श्री कलश (तोरेत) वाणी : धर्म-संवाद से हकीकत, मारिफ़त और जागनी तक
श्री कलश (तोरेत) वाणी : धर्म-संवाद से हकीकत, मारिफ़त और जागनी तक
श्री निजानन्द दर्शन में श्री कुलजम स्वरूप को परब्रह्म अक्षरातीत श्री राजजी का वाङ्मय स्वरूप माना गया है। इसे केवल किसी संत, कवि, ऋषि, महात्मा अथवा धार्मिक चिन्तक की रचना नहीं, बल्कि दिव्य ज्ञान के अवतरण के रूप में देखा जाता है। इसी कारण इसे ‘श्रीमुख वाणी’ तथा नूरी ज्ञान-स्वरूप की प्रतिष्ठा प्राप्त है। परम्परागत गणना के अनुसार इसके 17 ग्रन्थों, 527 प्रकरणों और 18,758 चौपाइयों में तारतम ज्ञान सुरक्षित है। इस विशाल वाङ्मय में कलश वाणी का स्थान विशेष है। जिस प्रकार किसी मंदिर के शिखर पर कलश प्रतिष्ठित होता है, उसी प्रकार यह श्री कुलजम स्वरूप के ज्ञान-मन्दिर के शिखर का प्रतीक है। यहाँ धर्म, सत्य, माया, आत्म-पहचान, विरह, इश्क़, हकीकत, मारिफ़त और जागनी जैसे विषय अपनी अधिक परिपक्व अभिव्यक्ति प्राप्त करते हैं।
कलश वाणी का उद्देश्य किसी एक धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ सिद्ध करना नहीं है। उसका मूल प्रश्न इससे कहीं गहरा है—धर्म मनुष्य को कहाँ तक ले जाता है? क्या धर्म केवल परम्परा, पहचान, कर्मकाण्ड और सामाजिक व्यवस्था तक सीमित रहता है, या वह मनुष्य को सत्य-असत्य के विवेक, आत्म-पहचान, प्रियतम के प्रेम और अंततः जागनी तक पहुँचाता है? इसी प्रश्न के कारण कलश की दृष्टि बाहरी धार्मिक संरचना से आगे बढ़कर चेतना के रूपान्तरण पर केन्द्रित हो जाती है। धर्म की सार्थकता इस बात से नहीं मापी जाती कि व्यक्ति कितना धार्मिक दिखाई देता है, बल्कि इससे कि उसके भीतर कितनी सत्यनिष्ठा, प्रेम, निर्भीकता, विनम्रता और जागृत विवेक उत्पन्न हुआ है।
श्री कुलजम स्वरूप की अपनी व्याख्यात्मक परम्परा में वेदों का सार श्रीमद्भागवत, भागवत का विशेष सार दशम स्कन्ध और दशम स्कन्ध का हृदय ब्रज एवं रास-लीला में देखा गया है। रास के जिन गहरे रहस्यों को भागवत में संकेतात्मक रूप में छोड़ा गया, उन्हें श्री रास ग्रन्थ में अधिक स्पष्ट किया गया माना जाता है। आगे रास का सार तारतम और तारतम का सार जागनी-विचार कहा गया—“तारतम को जागनी भयो सार।” इस प्रकार ज्ञान की यात्रा वेद से भागवत, भागवत से रास, रास से तारतम और तारतम से जागनी तक आगे बढ़ती है। इसका तात्पर्य यह है कि बाद का प्रकाश पहले को निरस्त नहीं करता; वह उसमें छिपे अर्थ को अधिक गहराई से उद्घाटित करता है। यही सिद्धान्त तोरेत, कुरान, हकीकत और मारिफ़त के पारस्परिक सम्बन्ध को समझने में भी उपयोगी है।
