तारतम वाणी में शिवजी, महादेव और सदाशिव: श्रद्धा, चेतना और सत्ता-स्तरों का तारतम्यपूर्ण विवेचन

तारतम वाणी में शिवजी, महादेव और सदाशिव: श्रद्धा, चेतना और सत्ता-स्तरों का तारतम्यपूर्ण विवेचन

 

भूमिका : प्रश्न यह नहीं कि “कौन बड़ा?”, प्रश्न है—“किसका स्थान कहाँ है?”

 

भारतीय धार्मिक परम्परा में शिवजी के अनेक नाम मिलते हैं—शिव, शंकर, महादेव, सदाशिव, महेश, रुद्र आदि। सामान्य धार्मिक भाषा में इन नामों को प्रायः एक ही देवता के पर्याय के रूप में समझ लिया जाता है। किंतु तारतम वाणी का अध्ययन करते समय केवल शब्द-समानता के आधार पर अर्थ निर्धारित करना पर्याप्त नहीं है। यहाँ प्रसंग, सत्ता-स्तर, चेतना की अवस्था और ब्रह्माण्डीय भूमिका—इन सभी को साथ लेकर अर्थ समझना पड़ता है।

 

यही कारण है कि तारतम वाणी में कहीं शिवजी विष्णुजी से “बेहद” के विषय में प्रश्न करते दिखाई देते हैं, कहीं उन्हें पाँच विशिष्ट ज्ञानवान चेतनाओं में स्थान दिया गया है, कहीं वे व्रजलीला को अपने मन में ग्रहण करते हैं, कहीं कहा गया है कि शिव-ब्रह्मादिक भी माया का पार नहीं पा सके, और कहीं “सदाशिव” शब्द अक्षरब्रह्म के चित्त की एक विशिष्ट अवस्था के लिए प्रयुक्त होता है।

 

यदि इन सभी उल्लेखों को एक ही अर्थ में पढ़ लिया जाए, तो विरोधाभास प्रतीत हो सकता है। किंतु तारतम्यपूर्वक देखने पर यह विरोधाभास मिट जाता है।

 

तारतम वाणी का उद्देश्य शिवजी का महत्त्व घटाना नहीं है। वह उनसे जुड़ी श्रद्धा को नकारती भी नहीं है। वह केवल यह पूछती है—

 

शिवजी कौन हैं? उनका आध्यात्मिक और ब्रह्माण्डीय स्थान क्या है? उनकी अनुभूति की ऊँचाई क्या है? और उस ऊँचाई के भी परे क्या है? यही प्रश्न तारतम ज्ञान की विशेषता है।

 

1. शिवजी : एक महान योगी और सत्य के खोजी

 

तारतम वाणी में शिवजी का एक अत्यंत सुंदर स्वरूप सामने आता है—वे केवल पूजित देवता नहीं, बल्कि सत्य के जिज्ञासु और बेहद की खोज करने वाले महान योगी हैं।

 

वाणी कहती है—

आव्या ते बुधना सागर, बुध रूदे भराणी।

भगवानजी ने महादेवजी, पूछे बेहद वाणी।।३।।“

 

एक अन्य पाठ में यही भाव इस प्रकार आता है—

ना तो आए बुध के सागर, गुन खट ग्यानी।

भगवानजी को महादेवजी, पूछे बेहद वानी।।३।।“

 

यहाँ महादेवजी की सीमा नहीं, पहले उनकी महानता दिखाई देती है। संसार में छह शास्त्रों के ज्ञाता, मुनि, दार्शनिक और बुद्धि के सागर कहे जाने वाले लोग हुए; फिर भी “बेहद” का प्रश्न उनसे परे बना रहा। स्वयं महादेवजी इस उच्चतर सत्य के विषय में प्रश्न करते हैं।

 

यह प्रश्न करना ही उनकी चेतना की परिपक्वता है। वे यह नहीं कहते—“मैं महादेव हूँ, इसलिए मुझे सब ज्ञात है।” वे पूछते हैं।

यही वास्तविक ज्ञान का पहला लक्षण है—अपने ज्ञान की सीमा का बोध।

 

विष्णुजी उत्तर देते हैं—

विष्णु कहे सिवजी सुनो, तुम पूछत हो जेह।

आद करके अबलों, अगम कहियत है एह।।४।।“

 

