शिव कौन हैं और परब्रह्म कौन?

शिव कौन हैं और परब्रह्म कौन?

 

 

कभी कभी सुन्दरसाथ जी को यह समझाया जाता है कि शिव जी को एक महान तपस्वी, आदर्श गृहस्थ और योगी माना जाए, लेकिन सर्वव्यापी, अनादि, अजन्मा और निराकार परमात्मा के समान न माना जाए। इस दृष्टिकोण के अनुसार शिव स्वयं उस परम सत्ता का ध्यान करते थे, इसलिए उनकी सच्ची भक्ति का अर्थ उनके आदर्शों का अनुसरण करते हुए परमात्मा की ओर बढ़ना है।

 

फिर वेद, उपनिषद् और योगदर्शन के उद्धरण देकर परमात्मा को सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, शरीररहित, अविनाशी, अनादि-अनन्त, सर्वज्ञ और क्लेश-कर्म से अछूता बता कर साधक को बाहरी देव-स्वरूप पर रुकने के बजाय उस परम सत्य को जानने का प्रयास करना समझाया जाता है, जिसे योग, साधना और आत्मानुशासन द्वारा अनुभव किया जा सके।

 

ध्यान रहे, यह एक विशिष्ट वैदिक/आर्यसमाजी व्याख्या है; शैव परंपराएँ शिव को स्वयं परम ब्रह्म भी मानती हैं।

 

प्रश्न यह पूछना आवश्यक है कि तारतम वाणी के रास, प्रकाश, कलश और किरन्तन के आलोक में इस विषय पर तारतम्यपूर्ण विवेचन क्या कहता है। आओ, इस पर विचार करते हैं:

 

प्रश्न विरोध का नहीं, पहचान और तारतम्य का है

 

भारतीय अध्यात्म में शिव अत्यन्त पूजनीय हैं। वे तप, वैराग्य, योग, करुणा, त्याग और अंतर्मुखता के महान प्रतीक हैं। करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए “महादेव” आराध्य हैं और शैव परम्पराओं में शिव को स्वयं परम ब्रह्म भी माना गया है। अतः शिव के विषय में विचार करते समय किसी की श्रद्धा को छोटा करना न उचित है, न आवश्यक।

 

किन्तु तारतम वाणी का प्रश्न अलग है। वह पूछती है—सृष्टि में किस सत्ता का क्या स्थान है? देवता, ईश्वर, ब्रह्म, अक्षर ब्रह्म और अक्षरातीत परब्रह्म—क्या ये सभी शब्द एक ही स्तर की सत्ता को व्यक्त करते हैं, अथवा इनके बीच कोई तारतम्य है?

 

यहीं तारतम ज्ञान की विशेषता सामने आती है। वह केवल “कौन पूजनीय है?” नहीं पूछता; वह पूछता है—कौन कहाँ तक है?”

 

इसी दृष्टि से शिवजी के स्वरूप और स्थान को समझना चाहिए।

 

1. शिव को केवल “एक महान मनुष्य” कहना भी पर्याप्त नहीं

 

कभी-कभी शिवजी के बारे में यह तर्क दिया जाता है कि वे कैलाश पर रहने वाले एक महान तपस्वी, योगी और आदर्श गृहस्थ महापुरुष थे; इसलिए उन्हें परमात्मा नहीं मानना चाहिए।

 

तारतम वाणी की दृष्टि से यह निष्कर्ष कि शिव अक्षरातीत परब्रह्म नहीं हैं, स्वीकार्य दिशा में है; परन्तु शिव को केवल एक ऐतिहासिक महापुरुष या सामान्य शरीरधारी योगी तक सीमित कर देना तारतम वाणी की विशाल ब्रह्माण्ड-दृष्टि को पूरा व्यक्त नहीं करता।

 

रास, प्रकाश, कलश और किरन्तन में जगत् को अनेक स्तरों वाली सत्ता के रूप में समझाया गया है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि का स्थान इस ब्रह्माण्डीय व्यवस्था में है। अतः शिव का सम्मान केवल इसलिए नहीं है कि वे एक अच्छे गृहस्थ या तपस्वी थे; वे सृष्टि-व्यवस्था के एक उच्च दैवी पद और तत्त्व का प्रतिनिधित्व करते हैं।

 

इसलिए दो अतियों से बचना आवश्यक है—

 

शिव को केवल साधारण मनुष्य बना देना उचित नहीं, और शिव को अक्षरातीत परब्रह्म के समान कर देना भी तारतम वाणी की दृष्टि से उचित नहीं।