इसी संदर्भ में कलश को ‘नई तोरेत’ कहने का अर्थ समझना चाहिए। यहूदी परम्परा में मूसा से सम्बद्ध तोरेत ईश्वर-केंद्रित जीवन, नैतिकता, सामाजिक व्यवस्था, आज्ञा, मर्यादा और समुदाय की जिम्मेदारियों पर बल देती है। मूसा की इस भूमिका को केवल ‘कर्मकाण्ड’ कहकर कमतर करना उचित नहीं होगा। उनका योगदान मनुष्य और समुदाय को अव्यवस्था से व्यवस्था, स्वेच्छाचार से मर्यादा और सामाजिक विखण्डन से ईश्वर-केंद्रित अनुशासन की ओर ले जाना था। किन्तु धार्मिक यात्रा वहाँ समाप्त नहीं होती। प्रश्न यह है कि आज्ञा के बाद क्या? मर्यादा के बाद क्या? यदि नियम स्वयं अंतिम लक्ष्य बन जाएँ और आत्मिक परिवर्तन पीछे छूट जाए, तो साधन साध्य का स्थान ले लेता है। ‘नई तोरेत’ का आशय इसी बिन्दु पर धर्म को बाहरी विधान से उठाकर अन्तर्बोध, हकीकत, मारिफ़त, प्रेम और जागनी तक ले जाने से है।
इसलिए महामति द्वारा मुहम्मद को प्रदान किए गए विशेष स्थान को भी सही संदर्भ में समझना आवश्यक है। इसका कारण यह नहीं है कि इस्लाम कर्मकाण्ड से मुक्त है। इस्लामी परम्परा में भी नमाज़, रोज़ा, हज और जीवन के विस्तृत धार्मिक विधान हैं। अतः मूसा और मुहम्मद के बीच अंतर कर्मकाण्ड की मात्रा का नहीं, बल्कि महामति की दृष्टि में ज्ञान के उद्घाटन की सम्भावना का है। किरंतन के संबंधित प्रकरण में कुरान के विषय में कहा गया है—“सो वचन लिखे हैं इसारतों, पाइए खुले हकीकत। ऊपले मायने न पाइए, जो अनेक दौड़ाओ मत।।” यहाँ ‘इसारत’ अर्थात् संकेत महत्वपूर्ण है। महामति कुरान को केवल बाहरी विधान का ग्रन्थ नहीं पढ़ते; वे उसके भीतर ऐसी सांकेतिक भाषा देखते हैं जिसमें गहरे आध्यात्मिक सत्य छिपे हुए हैं। मुहम्मद की विशेषता इसलिए यह नहीं कि उन्होंने शरीअत को समाप्त कर दिया, बल्कि यह कि उनके ‘कलाम’ में महामति को हकीकत की ओर खुलने वाले संकेत दिखाई देते हैं।
इस विकास को आज्ञा, मर्यादा, इशारत, हकीकत और मारिफ़त के क्रम में समझा जा सकता है। हकीकत का आशय सत्य को उसके वास्तविक स्वरूप में पहचानना है, जबकि मारिफ़त उस सत्य के गहरे, अनुभूत और सम्बन्धात्मक बोध की दिशा खोलती है। इसी भाव को वाणी में कहा गया—“तिनकी भी है तफसीर, सुनियो गिरो मोमिन। मारफत दरवाजा खोलिया, दिल दीजो नजर वतन।।”यहाँ धर्म का प्रश्न ‘मुझे क्या करना चाहिए?’ से बदलकर ‘मैं कौन हूँ? मेरा वास्तविक वतन कहाँ है? मेरा प्रियतम कौन है? और उससे मेरा मूल सम्बन्ध क्या है?’ बन जाता है। यही वह बिन्दु है जहाँ बाहरी धार्मिक अनुशासन आत्म-पहचान और जागनी की आन्तरिक यात्रा में परिवर्तित होता है।
महामति का मॉडल इसलिए यह नहीं है कि मूसा से मुहम्मद तक पहुँचकर आध्यात्मिक यात्रा समाप्त हो जाती है। अधिक उपयुक्त क्रम है—मूसा आज्ञा और मर्यादा की आधारभूमि देते हैं; मुहम्मद से सम्बद्ध कलाम में महामति इशारत और हकीकत के संकेत देखते हैं; महामति उन संकेतों को हकीकत, मारिफ़त और तारतम के प्रकाश में खोलते हैं; और तारतम अंततः जागनी की ओर ले जाता है। मुहम्मद को प्रदान की गई ऊँचाई इस अर्थ में किसी धार्मिक समुदाय की सामाजिक अथवा नैतिक श्रेष्ठता का दावा नहीं, बल्कि मुख्यतः ज्ञानमीमांसीय महत्त्व का संकेत है—ऐसा ज्ञान-क्षेत्र जिसके भीतर आगे खुलने वाली हकीकत और मारिफ़त के बीज दिखाई देते हैं।