अर्थात् जिस बेहद के रहस्य के बारे में शिवजी पूछ रहे हैं, उसे सृष्टि के आरम्भ से मन और वाणी से अगम कहा जाता रहा है।

 

शिवजी आगे भी रुकते नहीं—

फेर पूछे सिव विष्णु को, कहे ब्रह्मांड और।

और ब्रह्मांड की वारता, क्यों पाइए इन ठौर।।६।।“

 

यहाँ शिवजी की छवि एक Cosmic Seeker—ब्रह्माण्डीय खोजी के रूप में सामने आती है। वे जानना चाहते हैं कि क्या दिखाई देने वाले इस ब्रह्माण्ड के अतिरिक्त भी अन्य ब्रह्माण्ड हैं।

अतः तारतम वाणी के शिवजी श्रद्धा के विषय तो हैं ही, साथ-साथ अनन्त सत्य की खोज के प्रतीक भी हैं।

 

2. शिवजी की महानता स्वीकार करना और उन्हें परम मान लेना—दो अलग बातें हैं

 

तारतम वाणी का मूल दृष्टिकोण यहीं समझना आवश्यक है।

किसी सत्ता को महान मानना और उसे अंतिम परम सत्ता मान लेना एक बात नहीं है। इसी अंतर को यह चौपाई स्पष्ट करती है—

 

ए माया छे अति बलवंती, उपनी छे मूल धणी थकी।

मुनिजन ने मनाव्या हार, सिव ब्रह्मादिक न लहे पार।।४।।“

 

माया अत्यन्त बलवती है। बड़े-बड़े मुनि उसके आकर्षण के सामने पराजित हो जाते हैं और शिव-ब्रह्मादिक भी उसके सम्पूर्ण रहस्य का पार नहीं पा सकते।

 

पहली दृष्टि में कोई पूछ सकता है—यदि शिवजी इतने महान हैं तो उन्हें माया का पार क्यों नहीं मिला? यहीं “तारतम” समझना आवश्यक है। किसी चेतना का अत्यन्त ऊँचा होना यह सिद्ध नहीं करता कि वही अस्तित्व की अंतिम सीमा है।

 

एक पर्वत बहुत ऊँचा हो सकता है, किंतु उससे ऊँचा पर्वत भी हो सकता है। इसी प्रकार चेतना के स्तरों में कोई सत्ता अत्यन्त उच्च हो सकती है, किंतु उसके ऊपर भी व्यापक सत्ता-क्षेत्र उपस्थित हो सकते हैं।

 

इसलिए “सिव ब्रह्मादिक न लहे पार” शिवजी की निन्दा नहीं है। यह ब्रह्माण्डीय सीमा का कथन है। तारतम वाणी का संदेश है— महान को महान मानो; पर महान को परम मत बना दो।

 

3. यह सीमा केवल शिवजी की नहीं—विष्णुजी भी अपनी सीमा स्वीकार करते हैं

 

यदि कोई यह समझे कि तारतम वाणी शिवजी को नीचे दिखाकर विष्णुजी को सर्वोच्च बनाती है, तो स्वयं वाणी उसका निराकरण कर देती है।

 

लक्ष्मीजी के प्रश्न के उत्तर में विष्णुजी कहते हैं—

सुनो लखमीजी कहूँ तुमको, पेहेले सिवे पूछा हमको।

इन लीला की खबर मुझे नांहें, सो क्यों कहूं मैं इन जुबांए।।२५।।“

 

गुजराती पाठ में—

सांभलो लखमीजी कहूं तमने, ए आगे सिवे पूछ्यूं अमने।

पण ए लीलानी मूने खबरज नथी, तो केम कहूं तमने मुख थकी।।२४।।“

 

यह कथन अत्यन्त महत्वपूर्ण है। शिवजी विष्णुजी से पूछते हैं, पर विष्णुजी स्वयं स्वीकार करते हैं— “उस लीला की पूर्ण खबर मुझे भी नहीं है।”

 

अर्थात् तारतम वाणी किसी एक देवता को गिराकर दूसरे को अंतिम परमात्मा घोषित करने की साम्प्रदायिक पद्धति नहीं अपनाती। वह प्रत्येक सत्ता की अनुभूति की सीमा बताती है। यहीं से एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सिद्धान्त निकलता है— सच्ची महानता सर्वज्ञ होने का दावा करने में नहीं, अपनी सीमा पहचानने में भी प्रकट होती है।

 