 

तारतम्यपूर्ण दृष्टि दोनों के बीच का सत्य पहचानती है।

 

2. तारतम वाणी की मूल कुंजी: सत्ता के स्तरों को पहचानना

 

तारतम वाणी की ब्रह्म-दृष्टि को बहुत सरल रूप में इस क्रम से समझा जा सकता है—

 

जगत् देव-सत्ताएँ ब्रह्माण्डीय ईश्वरीय व्यवस्थाएँ अक्षर ब्रह्म अक्षरातीत परब्रह्म।

 

इन स्तरों को एक-दूसरे का विरोधी नहीं समझना चाहिए। नीचे की सत्ता ऊपर की सत्ता से सर्वथा अलग नहीं है; वह उससे आश्रित, प्रकाशित अथवा संचालित हो सकती है। किन्तु इस सम्बन्ध का अर्थ यह नहीं कि दोनों का आध्यात्मिक स्तर समान हो गया।

 

यही “तारतम” है— भेद भी देखना और सम्बन्ध भी देखना।

 

इसलिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश का निषेध नहीं होता; उनका यथास्थान निर्धारण होता है। श्री मुख वाणी भी यही करती है।

 

3. शिव और महेश: सृष्टि-व्यवस्था के भीतर

 

भारतीय पुराण-परम्परा में ब्रह्मा को सृष्टि, विष्णु को पालन और महेश को संहार अथवा रूपान्तरण से जोड़ा गया है। तारतम वाणी भी इस सम्पूर्ण देव-व्यवस्था को उस ब्रह्माण्डीय क्षेत्र के भीतर रखती है जो उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के चक्र से सम्बद्ध है।

 

इसका गहरा दार्शनिक अर्थ है। जिस सत्ता का कार्य सृष्टि-चक्र के भीतर है, वह उस परम सत्ता के समान नहीं हो सकती जो स्वयं सम्पूर्ण सृष्टि-चक्र, ब्रह्माण्डों और उनके कारणों से भी परे है। अतः शिवजी की महिमा अस्वीकार नहीं होती; बल्कि उनकी महिमा का सही स्थान निर्धारित होता है। वे पूजनीय हैं, किन्तु अक्षरातीत नहीं। वे दैवी हैं, किन्तु परमधाम के नित्य अक्षरातीत परब्रह्म नहीं।

 

4. केवल “निराकार” को परम सत्य मान लेना भी तारतम वाणी की पूर्ण दृष्टि नहीं

 

यहाँ तारतम वाणी का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण मतभेद सामने आता है। यदि हम कहें—“शिव शरीरधारी हैं, इसलिए परमात्मा नहीं; परमात्मा केवल निराकार और सर्वव्यापक है,”

 

तो तारतम वाणी पूछती है— क्या निराकार ही आध्यात्मिक यात्रा की अंतिम मंजिल है? तारतम वाणी का उत्तर है—नहीं।

निराकार का अनुभव अत्यन्त उच्च आध्यात्मिक उपलब्धि हो सकता है, लेकिन अक्षरातीत परब्रह्म केवल निराकार शून्यता अथवा निर्गुण सत्ता में समाप्त नहीं हो जाते।

 

तारतम ज्ञान हमें निराकार से भी आगे उस अखण्ड, नित्य, चेतन, आनन्दमय और प्रेममय परम वास्तविकता की ओर ले जाता है जिसे अक्षरातीत परब्रह्म कहा गया है।

 

इसलिए तारतम वाणी का मार्ग केवल—साकार से निराकार

नहीं है। उसका विस्तृत आरोहण है— संसार से देव देव से सूक्ष्म दैवी सत्ता दैवी सत्ता से ब्रह्म ब्रह्म से अक्षर और अक्षर से अक्षरातीत।

 

और अक्षरातीत में परम सत्य केवल अस्तित्व नहीं, बल्कि अखण्ड चेतना, आनन्द, सम्बन्ध और प्रेम है।

 

5. अक्षर ब्रह्म और अक्षरातीत का भेद क्यों आवश्यक है?