यहीं महामति की अन्तरधार्मिक दृष्टि अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो जाती है। उनके लिए विभिन्न धर्मों का अध्ययन केवल तुलनात्मक धर्मशास्त्र नहीं था, बल्कि जागनी-कार्य का अभिन्न अंग था। हरिद्वार कुम्भ के प्रसंग में उन्होंने विभिन्न हिन्दू आध्यात्मिक परम्पराओं के प्रतिनिधियों को सुना और उनके सामने तारतम ज्ञान प्रस्तुत किया। उनके चिंतन के केंद्र में ईश्वर की एकता—“एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति”, मानवता की एकता—“एक दुनिया”, और प्रेममय भक्ति—“प्रेम ब्रह्म दोऊ एक हैं”—जैसे सूत्र थे। इस दृष्टि में धर्म-संवाद का प्रयोजन नया मिश्रित धर्म बनाना नहीं था, बल्कि विभिन्न परम्पराओं की भाषा के पीछे उपस्थित साझा आध्यात्मिक सत्य को पहचानना था।
हरिद्वार के बाद महामति ने इस संवाद को इस्लामी धार्मिक संसार तक ले जाने का साहसिक निर्णय लिया। उनके लिए यह केवल इस्लाम की आलोचना करना या उसके अनुयायियों को अपनी परम्परा में लाना नहीं था। वे यह जानना चाहते थे कि मुस्लिम विद्वानों को उनके अपने धर्मग्रन्थ के आधार पर ईश्वर और मानवता की एकता कैसे समझाई जा सकती है। मेडता में कलमा, गीता के पुरुष-तत्त्वों और तारतम के बीच अनुभव किए गए तारतम्य को इसी दिशा में समझना चाहिए। “सोई खुदा, सोई ब्रह्म” का भाव यह नहीं कि सभी धार्मिक अवधारणाएँ शब्दशः समान हैं, बल्कि यह कि अलग-अलग धार्मिक भाषाएँ एक ही परम सत्य की ओर संकेत कर सकती हैं। महामति का प्रयास उन संकेतों के बीच पुल बनाना था।
दिल्ली में यह अन्तरधार्मिक दृष्टि एक वास्तविक और जोखिमपूर्ण प्रयोग में बदल गई। उस समय का राजनीतिक और धार्मिक वातावरण भयपूर्ण था। प्रस्तुत बीतक-आधारित विवरण के अनुसार पहले हिन्दू विधिवेत्ता आशाजीत को सानन्ध के ‘नबी और नारायण’ सम्बन्धी विचार समझाने का प्रयास किया गया, किन्तु वह इस खुले धार्मिक समन्वय से भयभीत और असहज हो गया। इसके बाद औरंगज़ेब तक पहुँचने के प्रयास में शेख सुलेमान से सहायता माँगी गई, पर वह भी इस प्रकार के धार्मिक संवाद में अपने लिए खतरा देखकर पीछे हट गया। इन दोनों घटनाओं का महत्त्व यह है कि एक व्यक्ति हिन्दू परम्परा से था और दूसरा मुस्लिम परम्परा से, फिर भी दोनों को रोकने वाली मनोवैज्ञानिक शक्ति समान थी—भय। इससे स्पष्ट होता है कि जागनी की समस्या ‘हिन्दू बनाम मुस्लिम’ नहीं है; वास्तविक संघर्ष भय और विवेक, संकीर्ण पहचान और सत्य-अन्वेषण, तथा सुरक्षा और जागृत साहस के बीच है।
इसी क्रम में महामति ने लालदासजी और गोवर्धनभाई को मुस्लिम धर्मगुरुओं से संवाद के लिए भेजा। दोनों अरब क्षेत्रों में व्यवसाय कर चुके थे और इस्लामी समाज तथा कुरान से कुछ परिचित थे। उनका कार्य किसी मौलवी को परास्त करना नहीं था। उन्हें पहले सुनना था, उसकी धार्मिक समझ को जानना था, यह पहचानना था कि उसके भीतर कौन-से प्रश्न अनुत्तरित हैं और क्या उन प्रश्नों को तारतम ज्ञान के प्रकाश में अधिक व्यापक दृष्टि मिल सकती है। यह पद्धति स्वयं महामति की अन्तरधार्मिक दृष्टि को स्पष्ट करती है—पहले सुनो, फिर समझो, साझा आधार खोजो और उसके बाद संवाद करो।
