स्वतंत्रता, धर्म और जागनी


स्वतंत्रता, धर्म और जागनी

तारतम वाणी की दृष्टि से सुन्दरसाथ के लिए एक चिंतन

अमेरिका में इन दिनों एक महत्वपूर्ण वैचारिक चर्चा चल रही है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का विचार मोटे रूप में यह है कि जब समाज में ईसाई धार्मिकता और नैतिक अनुशासन मजबूत थे, तब व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मुक्त बाजार अपेक्षाकृत अच्छी तरह काम कर सकते थे; लेकिन जैसे-जैसे धार्मिक-सामाजिक मर्यादाएँ कमजोर हुईं, केवल व्यक्ति की स्वतंत्रता पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं रहा। इसलिए सरकार को समाज के “सामान्य हित” की रक्षा के लिए अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। इसके उत्तर में लेखक डेविड फ्रेंच एक मूल प्रश्न उठाते हैं—यदि सरकार ही यह निर्धारित करने लगे कि अच्छा जीवन क्या है, उचित व्यवसाय कौन-सा है, कौन-सा सामाजिक आचरण नैतिक है और व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का उपयोग कैसे करे, तो अंततः “निर्णय कौन करेगा?” यह राजनीतिक प्रश्न सुन्दरसाथ के लिए एक बहुत गहरे आध्यात्मिक प्रश्न का द्वार खोलता है—मनुष्य को श्रेष्ठ बनाने का स्थायी उपाय बाहर से अधिक नियंत्रण है या भीतर से अधिक जागृति?

तारतम वाणी की दृष्टि से समस्या केवल स्वतंत्रता की नहीं, बल्कि अजागृत चेतना द्वारा स्वतंत्रता के उपयोग की है। यदि स्वतंत्रता का अर्थ केवल “जो मेरा मन चाहे, मैं वही करूँ” रह जाए, तो मनुष्य बाहर से स्वतंत्र दिखाई देते हुए भी भीतर से इच्छाओं, लोभ, प्रतिष्ठा, उपभोग, भय और अहंकार का दास हो सकता है। संसार की वस्तुएँ आवश्यकता पूरी कर सकती हैं, लेकिन आत्मा की मूल प्यास को नहीं। इसलिए जागनी का समाधान स्वतंत्रता छीनना नहीं, बल्कि स्वतंत्रता का रूपांतरण करना है। नियंत्रण कहता है—“ऐसा मत करो”; जागनी पूछती है—“पहले पहचानो कि तुम वास्तव में कौन हो, तुम्हारा मूल घर कहाँ है, तुम्हारा वास्तविक सम्बन्ध किससे है और तुम्हारी सुरता कहाँ लगी हुई है।” निजानन्द–प्रणामी दर्शन में भी सुन्दरसाथ की साधना को इसी आत्म-पहचान, धाम-संबंध, चितवन और रहेनी की दिशा में समझाया गया है।

यहीं धर्म और आध्यात्मिक जागृति के बीच महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। किसी समाज में धार्मिक पहचान, पूजा-पद्धति या धार्मिक संस्थाएँ बढ़ जाएँ, इससे अपने-आप यह सिद्ध नहीं होता कि उसकी चेतना भी ऊँची हो गई। तारतम वाणी कहती है—“सब कहें वजूद एक है, और सब में एकै दम। सब कहें साहब एक है, पर सबकी बड़े रसम।।” अर्थात् सब एक साहेब और एक जीवन-सत्ता को स्वीकार करते हुए भी रस्मों और पहचानों में विभाजित हो सकते हैं। इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि समाज कितना धार्मिक है; अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है—क्या धर्म मनुष्य को अधिक सत्यनिष्ठ, प्रेमपूर्ण, विनम्र, न्यायशील और करुणामय बना रहा है? क्या दूसरे धर्म, मत और विचार वाले व्यक्ति के प्रति उसका हृदय अधिक खुल रहा है? यदि धार्मिकता बढ़ती जाए लेकिन अहंकार, द्वेष और विभाजन भी बढ़ते जाएँ, तो उसे जागनी नहीं कहा जा सकता।

तारतम वाणी बाहरी धार्मिकता से अधिक भीतर और बाहर की एकता पर बल देती है। वाणी कहती है—“ए जो दोए दिल राखत हैं, ए तो दुनियां की रीत। माहें मैले बाहेर उजले…” और ब्रह्मसृष्टि के विषय में कहती है—“एकै बात ब्रह्मसृष्ट की, दोए दिल में नाहें। सोई करें धनी सो जाहेर, जैसी होए दिल माहें।।” इसका अर्थ यह है कि आध्यात्मिकता की वास्तविक परीक्षा हमारे धार्मिक शब्दों से नहीं, बल्कि हमारी कथनी और करनी की एकता से होती है। यही कसौटी राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व पर भी लागू होती है। कोई नेता कितना धार्मिक बोलता है, उससे आगे यह देखना होगा कि क्या वह अपने विरोधी की स्वतंत्रता और गरिमा की भी उतनी ही रक्षा करता है जितनी अपने समर्थक की; क्या उसके धर्म से प्रेम बढ़ता है या भय; और क्या वह सत्ता को सेवा का माध्यम मानता है या दूसरों पर अपनी इच्छा लागू करने का अधिकार।

