्षणिक सुख का स्थायी सुख जैसा भ्रम। माया पहले स्वाद देती है, फिर बंधन देती है; पहले आकर्षित करती है, फिर थकाती है; पहले रंग दिखाती है, फिर रिक्त कर देती है। यही कारण है कि वाणी माया को केवल असत् नहीं कहती, बल्कि सक्रिय ठगिनी शक्ति के रूप में चित्रित करती है।

 

4. देह भी धुतारी है: नश्वर शरीर पर भरोसा क्यों नहीं

 

तारतम वाणी देह को भी धुतारी कहती है। इसका आशय यह नहीं कि शरीर स्वयं नैतिक अपराधी है, बल्कि यह कि शरीर साथ न देने वाला, परिवर्तनशील, भरोसे के अयोग्य है। जो साधन है, उसे साध्य मान लेना ही छल है।

 

"ए धुतारी को न धीरिए, जो पलटे रंग परवान।

ए विश्व बधे वैराट को, सो भी निगलसी निरवान।।"

 

लेकिन वाणी देह को केवल निंदित नहीं करती। वही देह यदि प्रियतम की प्राप्ति, सेवा, स्मरण और जागृति का साधन बन जाए तो उसका महत्त्व भी स्वीकार करती है।

 

"इन बिध लाहा लीजिए, अनमिलती का रे यों।

सुखड़ा दिया धुतारिए, याको बुरी कहिए क्यों।।"

 

अर्थात् देह दोहरी है— एक ओर यह नश्वर, भरोसे योग्य नहीं; दूसरी ओर यही साधन बनकर प्रियतम का सुख दिला सकती है।

इसलिए देह का त्याग नहींदेह का यथार्थ उपयोग वाणी का संदेश है।

 

5. छल की युक्तियाँ: वह कैसे काम करता है?

 

तारतम वाणी के अनुसार छल की कुछ मुख्य युक्तियाँ हैं:

 

(क)  रूप-रस का आकर्षण: यहाँ स्पष्ट किया गया है कि शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धये पाँच विषय ही माया के आयुध हैं। वे सीधे नहीं बाँधते; वे सुख के रूप में आकर्षित करते हैं।

 

"एहना आउध अमृत रूप रस, छल बल वल अकल।

अगिन कुटिल ने कोमल, चंचल चतुर चपल।।"

 

(ख)  उलटी रीति: माया की चाल सीधी नहीं, उलटी है। जो वस्तु लाभ जैसी दिखती है, वही हानि बनती है; जो अहंकार को उपलब्धि लगता है, वही पतन का कारण बनता है।

 

"ए देखी बाजी छल की, छल की तो उलटी रीत।

इनमें सीधा दौड़के, कोई ना निकस्या जीत।।"

 

(ग)    भूल और बहिर्मुखता: छल का एक बड़ा उपाय है—दृष्टि को भीतर से बाहर खींच देना।

 

"ए छल झूठा देख के, तुम लई जो तिनकी बुध।

तो नजर बाहेर पड़ गई, जो भूले अर्स की सुध।।"

 

(घ) अहंकार और स्यानप: सिर्फ बुद्धिमत्ता, वाक्चातुर्य, शब्दज्ञान, या पांडित्य—यदि प्रेम, समर्पण, आस्था और निर्मलता से रहित हो—तो वही बंधन बन जाता है।

 

"रे यामें केते आप कहावें स्याने, पर छूटत नहीं विकार।

स्यानप लेके कंठ बंधाए, या छल रच्यो है नार।।"

 

6. छल के अच्छे और बुरे रूप: 

 

तारतम वाणी में छल के दोनों रूप हैं, इसलिए सावधानी से भेद करना होगा।

 

(1) बुरा छल: यह वह है जो अज्ञान, मोह, लोभ, अहंकार, पाखंड, कामना, विकृति या शोषण पैदा करे।

माया, देहाभिमान, झूठे सुख, पाखंडी धर्माचार, विकृत अर्थ, वासनात्मक आकर्षण—ये सब बुरे छल के रूप हैं।

 