मौलवी के साथ संवाद के दौरान लालदासजी को कुछ ऐसे संकेत दिखाई देने लगे जिन्हें वे परमधाम और गहरे आध्यात्मिक रहस्यों से जोड़कर समझना चाहते थे। उनकी जिज्ञासा बढ़ती गई और वे संवाद को आगे ले जाना चाहते थे। दूसरी ओर गोवर्धनभाई को आशंका थी कि बातचीत विवाद में बदल सकती है और इससे पूरी जागनी-व्यवस्था खतरे में पड़ सकती है। उस समय के राजनीतिक संदर्भ में यह भय पूरी तरह निराधार भी नहीं था। इसलिए प्रारम्भ में दोनों को ‘एक सही और दूसरा गलत’ के सरल ढाँचे में रखना उचित नहीं होगा। दोनों जागनी-सेवा के प्रति समर्पित थे; अंतर इतना था कि लालदासजी में सत्य-अन्वेषण की निर्भीकता अधिक सक्रिय हुई, जबकि गोवर्धनभाई में सुरक्षा और संभावित खतरे की चेतना अधिक सक्रिय हो गई।
यहीं इस घटना का मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व उभरता है। दो समर्पित साधकों का किसी रणनीति पर अलग मत रखना स्वयं समस्या नहीं था। जागनी-कार्य में भी व्यक्तित्व, जोखिम की समझ और परिस्थिति के आकलन में भिन्नता हो सकती है। वास्तविक प्रश्न यह था कि क्या मतभेद को सत्यनिष्ठा से स्वीकार किया जा सकता है? बीतक-आधारित विवरण के अनुसार लौटते समय दोनों में तीखी चर्चा हुई और गोवर्धनभाई के भीतर यह भय उत्पन्न हुआ कि यदि लालदासजी पूरी घटना श्रीजी के सामने रखेंगे तो उनकी अपनी निष्ठा और साहस पर प्रश्न उठ सकता है। वे श्रीजी के पास पहले पहुँचे और अपने वास्तविक भय तथा मतभेद को स्वीकार करने के बजाय घटना को अधिक अनुकूल रूप में प्रस्तुत करने लगे।
यहीं जागनी का एक अत्यन्त गहरा सिद्धान्त प्रकट होता है। जब हृदय कुछ अनुभव करता है, मन कुछ और सोचता है और वाणी तीसरी बात कहती है, तो व्यक्ति की आन्तरिक अखण्डता टूट जाती है। समस्या भय होना नहीं था; भय को छिपाकर दूसरी छवि प्रस्तुत करना था। आध्यात्मिक जीवन में भूल की तुलना में अपनी वास्तविकता से असत्य होना अधिक गंभीर बाधा बन सकता है। जागनी इसलिए केवल किसी गूढ़ सत्य को जान लेना नहीं है; वह भीतर और बाहर के बीच सामंजस्य की माँग करती है।
जब लालदासजी वहाँ पहुँचे और उन्होंने गोवर्धनभाई का विवरण सुना, तो उन्हें यह असंगति असहनीय लगी। उनकी पीड़ा का सार यह था कि श्रीजी के सामने रहते हुए हमारी चेतना एक प्रकार की होती है और उनसे दूर होते ही भय, संदेह और दूसरा मन सक्रिय हो जाता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि लालदासजी ने दोष केवल गोवर्धनभाई पर नहीं रखा; उन्होंने ‘हम’ की भाषा में पूरे समुदाय की स्थिति पर प्रश्न उठाया। इस प्रकार एक व्यक्तिगत मतभेद सामूहिक आत्मनिरीक्षण में बदल गया। प्रश्न अब यह नहीं था कि किसने क्या कहा; प्रश्न था—क्या दिव्य ज्ञान वास्तव में हमारे चरित्र में उतर चुका है?