शिवजी प्रश्न करते हैं। विष्णुजी स्वीकार करते हैं कि वे नहीं जानते। दोनों प्रसंग आध्यात्मिक विनम्रता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

 

4. “शिवजी” और “सदाशिव चेतन” को एक नहीं समझना चाहिए

 

तारतम वाणी समझने में यह सबसे आवश्यक सावधानी है।

एक अत्यन्त महत्वपूर्ण चौपाई है—

 

अछर चितमें ऐसो भयो, ताको नाम सदा सिव कह्यो।

बृज रास दोऊ ब्रह्मांड, ए ब्रह्म लीला भई अखंड।।४९।।“

 

यहाँ वाणी स्वयं “सदाशिव” की परिभाषा देती है—

अछर चित में ऐसो भयो, ताको नाम सदाशिव कह्यो।”

 

अर्थात् इस विशिष्ट प्रसंग में “सदाशिव” केवल कैलाशवासी शिवजी का दूसरा नाम नहीं है। यह अक्षरब्रह्म के चित्त की एक विशिष्ट ब्रह्माण्डीय अवस्था की ओर संकेत करता है। तारतम परम्परा की व्याख्या में इसे सबलिक ब्रह्म के चित्त और “सदाशिव चेतन” से जोड़ा जाता है। अतः तीन प्रयोगों को अलग-अलग पहचानना आवश्यक है—

 

शिवजी अथवा महादेवजी — महान योगी, ज्ञानी, ध्यान-सिद्ध एवं बेहद के जिज्ञासु।

 

सदाशिव — कुछ स्थानों पर शैव परम्परा के आराध्य देव के प्रचलित नाम के अर्थ में।

 

सदाशिव चेतन — विशिष्ट तारतम ब्रह्माण्ड-विज्ञान में अक्षरब्रह्म के चित्त-सबलिक से संबंधित अवस्था या स्वरूप।

 

शब्द समान हो सकते हैं, किंतु संदर्भ समान होना आवश्यक नहीं।

 

5. महादेवजी द्वारा व्रजलीला को ग्रहण करना

 

शिवजी की आध्यात्मिक ऊँचाई का एक और महत्त्वपूर्ण प्रमाण व्रजलीला से उनका सम्बन्ध है।

 

वाणी कहती है—

महादेवजीऐं बृज लीला, ग्रहयो अखंड ब्रह्मांड।

अछर चित सदासिव, ए यों कहावे अखंड।।९५।।“

 

एक अन्य रूप—

महादेवजीऐं वृजलीला, ग्रह्यो अखंड ब्रह्मांड।

अछर चित चोकस थयो, ए एम कहावे अखंड।।९०।।“

 

यहाँ दो स्तर साथ उपस्थित हैं। पहला—महादेवजी ने व्रज की अखण्ड लीला को अपने ध्यान में ग्रहण किया। दूसरा—उस लीला का अखण्ड स्वरूप अक्षरब्रह्म के चित्त से संबंधित है।

 

इसी भाव को एक अन्य चौपाई और स्पष्ट करती है—

आतम विष्णु नाचत बुध सनत जी, गोकुल ग्रह्यो सिव मन।

करम सुकदेव नाचत नचवत, गावत प्रगट वचन।।१३।।“

 

विशेष शब्द हैं— “गोकुल ग्रह्यो सिव मन।” अर्थात् शिवजी के मन ने गोकुल की लीला को ग्रहण किया। यह कोई साधारण आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं है। इससे शिवजी की ध्यान-गहराई और सूक्ष्म ग्रहणशीलता प्रकट होती है। इसलिए उन्हें केवल “एक महान तपस्वी” कहना भी अधूरा होगा। वे अखण्ड लीला के प्रति अत्यन्त संवेदनशील, ध्यानस्थ और उच्च अनुभूति वाले योगी हैं।

 

6. पाँच विशिष्ट रत्नों में शिवजी

 

तारतम वाणी शिवजी को विशेष सम्मान देती है—

पेहेले कहे मैं साथ को, इन पांचों के नाम।

सुकदेव और सनकादिक, कबीर सिव भगवान।।७।।“

 

इसी प्रकार—

पण साथ माटे कहूं फरी फरी, हवे पांचे नाम जो जो चित धरी।

एक भगवानजी वैकुंठनो नाथ, महादेवजी पण एणे साथ।।९।।

 