"एहेवो छल करी छेतरी, मन मूल माहेंथी फेरी।

एणे तो आप सरीखी करी, चित्त चितवणी बहुविध धरी।।"

 

(2) अच्छा या जागृत छल / नीतियुक्त युक्ति: यहाँ "छल" शब्द कभी-कभी रणनीतिक बुद्धिउचित नीतिमायावी शक्तियों के साथ सीधे न भिड़कर विवेकपूर्ण ढंग से कार्य करना के अर्थ में भी आया है।

 

"तिस वास्ते तुम इनसों, छले करना जुध।

तिस वास्ते ऐसा लिखा, बस न होए बिना बुध।।"

"माया छल रूप है, ताको छल ही से जीताए।

आगे भगवान के, बल बोहोत कहलाए।।"

"तो भी असुरन सों, जीते हैं छल से।

हर जी व्यास सों जुध किया, सो तुम जानत हो दिल में।।"

 

यहाँ स्पष्ट है कि यह कपटपूर्ण अधर्म नहीं, बल्कि जागृत बुद्धि का व्यूह है। माया यदि भ्रम, भाषा, आकर्षण, मनोविज्ञान और जाल से काम करती है, तो उससे लड़ाई केवल बल से नहींबोध, नीति, अंतरदृष्टि और सही लक्ष्य-बोध से जीती जाती है।

 

7. किन-किन को 'छल' से जोड़ा गया है?

 

तारतम वाणी में "छल" शब्द अनेक स्तरों पर जुड़ा हुआ है। यह सूची समझने योग्य है:

 

(क) परब्रह्म के प्रेम-चातुर्य से: "हवे न मूकूं अधखिण, धुतारो छे अतिघण…"  यहाँ छल = प्रेम-लीला का चमत्कार।

 

(ख) माया से: "ए झूठा सुख है छल का…" "चढ्यो माया को जोर अमल, भूलियां आप मांहें घर छल…" यहाँ छल = अज्ञान, प्रपंच, मोह, भ्रम।

 

(ग) देह से: "ए धुतारी को न धीरिए…" यहाँ छल = अनित्य, अस्थिर, भरोसा तोड़ने वाला।

 

(घ) इन्द्रिय-विषयों से: "एहना आउध अमृत रूप रस…" यहाँ छल = सुख देकर बाँधने वाली विषय-व्यवस्था।

 

(ङ) भाषिक/शास्त्रीय विकृति से: "बंध बांध्या वेदव्यासें… छलवा आ संसार।। " "आ पाधरी वाणी मांहें प्रगट, एक अर्थ नव दाखे…" "एवा छल अनेक अर्थ आडो…" यहाँ छल = अर्थ-विकृति, शब्द-हेरफेर, बौद्धिक प्रपंच।

 

(च) पंडिताई, अहंकार, पाखंड से: "ए छल पंडित भणीने, मान मूढोमां पामे…" यहाँ छल = ज्ञानाभिमान, दुराग्रह, शुष्क विवाद।

 

(छ) सम्प्रदायगत बाह्याचार से: "कई सिवी कई वैष्णवी…" "कई होदी बोदी पादरी…" "कई संत जो महंत…"

इन चौपाइयों को ऐतिहासिक-आलोचनात्मक और सांकेतिक ढंग से पढ़ना चाहिए। इनका उद्देश्य किसी सम्पूर्ण समुदाय को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि यह बताना है कि बाहरी मत, वेश, विधि, प्रतिष्ठा, तप, या संप्रदायगत पहचान मात्र से माया का बंधन नहीं टूटता। वाणी का प्रहार समुदाय पर नहींअज्ञान, बाह्याचार और असल पहचान के अभाव पर है।

 

(ज) समूचे ब्रह्माण्डीय तंत्र से: "चौदे लोक अग्याकारी, सिर सबन के हुकम। या छल ने ऐसे उरझाए…" यहाँ छल = समष्टिगत ब्रह्माण्डीय व्यवस्था, जिसमें जीव उलझा है।

 

8. व्यष्टि और समष्टि रूप में छल: यह एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण भेद है।

 