इस संदर्भ में स्वतंत्रता के भी अलग-अलग स्तर समझे जा सकते हैं। पहला है इच्छाओं की स्वतंत्रता—“जो इच्छा उठे, उसे पूरा करने का मुझे अधिकार है।” यह आवश्यक नागरिक स्वतंत्रता का एक पक्ष हो सकता है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से व्यक्ति अभी अपनी इच्छाओं का दास हो सकता है। दूसरा स्तर है उत्तरदायी स्वतंत्रता—“मैं स्वतंत्र हूँ, लेकिन मेरे कर्मों का प्रभाव परिवार, समाज और दूसरे मनुष्यों पर पड़ता है।” यहाँ मर्यादा, सेवा, करुणा, कर्तव्य और न्याय आते हैं। तीसरा और अधिक गहरा स्तर है जागृत स्वतंत्रता—“मेरे भीतर उठने वाली प्रत्येक इच्छा मुझे चलाने के लिए बाध्य नहीं कर सकती।” तारतम वाणी का सूत्र है—“सुरता एक ही रखिये, मूल मिलावे माहें।” जब सुरता मूल की ओर लगती है, तब स्वतंत्रता समाप्त नहीं होती; उसका रूपांतरण होता है—इच्छा विवेक में, स्वार्थ सेवा में, अहंकार समर्पण में और भोग प्रेम में बदलने लगता है।

यहाँ “हुक्म” को भी ठीक प्रकार से समझना आवश्यक है। तारतम वाणी में हुक्म का अर्थ किसी मनुष्य या संस्था द्वारा दूसरे मनुष्य पर मनमाना नियंत्रण नहीं है। हुक्म उस व्यापक दिव्य व्यवस्था और धनी की इच्छा की ओर संकेत करता है जिसके भीतर यह समस्त लीला घटित होती है। इसलिए हुक्म को जानने का अर्थ अपनी नैतिक जिम्मेदारी से बचना नहीं है। कोई यह नहीं कह सकता कि “सब कुछ हुक्म से हो रहा है, इसलिए मेरे शुभ-अशुभ कर्मों का कोई महत्व नहीं।” हुक्म-बोध वास्तव में कर्तापन के अहंकार को कम करता है, लेकिन करणी की जिम्मेदारी को समाप्त नहीं करता। इसीलिए तारतम परम्परा में कहनी से अधिक रहेनी पर बल है—“कहनी सुननी गई रात में, आया रहनी का दिन।” केवल सत्य की चर्चा पर्याप्त नहीं; वह जीवन में दिखाई देना चाहिए।

निजानन्द–प्रणामी दर्शन में सुन्दरसाथ की अवधारणा इसी कारण केवल किसी धार्मिक सम्प्रदाय की सदस्यता नहीं है। वह एक विशेष चेतना, आत्मीयता और एकदिली का नाम है। वाणी कहती है—“सुन्दरसाथ बैठा अचरज सों, जानो एकै अंग हिल मिल। अंग अंग सब के मिल रहे, सब सोभित हैं एक दिल।।” यहाँ अनेक व्यक्तियों को एक जैसा बनाने की बात नहीं है; अनेकता के भीतर एक हृदय होने की बात है। एकरूपता और एकदिली में बड़ा अंतर है। एकरूपता कहती है—“सब मेरे जैसे बनें”; एकदिली कहती है—“हमारे विचार, संस्कृतियाँ और जीवन-अनुभव अलग हो सकते हैं, फिर भी हम प्रेम में जुड़े रह सकते हैं।” सुन्दरसाथ की सामाजिक कल्पना इसी दूसरे प्रकार की है।

महामति की दृष्टि धार्मिक विविधता के प्रति भी अत्यंत व्यापक है। वाणी कहती है—“नाम सारों जुदे धरे, लई सबों जुदी रसम। सब में उम्मत और दुनिया, सोई खुदा सोई ब्रह्म।।” और फिर इससे भी स्पष्ट घोषणा करती है—“जात एक खसम की, और न कोई जात। एक खसम एक दुनिया, और उड़ गई दूजी बात।।” इसका अर्थ सभी धर्मों और परम्पराओं को मिटाकर एक धार्मिक व्यवस्था स्थापित करना नहीं है। इसका अर्थ है कि नाम और रस्म अलग होने पर भी जागृत दृष्टि उनके पीछे स्थित मूल एकता को पहचान सके। इसलिए जागनी का उद्देश्य भिन्नता को मिटाना नहीं, भेद-दृष्टि को मिटाना है। दूसरे को अपने जैसा बनाना आवश्यक नहीं; दूसरे में भी उसी मूल सत्ता और उसी धनी का सम्बन्ध पहचानना आवश्यक है।