यही प्रसंग ‘नई तोरेत’ की अवधारणा को अत्यन्त जीवंत बना देता है। आज्ञा-प्रधान धर्म कह सकता है—गुरु सामने हैं, इसलिए उनकी आज्ञा मानो। लेकिन जागृत धर्म पूछता है—जब गुरु सामने न हों, तब कौन-सी चेतना तुम्हारा मार्गदर्शन करती है? यदि गुरु की प्रत्यक्ष उपस्थिति में निष्ठा हो और उनकी अनुपस्थिति में भय, प्रतिष्ठा या स्वार्थ निर्णय लेने लगें, तो बाहरी आज्ञा अभी जागृत निज-बुद्धि में परिवर्तित नहीं हुई है। नई तोरेत का एक गहरा अर्थ यही है—बाहरी आदेश का भीतर जीवित विवेक बन जाना। मनुष्य केवल इसलिए सत्य न बोले कि गुरु देख रहे हैं, बल्कि इसलिए बोले कि सत्य उसकी अपनी चेतना बन चुका है।
लालदासजी–गोवर्धनभाई के इस प्रसंग के बाद महामति की गहरी अंतर्मुखता को केवल क्रोध या निराशा के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। उनके सामने जागनी-कार्य की मौलिक कठिनाई खुल गई थी। यदि अत्यन्त समर्पित सुन्दरसाथ भी भय, व्यक्तित्व-संघर्ष और आन्तरिक विभाजन से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं, तो विश्व-जागनी किस चेतना के आधार पर आगे बढ़ेगी? यह संकट बाहरी अभियान को एक अधिक गहरी आन्तरिक साधना में परिवर्तित करता है। अनूपशहर की ओर जाना, शारीरिक कष्ट, विरह की तीव्रता और उसके बाद सानन्ध तथा कलश हिन्दुस्तानी का अवतरण इसी पृष्ठभूमि में अधिक सार्थक दिखाई देता है। अब प्रश्न केवल यह नहीं था कि कुरान का सही अर्थ क्या है; प्रश्न यह भी था कि सही अर्थ जानने वाला मनुष्य स्वयं कितना सत्यपूर्ण है।
इसीलिए सानन्ध और कलश हिन्दुस्तानी को केवल इस्लामी शब्दावली की व्याख्या समझना सीमित होगा। उनका एक गहरा प्रयोजन स्वयं सुन्दरसाथ को उसके सांस्कृतिक भय, धार्मिक आत्म-सीमाओं और आधी-अधूरी निष्ठा से बाहर निकालना भी था। यदि परब्रह्म एक हैं तो सत्य किसी एक धार्मिक भाषा का बन्धक नहीं हो सकता। यदि ‘ब्रह्म’ और ‘खुदा’ के शब्द अन्ततः एक परम सत्य की ओर संकेत कर सकते हैं, तो साधक को ‘मेरे धर्म का शब्द’ और ‘दूसरे धर्म का शब्द’ जैसी मनोवैज्ञानिक सीमाओं के पार जाना होगा। हकीकत और मारिफ़त इसलिए केवल धर्मशास्त्रीय अवधारणाएँ नहीं रह जातीं; वे चेतना की सीमाओं के टूटने का प्रतीक बनती हैं।
इस संदर्भ में “दीन यहूद” का ग्रन्थ-स्रोत भी बिल्कुल स्पष्ट रखना आवश्यक है। यह कलश ग्रन्थ का कथन नहीं, बल्कि किरंतन ग्रन्थ, प्रकरण 121 का कथन है। वहाँ श्री देवचन्द्रजी के पश्चात् दो राहों के प्रसंग में कहा गया है—“तिनसे राह जुदी हुई, गिरो दोए हुई झगर। एक उलझे दीन यहूद के, उतरी किताबें दूजे पर।।” इस कथन को यहूदियों की जातीय पहचान, हिन्दू धर्म अथवा किसी आधुनिक हिन्दुवादी विचारधारा का पर्याय बनाना उचित नहीं है। पूर्ववर्ती पूरे विमर्श के आधार पर इसका अधिक गहरा दार्शनिक अर्थ ऐसी धार्मिक चेतना से लिया जा सकता है जो प्राप्त आज्ञा, परम्परा और बाहरी व्यवस्था को इतना अंतिम मान ले कि आगे आने वाले ज्ञान-प्रकाश के प्रति बंद हो जाए। इसके विपरीत मिहिरराजजी की धारा नए ज्ञान-उद्घाटन के लिए खुली रहती है।