(अ) व्यष्टि रूप छल: जब व्यक्ति के भीतर भ्रम, वासना, लोभ, मान, अभिमान, स्वार्थ, बहिर्मुखता, शुष्क पांडित्य, विकृत अर्थ, आत्म-विस्मृति, या झूठी पहचान काम करती है, तब छल व्यष्टि रूप में है। "वतन बिसारिया रे, छलें किए हैरान।धनी आप बुध भूलियां, सुध न रही वृद्धि हान।।""कई लोभें लिए लज्या लिए, कई लिए अहंकार…"

 

(ब) समष्टि रूप छल:  जब पूरा जगत, परम्पराएँ, भाषा-व्यवस्था, पंथ, सामाजिक मान्यताएँ, दार्शनिक प्रणालियाँ, कर्म-चक्र, देह-बुद्धि का सामूहिक मोह—सब मिलकर जीव को बाँधते हैं, तब छल समष्टि रूप में है। "लोक चौद मायानों फंद…" "पंथ सारों की एह मजल… सब रच्यो छल को ठाट।। " "एणी बाजारे कूड कपट, छल छे भेद अपार…" अर्थात् छल केवल "मैं किसी को धोखा दे रहा हूँ" इतना नहीं है; बल्कि समूचा संसार-तंत्र भी ऐसा हो सकता है जिसमें जीव अनजाने फँसा रहे। यही कारण है कि आत्म-जागृति का प्रश्न केवल नैतिकता का नहीं, बल्कि अस्तित्व-दृष्टि का है।

 

9. आत्म-जागृति में छल को समझने का क्या अर्थ है?

 

आत्म-जागृति का प्रथम चरण है—छल को छल समझना। जब तक जीव माया को सुख, देह को आत्मा, पांडित्य को ज्ञान, बाह्याचार को धर्म, और विषय-रस को आनन्द मानता है, तब तक जागृति नहीं होती।

 

"अब देखो या छल को, जो देखन आइयां एह।

प्रकास करूं इन भांत का, ज्यों रहेवे नहीं संदेह।।"

"अन्धेर सब उड़ाए के, सब छल करूं जाहेर।

खोलूं कमाड़ कल कुलफ, अन्तर मांहें बाहेर।।"

"तुमें सुध छल ना अपनी, ना सुध हक वतन।

बताए देऊं या विध, ज्यों दृढ़ होवे आप मन।।"

 

यहाँ आत्म-जागृति का अर्थ है:मैं कौन हूँ?• मेरा मूल घर कौन सा है?• यह जगत क्या है?• मेरा आकर्षण किन चीजों से बँधा है?• मैं किस झूठ को सत्य मान रहा हूँ?• मेरी भक्ति, ज्ञान, सेवा, तप—क्या सचमुच जागृति से उपजी है या केवल पहचान, प्रतिष्ठा, भय या आदत से? अतः छल को समझना आत्म-जागृति में विवेक का जन्म है।

 

10. छल और हुक्म का संबंध

 

यह अत्यंत सूक्ष्म विषय है। तारतम वाणी के अनुसार यह संसार एक अनुमत खेल है; एक प्रकार से हुक्म के भीतर घटित हो रहा है। लेकिन उसी हुक्म में मुक्ति का प्रकाश भी उतरता है। एक ओर माया-रचित छल की व्यवस्था है; दूसरी ओर परब्रह्म का हुक्म उस छल को प्रकट कर उससे छुड़ाने आता है।

 

"अजाजील को गफलतें, हुकमें दिया उलटाए।

ले तखत बैठाया छल के, सब फरेब जुगत बनाए।। "

"आप हुकम आया इत, चलाया हुकम।

हुकमें छलतें छोडा़ए के, जाहेर किए खोल इलम।।"

"चौदे लोक अग्याकारी, सिर सबन के हुकम।

या छल ने ऐसे उरझाए, आप भूली सुध घर खसम।।"

 