यहाँ शिवजी उन विशिष्ट चेतनाओं में सम्मिलित हैं जिनका सम्बन्ध उच्च ज्ञान, बेहद और आध्यात्मिक खोज से है।

इससे तारतम वाणी की स्थिति स्पष्ट हो जाती है— वह शिव-विरोधी नहीं है। और वह शिव को अक्षरातीत परम सत्य के समान भी नहीं रखती। उसका मार्ग है— सम्मान + विवेक + तारतम्य।

 

7. विवाद देवताओं में नहीं, मनुष्य की “मेरा ही सर्वोच्च” वृत्ति में है

 

तारतम वाणी का सबसे आधुनिक और सार्वकालिक संदेश उन चौपाइयों में मिलता है जहाँ विभिन्न सम्प्रदायों के परस्पर विवाद का उल्लेख है—

 

कोई कहे सदा सिव मोटो, कोई कहे आद नारायण।

कोई कहे आद सक्त मोटी, एम करे ताणोंताण।।११।।“

 

इसी भाव को दूसरी चौपाई कहती है—

कोई कहे सदा सिव बड़ा, कोई कहे आद नारायन।

कोई कहे आदें आद माता, यों लरें तानों तान।।१०।।“

 

कोई कहता है—

कोई कहे ओ सदा सिव, और न कोई देव।

कोई कहे आद नारायन, करत कमला जाकी सेव।।८।।“

 

और कोई—

कोई कहे आदे आद माता, और न कोई क्यांहें।

सिव नारायन सबे याथें, या बिन कछुए नाहें।।९।।“

 

इन चौपाइयों की गहराई केवल इतनी नहीं है कि शैव, वैष्णव और शाक्त परस्पर विवाद करते थे। यह मनुष्य की एक सार्वभौमिक मनोवृत्ति का वर्णन है— “जिसे मैं पूजता हूँ, वही अंतिम है।” समस्या शिवभक्ति नहीं है। समस्या विष्णुभक्ति नहीं है। समस्या शक्तिभक्ति भी नहीं है। समस्या है—भक्ति के साथ उत्पन्न होने वाला अहंकार और निरपेक्ष दावा।

 

इसीलिए वाणी कहती है—

कई सिवी कई वैष्नवी, कई साखी समरथ।

लिए जो सारे गुमाने, सब खेलें छल अनरथ।।१३।।“

 

यहाँ निर्णायक शब्द है—गुमान।” आलोचना सम्प्रदाय की नहीं, अहंकार की है। भक्ति जब प्रेम और विनम्रता देती है, तब वह साधना है। भक्ति जब “मेरा ही सत्य है” का गुमान देती है, तब वही भक्ति विभाजन का कारण बन सकती है।

 

8. तारतम की ज्योति किसी एक देवता पर रुकती नहीं

 

वाणी कहती है—

ए जोत पकड़ी ना रहे, चली इंड फोड सुन्य निराकार।

सदासिव महाविष्णु निरंजन, सब प्रकृत को कियो निरवार।।१६।।“

 

यह तारतम ज्ञान के उद्देश्य को अत्यन्त स्पष्ट रूप से व्यक्त करती है। ज्ञान की ज्योति किसी एक ब्रह्माण्ड, किसी एक देवता, किसी एक सम्प्रदाय या किसी एक दार्शनिक अवस्था पर रुक नहीं जाती। वह आगे बढ़ती है। ब्रह्माण्ड को भेदती है ।सदाशिव के स्तर का विवेचन करती है। महाविष्णु से आगे जाती है। शून्य, निराकार और निरंजन के स्तरों को भी समझाती है।

और सम्पूर्ण प्रकृति-मण्डल के पार के सत्य की ओर दृष्टि खोलती है। अतः तारतम ज्ञान का अर्थ किसी देवता को अस्वीकार करना नहीं है। तारतम का अर्थ है—किसी भी स्तर को अंतिम मानकर रुक न जाना।

 

9. शिवजी की सबसे बड़ी शिक्षा : “मैं जानता हूँ” से “मैं जानना चाहता हूँ” तक

 

आधुनिक मनुष्य के लिए शिवजी के इस स्वरूप में अत्यन्त गहरी प्रेरणा है। धार्मिक परम्परा अक्सर हमें उत्तर देती है। लेकिन शिवजी हमें प्रश्न करना भी सिखाते हैं। वे पूछते हैं— बेहद क्या है? अन्य ब्रह्माण्ड हैं? इस लीला का रहस्य क्या है? यह प्रश्न उनकी कमजोरी नहीं है। यही उनकी आध्यात्मिक ऊँचाई है।