बिहारीजी–मिहिरराजजी और लालदासजी–गोवर्धनभाई के प्रसंगों को समान नहीं ठहराना चाहिए, क्योंकि दोनों की ऐतिहासिक और व्यक्तिगत परिस्थितियाँ अलग हैं। फिर भी उनमें एक साझा संरचनात्मक प्रश्न दिखाई देता है। बिहारीजी का प्रसंग पूछता है—क्या प्राप्त धार्मिक संरचना को अंतिम मानकर हम आगे के प्रकाश के प्रति बंद हो सकते हैं? लालदास–गोवर्धन प्रसंग पूछता है—क्या नया ज्ञान स्वीकार कर लेने के बाद भी हम व्यवहार में पुराने भय से संचालित रह सकते हैं? पहले प्रसंग में ज्ञान का ठहराव है; दूसरे में ज्ञान और जीवन के बीच दूरी। दोनों के पार जाने के लिए आवश्यक है सत्य के प्रति खुलापन और आन्तरिक अखण्डता।
इस प्रकार महामति द्वारा मुहम्मद को दिया गया विशेष स्थान और अधिक स्पष्ट हो जाता है। यह इस्लामी कर्मकाण्ड को यहूदी अथवा हिन्दू कर्मकाण्ड से श्रेष्ठ बताने की बात नहीं है। मुहम्मद यहाँ उस धार्मिक ज्ञान-क्षेत्र के प्रतिनिधि बनते हैं जिसके भीतर महामति इशारत और हकीकत का द्वार देखते हैं। मूसा धर्म को व्यवस्था और मर्यादा देते हैं; मुहम्मद से सम्बद्ध कलाम में हकीकत की ओर संकेत मिलते हैं; महामति उन संकेतों को मारिफ़त और तारतम में खोलते हैं; और लालदास–गोवर्धन प्रसंग उस ज्ञान को चरित्र, साहस और सत्यनिष्ठा की कसौटी पर परखता है। इस क्रम में धर्म बाहरी नियम से आन्तरिक जागरण की ओर बढ़ता है।
यहीं हकीकत, मारिफ़त और जागनी का संबंध भी स्पष्ट होता है। इसे सरल सूत्र में कहा जा सकता है—हकीकत सत्य को जानना है, मारिफ़त सत्य को भीतर पहचानना है और जागनी सत्य बनकर जीना है। यदि व्यक्ति गूढ़ धार्मिक रहस्य जानता है, लेकिन अपने भय, स्वार्थ अथवा वास्तविक भाव को छिपाता है, तो उसका ज्ञान अभी चरित्र में नहीं उतरा। यदि ज्ञान व्यक्ति को अधिक अहंकारी बनाता है, तो वह जागनी से दूर ले जा सकता है। इसलिए कलश में विरह का विशेष महत्त्व है। विरह ज्ञान-अहंकार को गलाता है और आत्मा को यह अनुभव कराता है कि प्रियतम की पहचान होने के बावजूद यदि जीवन उस पहचान के अनुरूप नहीं है, तो दूरी अभी बनी हुई है।
विरह इस दृष्टि से केवल प्रियतम से भौतिक दूरी का दुःख नहीं है। वह वह पीड़ा भी है जिसमें साधक अनुभव करता है—मैं सत्य जानता हूँ, फिर भी उसे पूर्णतः जी नहीं रहा; मैं प्रियतम को पहचानता हूँ, फिर भी मन माया में लौट जाता है; मैं एकता की बात करता हूँ, फिर भी भय मुझे विभाजित करता है। यही पीड़ा यदि ईमानदारी से स्वीकार की जाए तो अहंकार को पिघलाकर इश्क़ में बदल सकती है। इस प्रकार यात्रा विस्मृति से पहचान, पहचान से विरह, विरह से इश्क़, इश्क़ से समर्पण और समर्पण से जागनी की ओर बढ़ती है।
कलश में हाथी और सुई के छेद जैसे प्रतीकों को भी लालदास–गोवर्धन प्रसंग के प्रकाश में नई स्पष्टता मिलती है। जागनी-सेवा में साधक को हाथी की तरह निर्भीक होना चाहिए, पर भीतर इतना विनम्र कि सुई के सूक्ष्म छेद से निकल सके। दूसरे धर्म से संवाद करने के लिए निर्भीकता चाहिए, लेकिन अपनी भूल स्वीकार करने के लिए और भी अधिक विनम्रता चाहिए। केवल साहस हो और नम्रता न हो तो संवाद आक्रामकता बन सकता है; केवल नम्रता हो और साहस न हो तो सत्य भय में दब सकता है। जागनी इन दोनों का तारतम्य है—निर्भीक सत्य और अहंकाररहित प्रेम।