यहाँ दो स्तर हैं: (1) हुक्म के अधीन छल-भूमि: सृष्टि, मोह, निराकार, कर्म-चक्र, देहाध्यास—ये सब एक ब्रह्माण्डीय व्यवस्था के अंग हैं। और (2) हुक्म का उद्धारक रूप: जब वही हुक्म प्रकाशइल्मतारतम वाणीजागृत बुद्धिअसल निस्बतधाम की पहचान बनकर आता है, तब छल का पर्दा हटता है। इसलिए छल और हुक्म का संबंध विरोध का नहीं, बल्कि लीला और उद्धार का है। छल-भूमि परीक्षा है; हुक्म-प्रकाश समाधान है।

 

11. बौद्धिक छल: भाषा, अर्थ और शास्त्रीय विकृति

 

तारतम वाणी का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह केवल इन्द्रिय-मोह की आलोचना नहीं करती, बल्कि अर्थ-विकृतिभाषाई चालाकीविद्वता के अभिमान, और शब्दों की मनमानी व्याख्या को भी छल कहती है।

 

"बंध बांध्या वेदव्यासें, वस्त मात्रना नाम बार।

ते वाणी वखाणी व्याकरणनी, छलवा आ संसार।। "

"एवा छल अनेक अर्थ आडो, ते अर्थ मांहें कई छल।

अखरा अर्थ छल भावा अर्थ आडो, पछे करे भावा अर्थ अटकल।।"

"आ पाधरी वाणी मांहें प्रगट, एक अर्थ नव दाखे।

वचन वलाके त्यारे आणे, ज्यारे छलमां नाखे।। "

"सब्द जो सीधे प्रेम के, सास्त्र तो स्यानप छल।।"

 

यहाँ वाणी का मूल बिंदु है: सत्य जितना गहन है, उतना ही सरल भी है; और असत्य अक्सर शब्द-जाल, पांडित्य और बहु-अर्थी भ्रम में छिप जाता है। हार्ड इस ईजी एण्ड ईजी इस हार्ड (hard is easy and easy is hard)। हमें इसे किसी भाषा-विरोध के रूप में नहीं, बल्कि भाषा के दुरुपयोग की आलोचना के रूप में लेना चाहिए।

जहाँ शब्द सत्य को ढँकें, वहाँ भाषा भी छल का उपकरण बन सकती है।

 

12. क्या केवल साधना, तप, मत, वेश, प्रतिष्ठा से छल छूट जाता है?

 

तारतम वाणी का स्पष्ट उत्तर है—नहीं। सिर्फ कठिन तप, उपवास, जप, वेश, चर्चा, पंथ, मत, संन्यास, महंती, दिगम्बरी, या वाचक-ज्ञान पर्याप्त नहीं। जब तक मूल निस्बतधाम-स्मृतिप्रियतम की पहचानविरह-प्रेम, और तारतम का प्रकाश न हो, तब तक बंधन सूक्ष्म रूप में बना रह सकता है।

 

"मेहेनत तो बोहोतों करी, अहनिस खोज विचार।

तिन भी छल छूटा नहीं, गए हाथ पटक कई हार।। "

"कई संत जो महंत… पर छल ना छोड़े काहू को…"

"कई पवन दूध आहारी… ए सब छल के चेन।। "

"कोई ना परखे छल को, जिन छल में है आप…"

 

13. छल से जीतने के उपाय

 

तारतम वाणी छल से भागने को नहीं, उसे समझकर जीतने को कहती है। उसके मुख्य उपाय निम्न हैं:

 

(1) जागृत बुद्धि:  "तिस वास्ते ऐसा लिखा, बस न होए बिना बुध।। " -- बिना बुद्धि के माया-जाल नहीं छूटता। यहाँ बुध = जागृत विवेक।

(2) छल को प्रकट देखना: "अब देखो या छल को…" "सब छल करूं जाहेर…" -- पहचान ही मुक्ति का आरम्भ है।

(3) बहिर्मुखता छोड़कर अंतर-पहचान: "बाहेर देखना छोड़ के, तुम अंतर करो पेहेचान।।"

(4) धनी से सुरत बाँधना: "अब छल में कैसे कर रहिए… सुरत धनी सो बांध के चलिए, ले विरहा रस प्रेम काम।।"