 

ज्ञान का अपरिपक्व रूप कहता है— “मैं जानता हूँ।” ज्ञान का परिपक्व रूप कहता है— “मैंने बहुत जाना है, किंतु सत्य इससे भी बड़ा हो सकता है।” और आध्यात्मिक विनम्रता कहती है—

जो अभी मेरी अनुभूति से परे है, उसकी खोज जारी रखूँगा।”

तारतम वाणी में शिवजी इसी विनम्र जिज्ञासा के महान प्रतीक बनकर सामने आते हैं।

 

10. “महादेव” कहना और “परम अक्षरातीत सत्ता” मानना एक बात नहीं

 

धार्मिक भाषा में “महादेव”, “भगवान”, “देवाधिदेव” जैसे संबोधन श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करते हैं। केवल सम्मानसूचक पद देखकर किसी सत्ता का अंतिम तात्त्विक स्थान निर्धारित नहीं किया जा सकता।

 

तारतम वाणी स्वयं एक ओर “महादेवजी” कहती है और दूसरी ओर उन्हीं महादेवजी को बेहद के बारे में प्रश्न करते दिखाती है—भगवानजी ने महादेवजी, पूछे बेहद वाणी।”

 

इससे स्पष्ट है कि “महादेव” शब्द उनकी महानता और सम्मान का परिचायक है; यह आवश्यक नहीं कि हर प्रसंग में वह उन्हें अक्षरातीत श्री राजजी के समान अंतिम परम सत्ता घोषित कर रहा हो। इसलिए धार्मिक भाषा और तात्त्विक भाषा के बीच भेद समझना आवश्यक है।

 

11. शिवजी को परम मानने और उनका सम्मान करने के बीच तीसरा मार्ग

 

अक्सर धार्मिक विमर्श दो अतियों में चला जाता है। एक ओर कोई कहता है— “शिव ही सब कुछ हैं; उनके परे कुछ नहीं।”

दूसरी ओर प्रतिक्रिया में कोई शिवजी के आध्यात्मिक महत्त्व को ही कम कर देता है। तारतम वाणी इन दोनों अतियों से बचाती है।

 

वह तीसरा मार्ग देती है— शिवजी के प्रति पूर्ण सम्मान रखो।

उनकी तपस्या से सीखो। उनके ध्यान से सीखो। उनकी जिज्ञासा से सीखो। उनकी विनम्रता से सीखो। उनकी चेतना की ऊँचाई स्वीकार करो। लेकिन उनकी सत्ता को अक्षरातीत पूर्णता के साथ अभिन्न मानकर तारतम्य को समाप्त मत करो।

 

यह दृष्टि किसी देवता की प्रतिष्ठा कम नहीं करती। उलटे उसकी विशिष्टता और अधिक स्पष्ट करती है।

 

12. शिवजी का आदर्श : साधक से अधिक, खोज की संस्कृति

 

शिवजी की इस तारतम्यपूर्ण समझ को केवल दर्शन तक सीमित नहीं रखना चाहिए। यह हमारे जीवन पर भी लागू होती है। हममें से प्रत्येक के पास कोई न कोई मान्यता है। कोई ग्रन्थ हमें प्रिय है। कोई गुरु हमें प्रिय है। कोई सम्प्रदाय, दर्शन या साधना-पद्धति हमें प्रिय है। समस्या प्रेम में नहीं है। समस्या तब आरम्भ होती है जब हम कहते हैं— “जिसे मैंने पाया, उसके आगे कुछ हो ही नहीं सकता।”

 

शिवजी इसके विपरीत आदर्श प्रस्तुत करते हैं। इतनी ऊँची आध्यात्मिक स्थिति के बाद भी प्रश्न करना। इतनी गहरी साधना के बाद भी खोज जारी रखना। इतनी प्रतिष्ठा के बाद भी यह मानना कि सत्य अभी और व्यापक हो सकता है। यही जागनी की चेतना है।

 

13. “सदाशिव चेतन” : एक आवश्यक पारिभाषिक सावधानी

 

तारतम वाणी के गंभीर अध्ययन में निम्न भेद सदैव ध्यान में रखना चाहिए—

 