इस पूरे प्रसंग से महामति के अन्तरधार्मिक संवाद का एक परिपक्व मॉडल सामने आता है। पहले दूसरे को सुनना, फिर उसकी धार्मिक भाषा को उसके अपने संदर्भ में समझना, उसके भीतर उपस्थित सत्य के संकेतों को पहचानना, अपने ज्ञान को आरोपित करने के बजाय संवाद में रखना और सबसे महत्वपूर्ण—पहले स्वयं उस सत्य को जीवन में उतारना। इस पद्धति में अन्तरधार्मिक संवाद धर्म-परिवर्तन की रणनीति नहीं, बल्कि परस्पर जागरण का साधन बन जाता है। लक्ष्य यह नहीं कि दूसरे को ‘हमारे’ धर्म में लाया जाए; लक्ष्य यह है कि दोनों अपनी-अपनी बाहरी सीमाओं के भीतर छिपी हकीकत को पहचानते हुए अधिक बड़े सत्य की ओर जागें।
इसीलिए किरंतन का कथन—“जब खुली हकीकत मारफत, तब मजहब हुए सब एक। तब सबके दिल धोखा मिट्या, हुए रोशन पाए विवेक।।”—इस पूरे दर्शन का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सूत्र बन जाता है। ‘मजहब एक’ होने का अर्थ ऐतिहासिक धर्मों का लोप या सबको एक संस्था में मिला देना नहीं है। इसका अर्थ है कि जब बाहरी नाम, प्रतीक, भाषाएँ और धार्मिक विधान पारदर्शी होकर उनके पीछे की हकीकत दिखाने लगते हैं, तब गहरी आध्यात्मिक एकता दिखाई देती है। हिन्दू अपनी भाषा रख सकता है, मुस्लिम अपनी भाषा, यहूदी अपनी और ईसाई अपनी; लेकिन जागृत चेतना पूछती है कि इन विविध भाषाओं में सत्य कहाँ मिल रहा है।
यहीं कलश की सबसे कठोर और सबसे आवश्यक कसौटी सामने आती है। इसकी आलोचना सबसे पहले दूसरे धर्मों पर नहीं, स्वयं सुन्दरसाथ पर लागू होनी चाहिए। यदि हम कर्मकाण्ड की आलोचना करते हुए अपने नए कर्मकाण्ड बना लें, यदि तारतम को मानते हुए नए प्रश्नों से भयभीत हो जाएँ, यदि सर्वधर्म-समन्वय की बात करते हुए वास्तविक अन्तरधार्मिक संवाद से बचें, यदि हकीकत और मारिफ़त की चर्चा करते हुए अपनी भूल स्वीकार न कर सकें, तो कलश का ज्ञान अभी हमारे भीतर पूर्णतः प्रतिष्ठित नहीं हुआ है। लालदास–गोवर्धन घटना इसी आत्मपरीक्षण की आवश्यकता को उजागर करती है।
अतः ‘कलश—नई तोरेत’ का परिपक्व अर्थ नया धार्मिक विधान नहीं, बल्कि धार्मिक चेतना का उत्कर्ष है। तोरेत धर्म को आज्ञा और मर्यादा देती है; कुरानी इशारत बाहरी विधान के भीतर हकीकत की सम्भावना खोलती है; महामति हकीकत को मारिफ़त और तारतम में प्रकाशित करते हैं; अन्तरधार्मिक संवाद उस ज्ञान को दूसरे धार्मिक संसार के सामने परखता है; लालदास–गोवर्धन प्रसंग उस ज्ञान को स्वयं साधक की सत्यनिष्ठा पर कसता है; विरह शेष अहंकार और विभाजन को गलाता है; इश्क़ आत्मा को प्रियतम से जोड़ता है; और जागनी ज्ञान को जीवित चरित्र तथा सेवा में बदल देती है।
इस पूरी यात्रा को एक सूत्र में कहा जा सकता है—आज्ञा से मर्यादा, मर्यादा से संवाद, संवाद से इशारत, इशारत से हकीकत, हकीकत से मारिफ़त, मारिफ़त से तारतम-विवेक, तारतम से आत्म-पहचान, आत्म-पहचान से आन्तरिक अखण्डता, वहाँ से विरह और इश्क़, और अंततः जागृत निज-बुद्धि तथा सर्वधर्म-संवादी जागनी-सेवा।
सदा आनंद मंगल में रहिए
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