तारतम वाणी प्रेम और ज्ञान के संतुलन को भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानती है—“एक इस्क दूजा इलम…” प्रेम जोड़ता है और ज्ञान दिशा देता है। केवल प्रेम हो लेकिन विवेक न हो तो भावुकता या अंधानुकरण उत्पन्न हो सकता है; केवल ज्ञान हो लेकिन प्रेम न हो तो ज्ञान अहंकार और वाद-विवाद का साधन बन सकता है। इसी प्रकार किसी समाज को केवल स्वतंत्रता, केवल कानून, केवल धर्म या केवल बाजार से स्वस्थ नहीं बनाया जा सकता। स्वस्थ समाज के लिए स्वतंत्रता के साथ विवेक, ज्ञान के साथ प्रेम, अधिकार के साथ उत्तरदायित्व और धर्म के साथ आत्म-जागृति आवश्यक है।

इस पूरे विषय का शायद सबसे गहरा आध्यात्मिक बोध यह है कि माया केवल बाजार और भोग में नहीं होती। माया राजनीति में प्रवेश कर सकती है, धार्मिक संस्था में प्रवेश कर सकती है, सम्प्रदाय में प्रवेश कर सकती है और आध्यात्मिक नेतृत्व में भी प्रवेश कर सकती है। यदि हम उपभोक्तावाद के अहंकार से परेशान होकर सारी शक्ति धार्मिक या राजनीतिक सत्ता को सौंप दें, तो आवश्यक नहीं कि अहंकार समाप्त हो गया हो। संभव है कि अहंकार ने केवल अपनी कुर्सी बदल ली हो। पहले वह कहता था—“मेरे पास अधिक धन और वस्तुएँ हों”; फिर वह कह सकता है—“मेरा धर्म श्रेष्ठ हो”; उसके बाद—“मेरी व्याख्या सब पर लागू हो”; और अंततः—“जो मुझसे सहमत नहीं, वह गलत है।” इसलिए तारतम वाणी समस्या की जड़ तक पहुँचकर “खुदी” पर प्रहार करती है—“मारा कह्या काढ़ा कह्या, और कह्या हो जुदा। एही में खुदी टले, तब बाकी रह्या खुदा।।”

यही कारण है कि तारतम वाणी का समाधान न अनियंत्रित व्यक्तिवाद है, न धार्मिक अधिनायकवाद; उसका समाधान है—जागनी। पहले मनुष्य अपनी वास्तविक पहचान के प्रति जागे; फिर उसका विवेक परिपक्व हो; फिर हृदय विस्तृत हो और दूसरे को भी अपने आत्मिक सम्बन्ध में देखना सीखे; फिर वह अपने भीतर के क्रोध, लोभ, भय, ईर्ष्या, मोह और खुदी को पहचाने; और अंततः इस जागृति को संसार में प्रेम, सेवा और उत्तरदायित्व के रूप में जीए। जागनी संसार से भागने की साधना नहीं है। उसका भाव है—“सुख शीतल करूँ संसार।” स्वयं जागकर संसार को अधिक सुखद, शांत, प्रेमपूर्ण और शीतल बनाना उसकी स्वाभाविक परिणति है।

इसलिए जेडी वेंस और डेविड फ्रेंच के बीच चल रही यह आधुनिक राजनीतिक बहस सुन्दरसाथ के लिए किसी राजनीतिक पक्ष को चुनने से अधिक आत्म-परीक्षण का अवसर बन सकती है। स्वतंत्रता बिना विवेक के स्वच्छंदता बन सकती है; धर्म बिना प्रेम के कट्टरता बन सकता है; ज्ञान बिना विनम्रता के अहंकार बन सकता है; सत्ता बिना आत्म-जागृति के नियंत्रण बन सकती है; और आध्यात्मिकता बिना रहेनी के केवल शब्द बनकर रह सकती है। महामति की दिशा इन सभी से आगे जाती है—मनुष्य को केवल नियंत्रित मत करो, उसकी सुरता जगाओ; केवल धार्मिक पहचान मत दो, धनी की पहचान कराओ; केवल नियम मत दो, प्रेम और विवेक जगाओ; और संसार को सुधारने से पहले अपने भीतर की खुदी को पहचानो।

अंततः सुन्दरसाथ के लिए इस पूरे चिंतन का सार इतना है—बाहरी नियंत्रण मनुष्य के व्यवहार को कुछ समय के लिए रोक या बदल सकता है, लेकिन तारतम की जागनी उसकी दृष्टि बदलती है; और जब दृष्टि बदलती है, तो रहेनी बदलने लगती है। यही सुन्दरसाथत्व का गहरा अर्थ है—केवल किसी सम्प्रदाय से जुड़ जाना नहीं, बल्कि ऐसी जागृत चेतना में जीना जिसमें स्वतंत्रता उत्तरदायित्व में, ज्ञान विवेक में, भिन्नता एकदिली में, और जीवन प्रेम तथा सेवा में रूपांतरित होने लगे।


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