(5) विरह और प्रेम: "दुख दसों द्वार भेदया… तो कहा करे छल भोम।।" -- जब प्रियतम का विरह गहरा होता है, तब माया की पकड़ ढीली पड़ती है।

(6) मूल संबंध की स्मृति: "सनमंध मूल को, मैं तो पाउ पल छोड़यो न जाए…"

(7) तारतम ज्ञान का प्रकाश: "ए प्रकास खसम का, सो कैसे कर ढंपाए…"

(8) माया के मूल को देखना: "ए छल पेड़ थें देखाए बिना, ना छूटे याको बल…"--  सिर्फ लक्षण नहीं, जड़ पहचाननी होगी।

(9) झूठे सुखों का त्याग: "कहा करूं तिन सुख को, जिनसे होइए निरास…"

(10) संगति और समर्पण: "पीछला साथ आए मिलसी…" -- जागृति एकांत अहंकार का नहीं, सुन्दरसाथ भाव का भी मार्ग है।

 

14. छल से मुक्ति का चरम: जब माया का बल निष्प्रभ हो जाता है

 

तारतम वाणी का अंत संदेश निराशा नहीं, विजय है। माया शक्तिशाली है, पर अजेय नहीं। जब हृदय में धाम धनी की पहचान दृढ़ हो जाती है, तब करोड़ों छल भी विचलित नहीं कर पाते।

 

"कहे इंद्रावती वचन पिउके, जिन देखाया धाम वतन जी।

अब कोटक छल करे जो माया, तो भी ना छूटे धनी के चरन जी।। "

"अब छल को बल क्या करे, जब देखाऊं बका वतन।

निकाल देऊं जड़ पेड़ से, ल्याए नूर अर्स रोसन।। "

"वली गत मत आवी सुधसार, छल छूटो ने थयो करार।

दयानो नव लाधे पार, त्यारे अलगो थयो संसार।। "

 

यहीं आत्म-जागृति की परिणति है—संसार रहते हुए भी भीतर से अलग होना, देह रखते हुए भी देहाभिमान से मुक्त होना,

ज्ञान रखते हुए भी अहंकार से मुक्त होना, प्रेम में डूबकर माया की सत्ता को निष्प्रभ कर देना।

 

15. तारतम ज्ञान और एकीकृत (इन्टीग्रल) दर्शन के प्रकाश में:

 

तारतम वाणी में प्रयुक्त "धुतार", "छल", "प्रपंच" और "माया" जैसे शब्द साधारण नैतिक धोखे के लिए नहीं हैं। ये उस गहरी आध्यात्मिक अवस्था की ओर संकेत करते हैं जिसमें जीव अपने वास्तविक स्वरूप, अपने मूल घर और अपने धनी की पहचान को भूल जाता है। इस विस्मृति के कारण मनुष्य अस्थायी को स्थायी, देह को आत्मा और क्षणिक अनुभवों को परम आनंद मान बैठता है। यही स्थिति वाणी में माया का छल कही गई है। यह छल केवल व्यक्तिगत मानसिक भ्रम नहीं है; यह देह, इन्द्रिय, मन, संस्कृति, परम्परा, भाषा और सामाजिक संरचनाओं में अनेक रूपों में सक्रिय रहता है। इसी कारण संसार एक आकर्षक लेकिन उलझाने वाला जाल बन जाता है, जिसमें जीव अपनी मूल पहचान से दूर भटकता रहता है।

 

"धुतार" शब्द की एक विशेषता यह है कि उसका अर्थ केवल नकारात्मक नहीं है। एक ओर यह माया की ठगिनी शक्ति का प्रतीक है जो आकर्षण और भ्रम के माध्यम से चेतना को बाँधती है। दूसरी ओर प्रेम-लीला में यही शब्द परम प्रिय के उस मधुर चातुर्य को दर्शाता है जिसके द्वारा वह आत्मा को संसार से अलग कर अपने प्रेम में आकर्षित करता है। इस प्रकार छल का एक पक्ष अज्ञान और मोह का है, जबकि दूसरा पक्ष प्रेम और जागृति का संकेत देता है।

