तारतम वाणी में शिवजी, महादेव और सदाशिव: श्रद्धा, चेतना और सत्ता-स्तरों का तारतम्यपूर्ण विवेचन
तारतम वाणी में शिवजी , महादेव और सदाशिव: श्रद्धा , चेतना और सत्ता-स्तरों का तारतम्यपूर्ण विवेचन भूमिका : प्रश्न यह नहीं कि “कौन बड़ा ?”, प्रश्न है—“किसका स्थान कहाँ है ?” भारतीय धार्मिक परम्परा में शिवजी के अनेक नाम मिलते हैं—शिव , शंकर , महादेव , सदाशिव , महेश , रुद्र आदि। सामान्य धार्मिक भाषा में इन नामों को प्रायः एक ही देवता के पर्याय के रूप में समझ लिया जाता है। किंतु तारतम वाणी का अध्ययन करते समय केवल शब्द-समानता के आधार पर अर्थ निर्धारित करना पर्याप्त नहीं है। यहाँ प्रसंग , सत्ता-स्तर , चेतना की अवस्था और ब्रह्माण्डीय भूमिका—इन सभी को साथ लेकर अर्थ समझना पड़ता है। यही कारण है कि तारतम वाणी में कहीं शिवजी विष्णुजी से “बेहद” के विषय में प्रश्न करते दिखाई देते हैं , कहीं उन्हें पाँच विशिष्ट ज्ञानवान चेतनाओं में स्थान दिया गया है , कहीं वे व्रजलीला को अपने मन में ग्रहण करते हैं , कहीं कहा गया है कि शिव-ब्रह्मादिक भी माया का पार नहीं पा सके , और कहीं “सदाशिव” शब्द अक्षरब्रह्म के चित्त की एक विशिष्ट अवस्था के लिए प्रयुक्त होता है। ...