शिवजी / महादेवजी : एक उच्चकोटि के योगी, ज्ञानी, ध्यान-सिद्ध और बेहद के जिज्ञासु देवपुरुष।

 

सदाशिव: कुछ प्रसंगों में शैव परम्परा के आराध्य के लिए प्रयुक्त प्रचलित नाम।

 

सदाशिव चेतन: विशिष्ट ब्रह्मलीला और अक्षरब्रह्म के चित्त-सबलिक से संबंधित पारिभाषिक अवस्था, जिसका संकेत है—

अछर चितमें ऐसो भयो, ताको नाम सदा सिव कह्यो।”

 

इस भेद की उपेक्षा करने पर कई चौपाइयों का अर्थ अनावश्यक रूप से उलझ सकता है। अतः हर चौपाई में पहले प्रश्न होना चाहिए—यहाँ “शिव” किस स्तर और किस प्रसंग में कहा गया है?

 

14. तारतम वाणी की वास्तविक क्रान्ति

 

तारतम वाणी की क्रान्तिकारी विशेषता यह नहीं है कि वह किसी पुराने देवता को हटाकर नया देवता स्थापित करती है। यदि ऐसा होता, तो वह भी केवल एक नया सम्प्रदाय बनकर रह जाती।

उसकी वास्तविक क्रान्ति है— “किसी नाम पर मत रुकिए; सत्ता का स्तर समझिए।” शिव का स्थान समझिए। विष्णु का स्थान समझिए। ब्रह्मा का स्थान समझिए। शक्ति का स्थान समझिए।

सदाशिव का स्थान समझिए। निराकार का स्थान समझिए।अक्षर का स्थान समझिए।

 

और फिर पूछिए— इन सबका मूल क्या है? इन सबके परे क्या है? और अक्षरातीत सत्य से इनका सम्बन्ध क्या है? यही तारतम्यपूर्ण अध्यात्म है।

 

निष्कर्ष : शिवजी का सम्मान भी, सत्य की अनन्तता का बोध भी

 

तारतम वाणी में शिवजी का स्वरूप अत्यन्त सम्मानित है। वे महान तपस्वी हैं, योगी हैं, गहन ध्यानकर्ता हैं, व्रजलीला को अपने मन में ग्रहण करने वाले हैं, बेहद के विषय में प्रश्न करने वाले जिज्ञासु हैं और विशिष्ट ज्ञानवान चेतनाओं में उनका स्थान है।

 

किन्तु उनकी महानता को स्वीकार करने का अर्थ उन्हें अक्षरातीत श्री राजजी के समान अंतिम परम सत्ता मान लेना नहीं है। इसी प्रकार “सदाशिव चेतन” जैसे पारिभाषिक प्रयोगों को ऐतिहासिक या पौराणिक शिवजी के साथ बिना विवेक के मिला देना भी उचित नहीं है। तारतम वाणी की दृष्टि इसलिए अत्यन्त संतुलित है।

 

वह कहती है— शिव का सम्मान करो, पर शिव पर रुक मत जाओ। विष्णु का सम्मान करो, पर विष्णु पर रुक मत जाओ।

शक्ति का सम्मान करो, पर शक्ति पर रुक मत जाओ।

निराकार का अनुभव हो, तब भी उसे अंतिम मानकर मत रुक जाओ। सत्य की यात्रा को अक्षरातीत तक ले जाओ।

 

और संभवतः इसी संदर्भ में शिवजी स्वयं हमारे लिए सबसे प्रेरक उदाहरण बन जाते हैं। वे इतने महान हैं कि व्रज की अखण्ड लीला को अपने मन में ग्रहण कर सकें— और इतने विनम्र हैं कि बेहद के सामने प्रश्न कर सकें। यही उनकी वास्तविक महत्ता है।

यही साधक की वास्तविक परिपक्वता है। 

 

और यही तारतम वाणी का संदेश है— श्रद्धा रहे, पर जिज्ञासा जीवित रहे। भक्ति रहे, पर गुमान न रहे। सम्मान रहे, पर स्तरभेद भी समझ में रहे। और हर उपलब्ध सत्य हमें उससे भी व्यापक सत्य की ओर ले जाता रहे।

 

सदा आनंद मंगल में रहिए 

 

नरेंद्र पटेल, टैम्पा, फ़्लोरिडा यूएसए 

दिनांक अगस्त १०, २०२६

 


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