क्या श्रीजी श्री प्राणनाथजी “संत” हैं?
क्या श्रीजी श्री प्राणनाथजी “संत” हैं? संकेत, संकेतित और अनुभूति के स्तरों से एक दार्शनिक विवेचन “क्या श्रीजी श्री प्राणनाथजी संत हैं?”—यह प्रश्न देखने में सरल है, किंतु निजानन्द दर्शन की दृष्टि से इसका उत्तर केवल “हाँ” या “नहीं” में देना विषय की गहराई को खो देना होगा। इसका कारण “संत” शब्द की गरिमा या सीमितता नहीं, बल्कि यह है कि श्रीजी, प्राणनाथ, ऐतिहासिक व्यक्तित्व और अक्षरातीत प्रियतम—इन शब्दों का प्रयोग अलग-अलग संदर्भों और अनुभूति के अलग-अलग स्तरों पर होता है। जब इन स्तरों का भेद समझे बिना सभी कथनों को एक ही बौद्धिक धरातल पर रख दिया जाता है, तब विरोधाभास दिखाई देने लगते हैं। तारतम वाणी—श्री कुलजम स्वरूप तथा बीतक की आंतरिक तात्त्विक दृष्टि में श्रीजी = प्राणनाथ = अक्षरातीत का अभेद-बोध सामने आता है। यहाँ “प्राणनाथ” को केवल इतिहास में जन्मे और एक निश्चित कालखंड में जीवन जीने वाले व्यक्तित्व के नाम तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता। “प्राणनाथ” उस परम प्रियतम की ओर भी संकेत करता है जो अक्षरातीत है। इसलिए वाणी के भीतर “श्रीजी” और “प्राणनाथ” को सम...