 

तारतम वाणी की सबसे विशिष्ट देनों में से एक है—अक्षर और अक्षरातीत का विवेक। अक्षर ब्रह्म अत्यन्त महान ब्रह्म-सत्ता है। उससे विराट ब्रह्माण्डीय विकास और अनेक लीला-क्षेत्रों का सम्बन्ध समझाया जाता है। किन्तु तारतम वाणी वहीं नहीं रुकती। वह अक्षर से भी “परे” की बात करती है। यही कारण है कि केवल “सर्वव्यापक ब्रह्म” को अंतिम सत्य मान लेना तारतम ज्ञान की पूर्णता नहीं है।

 

अक्षर व्यापक हो सकता है; अक्षरातीत उसका भी आधार है।

अर्थात् परम सत्य को केवल इस आधार पर नहीं पहचाना जा सकता कि “जो सर्वव्यापक है वही सर्वोच्च है।” तारतम वाणी इससे आगे पूछती है—उस व्यापक सत्ता का मूल क्या है? यहीं से अक्षरातीत परब्रह्म की पहचान प्रारम्भ होती है।

 

6. रास और प्रकाश: लीला के पीछे की सत्ता को पहचानना

 

रास और प्रकाश ग्रंथों में लीला का विवेचन करते हुए एक अत्यन्त सूक्ष्म बात सामने आती है—जो कुछ किसी ब्रह्माण्डीय चेतना में प्रकट होता है, उसका भी एक उच्चतर मूल हो सकता है।

 

तारतम वाणी की यह दृष्टि हमें धार्मिक प्रतीकों पर रुकने नहीं देती। वह पूछती है—यह लीला कहाँ प्रकट हुई? किस चेतना में प्रकट हुई? और उस चेतना का मूल कहाँ है? इसी तारतम्य में अक्षर और अक्षरातीत का भेद स्पष्ट होता है।

 

प्रकाश में आने वाला यह भाव विशेष महत्त्वपूर्ण है—

ये ब्रज लीला जो अपनी…”प्रकाश 29/56 । और इसी प्रसंग में लीला के पुनः प्राकट्य की चर्चा आगे आती है—

पहले जैसी लीला…”प्रकाश 29/60

 

इन प्रसंगों को सम्पूर्ण प्रकरण के साथ पढ़ने पर यह संकेत मिलता है कि दृश्य अथवा अनुभवगत लीला के पीछे भी चेतना के उच्चतर स्तर हैं। अतः किसी एक प्रकट देव-स्वरूप को देखकर वहीं परम सत्य की सीमा निर्धारित कर देना तारतम ज्ञान की पद्धति नहीं है।

 

7. रास का गहरा संकेत: गोलोक भी अंतिम सीमा नहीं

 

तारतम वाणी की ब्रह्माण्ड-दृष्टि यहाँ और भी साहसी हो जाती है। रास के विवेचन में अक्षर की बुद्धि, चित्त, गोलोक और लीला के सम्बन्धों का वर्णन मिलता है। इसका उद्देश्य गोलोक की महिमा कम करना नहीं है। उद्देश्य यह दिखाना है कि आध्यात्मिक अनुभवों के भी स्तर और मूल होते हैं।

 

इसी तारतम्य में लीला प्रकाश में महद्-अण्ड की उत्पत्ति को अक्षर से सम्बद्ध किया गया है और रस सागर में नारायण के प्राकट्य की चर्चा आती है—महद इंड अक्षर से, भयो तिसरो येह।” और— “उठ्यो नारायण इंड में…”रस सागर 4/104

 

यहाँ एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त उभरता है— जो किसी स्तर पर प्रकट होता है, वह उस स्तर से परे स्थित मूल सत्ता के समान नहीं हो जाता।

 

यही सिद्धान्त शिव के प्रश्न पर भी लागू होता है।

 

8. कलश: पहचान केवल नाम की नहीं, मूल की है

 

कलश ग्रंथ बार-बार बाहरी धार्मिक पहचान से भीतर की पहचान की ओर ले जाता है। मनुष्य नाम, सम्प्रदाय, कर्मकाण्ड और बाह्य रूपों में उलझ सकता है; परन्तु जागनी का उद्देश्य है अखण्ड वस्तु की पहचान।

 

अतः “मैं शिव को मानता हूँ”, “मैं कृष्ण को मानता हूँ”, “मैं विष्णु को मानता हूँ”—इतना कहना तारतम ज्ञान में अंतिम आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं है।

 

प्रश्न यह है— जिसे मैं मान रहा हूँ, उसके स्वरूप और स्तर को कितना पहचानता हूँ? नाम श्रद्धा दे सकता है; रूप प्रेम जगा सकता है; उपासना मन को शुद्ध कर सकती है; किन्तु तारतम ज्ञान पहचान देता है।

 

और पहचान पूछती है— मेरा आराध्य सृष्टि के किस स्तर का है, और उसकी मूल सत्ता कहाँ तक जाती है?