 

इस समझ को आधुनिक समग्र दर्शन के संदर्भ में देखें तो एक महत्वपूर्ण व्याख्यात्मक ढाँचा प्रदान करती है। इस सिद्धांत के अनुसार वास्तविकता चार आयामों में प्रकट होती है—व्यक्ति का आंतरिक मन और चेतना, व्यक्ति का बाह्य व्यवहार और शरीर, सामूहिक संस्कृति और विश्वास प्रणाली, तथा व्यापक सामाजिक और प्राकृतिक व्यवस्था। यदि तारतम वाणी में वर्णित "छल" को इस दृष्टि से देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि वह इन सभी स्तरों पर कार्य करता है। मन में यह अज्ञान और मोह के रूप में दिखाई देता है, शरीर में देहाभिमान और इन्द्रिय-आसक्ति के रूप में, संस्कृति में पंथ और बाह्याचार के रूप में, तथा सामाजिक व्यवस्था में कर्म-जाल और प्रपंच के रूप में। इस प्रकार तारतम ज्ञान पहले से ही एक समग्र चेतना-दृष्टि प्रस्तुत करता है।

 

एकीकृत दर्शन मानव चेतना की एक और प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है जिसे आसक्ति या व्यसन(Addiction) और धृणा, द्वेष, अरुचि, परहेज (Aversion, Allergy) कहा गया है। इसका अर्थ है कि चेतना अक्सर दो चरम अवस्थाओं में फँस जाती है—या तो किसी वस्तु, विचार या पहचान के प्रति अत्यधिक आकर्षण उत्पन्न हो जाता है, या उसके प्रति तीव्र अस्वीकार और विरोध। दोनों ही स्थितियाँ संतुलित समझ को बाधित करती हैं। तारतम दृष्टि में माया का छल इसी प्रकार काम करता है: कभी विषय-सुख, प्रतिष्ठा, मत या ज्ञान के प्रति आसक्ति पैदा करता है, और कभी भिन्न विचारों या अनुभवों के प्रति कठोर विरोध उत्पन्न करता है। परिणामस्वरूप चेतना संतुलित जागरूकता तक नहीं पहुँच पाती।

 

एकीकृत दर्शन का एक मूल सिद्धांत "Transcend and Include" है—अर्थात चेतना का उच्च स्तर पूर्व स्तरों को नष्ट नहीं करता बल्कि उन्हें समझकर और समाहित करके उनसे आगे बढ़ता है – पार के पार के पार होते जाता है। तारतम ज्ञान भी यही संकेत देता है कि देह और संसार को पूर्णतः अस्वीकार करना समाधान नहीं है। वास्तविक समाधान यह है कि उनके सीमित स्थान को समझते हुए उनसे परे अपने मूल संबंध की पहचान की जाए। इस पहचान के साथ संसार साधन बन जाता है, बंधन नहीं।

 

इस प्रकार दोनों दृष्टियाँ एक दूसरे की पूरक दिखाई देती हैं। एकीकृत दर्शन चेतना के विकास, उसके मनोवैज्ञानिक पैटर्न और सामाजिक संरचनाओं का एक समग्र मानचित्र प्रदान करता है, जबकि तारतम ज्ञान चेतना की मूल विस्मृति और उसके जागरण का आध्यात्मिक मार्ग प्रस्तुत करता है।

 

अंततः "छल" का रहस्य इस समझ में निहित है कि मनुष्य अपने भीतर और बाहर कार्य कर रही सूक्ष्म प्रवृत्तियों—मोह, आसक्ति, विरोध, पहचान और अहंकार—को पहचान ले। जब विवेक, प्रेम और जागृति के साथ यह पहचान स्थिर हो जाती है, तब माया का प्रपंच धीरे-धीरे अपनी पकड़ खोने लगता है। चेतना बाहरी भ्रमों से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्रोत की ओर लौटती है, जहाँ से उसका संबंध प्रारम्भ हुआ था। यही पहचान आत्मिक स्वतंत्रता और आध्यात्मिक जागृति का वास्तविक आधार बनती है।

16. निष्कर्ष

 

तारतम वाणी में "धुतार" और "छल" का विषय अत्यंत बहुआयामी है। यह केवल नैतिक धोखे की चर्चा नहीं, बल्कि संपूर्ण आध्यात्मिक अस्तित्व की रचना, भ्रांति और मुक्ति का दर्शन है। इस अध्ययन से निम्न निष्कर्ष निकलते हैं:

1. परब्रह्म के लिये छलिया/धुतार शब्द प्रेम-लीला के मधुर चातुर्य के अर्थ में है।

2. माया छल की मूल भूमि है—वह असत्य को सत्य-सा दिखाती है।

3. देह धुतारी है—नश्वर और अस्थिर; पर साधना का साधन भी है।

4. इन्द्रिय-विषय, लोभ, मान, पांडित्य, बाह्याचार, अर्थ-विकृतिसब छल के रूप हैं।

5. व्यष्टि छल व्यक्ति के भीतर हैसमष्टि छल ब्रह्माण्डीय-सामाजिक व्यवस्था में।

6. हुक्म के भीतर ही छल-भूमि भी है और उद्धार का प्रकाश भी।

7. माया को केवल बल से नहीं, बल्कि जागृत बुद्धि, अंतरदृष्टि, तारतम ज्ञान, मूल निस्बत, सुरत-योग, विरह और प्रेम से जीता जाता है।

8. आत्म-जागृति का अर्थ ही है—छल को पहचानना, उसके उलटेपन को समझना, और धनी के चरणों में स्थिर होना।

 

अंततः तारतम वाणी का संदेश यह नहीं कि संसार से घृणा करो, बल्कि यह कि उसके छल को समझो; देह को बुरा कहकर छोड़ो नहीं, बल्कि उसका लाभ लो; ज्ञान को अभिमान मत बनने दो; प्रेम को सरल रखो; और धाम धनी की पहचान से माया के समस्त प्रपंच को पार करो। यही "छल" के अध्ययन का सार है— माया के छल को पहचानकर, प्रेम के छलिया प्रियतम में खो जाना।

मुख्य बोध:

1.         छल का वास्तविक अर्थ: माया का छल केवल बाहरी धोखा नहीं है; यह चेतना की विस्मृति है जिसमें जीव अपने वास्तविक स्वरूप और परम संबंध को भूल जाता है।

2.         छल का बहुस्तरीय स्वरूप: यह भ्रम व्यक्ति के मन, शरीर, संस्कृति, विश्वास प्रणाली और सामाजिक व्यवस्था—सभी स्तरों पर सक्रिय रहता है।

3.         धुतार का द्वैत अर्थ: एक ओर माया जीव को आकर्षण और मोह में बाँधती है, दूसरी ओर परम प्रेम का चातुर्य आत्मा को जागृति की ओर खींचता है।

4.         आसक्ति और प्रतिकर्ष का जाल: चेतना अक्सर दो चरम स्थितियों में फँस जाती है—आसक्ति (Addiction) और द्वेष या प्रतिकर्ष (Aversion)। दोनों ही माया के सूक्ष्म बंधन हैं।

5.         समाधान का मार्ग: मुक्ति संसार को नष्ट करने में नहीं, बल्कि उसकी सीमाओं को समझकर अपने मूल संबंध को पहचानने में है।

6.         समग्र दृष्टि का महत्व: चेतना के विकास और आध्यात्मिक जागृति को समझने के लिए व्यक्तिगत, मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक और सामाजिक सभी आयामों को एक साथ देखना आवश्यक है।

7.         अंतिम बोध: जब मनुष्य विवेक, संतुलन और प्रेम के साथ अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान कर लेता है, तब माया का छल अपना प्रभाव खो देता है और चेतना अपने मूल घर की ओर लौटने लगती है।

संक्षेप में: माया का रहस्य छल में है, और छल का समाधान आत्म-पहचान में है। जब पहचान जागती है, तब संसार का प्रपंच अपना बंधन खो देता है।

सदा आनंद मंगल में रहिए

नरेंद्र पटेल, USA मार्च 14 2026  


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