 

9. किरन्तन: खोज को बीच में मत रोकिए

 

किरन्तन में खोज की महिमा अत्यन्त सुन्दर रूप से आती है—

 

खोज बड़ी संसार रे, तुम खोजो रे साधो, खोज बड़ी संसार।

खोजत खोजत सदगुरु पाइये, सतगुरु संग करतार।।

श्री प्राणनाथ जी, तारतम वाणी, किरन्तन 26/1

 

यह चौपाई इस पूरे प्रश्न की कुंजी बन सकती है। आध्यात्मिक यात्रा में किसी पूजनीय रूप का मिलना यात्रा का अन्त नहीं है। खोज गहरी होती जाती है— रूप से तत्त्व, तत्त्व से ब्रह्म, ब्रह्म से अक्षर, और अक्षर से अक्षरातीत।

 

इसलिए तारतम वाणी का साधक शिव का अनादर नहीं करता। वह शिव में दिखाई देने वाले वैराग्य, ध्यान, तप और ऊर्ध्वगामी चेतना से प्रेरणा लेकर अपनी खोज और आगे बढ़ाता है।

 

10. तब “सच्चा शिव” कौन है?

 

शिव” शब्द का मूल भाव है—कल्याणकारी, मंगलमय। इस अर्थ में परम कल्याण का अंतिम स्रोत निश्चित रूप से परम सत्ता ही है। लेकिन यहाँ शब्दों का सावधानी से प्रयोग आवश्यक है।

 

ऐतिहासिक-पौराणिक शिव/महेश और “शिव” शब्द के परम-मंगल तात्त्विक अर्थ को एक ही स्तर पर रख देना भ्रम पैदा कर सकता है।

 

तारतम वाणी की भाषा में सर्वोच्च सत्ता को अधिक स्पष्ट रूप से कहना हो तो— अक्षरातीत परब्रह्म श्री राज जी कहना अधिक उपयुक्त है। वे अक्षर से परे हैं; माया से परे हैं; उत्पत्ति और प्रलय से परे हैं; काल से परे हैं; और परमधाम में अपनी अखण्ड आनन्दमयी लीला में स्थित हैं।

 

इसलिए तारतम वाणी के अनुसार “सच्चे शिव” की खोज का अर्थ किसी दूसरे “शिव” नामक देवता की खोज नहीं, बल्कि शिवत्व के परम मूल—अक्षरातीत परब्रह्म—की पहचान है।

 

11. परम सत्य केवल शक्ति नहीं—प्रेम भी है

 

यहीं तारतम वाणी अनेक दार्शनिक ईश्वर-कल्पनाओं से आगे जाती है। यदि हम परमात्मा को केवल— सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ,

सर्वव्यापक, न्यायकारी और अजन्मा कहकर रुक जाएँ, तो परम सत्ता का दार्शनिक परिचय तो मिलता है, परन्तु तारतम वाणी का रस अभी पूरा प्रकट नहीं होता।

 

तारतम वाणी में परम सत्य केवल “Cosmic Power” नहीं है।

वह प्रियतम है। परम सत्य को केवल जानना नहीं है—उससे सम्बन्ध पहचानना है। केवल उसका ध्यान नहीं करना है—उसके प्रेम में जागना है। केवल उसमें लीन नहीं होना है—उसकी अखण्ड लीला और अपने निज सम्बन्ध को पहचानना है।

 

इसीलिए किरन्तन में ज्ञान के साथ इश्क, ईमान, गरीबी, सब्र और प्रियतम से प्रेमपूर्ण सम्बन्ध का स्वर बार-बार आता है।

 

12. शिव की सच्ची भक्ति तब क्या होगी?

 

तारतम दृष्टि से शिव की भक्ति को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है। पहला है सम्मानशिव के तप, वैराग्य, ध्यान, करुणा और संयम का सम्मान। दूसरा है अनुकरणअपने भीतर आसक्ति, अहंकार और अज्ञान का क्षय करना। इस अर्थ में शिव का संहार-तत्त्व भीतर के अज्ञान के संहार का भी अद्भुत प्रतीक बन सकता है। तीसरा और सर्वोच्च है अतिक्रमणशिव सहित सभी देव-सत्ताओं के मूल स्रोत की खोज करते हुए अक्षरातीत परब्रह्म की पहचान तक पहुँचना।

 

इसलिए शिव से आगे जाना शिव का अपमान नहीं है। जैसे सीढ़ी हमें ऊपर पहुँचाती है और ऊपर पहुँचने पर सीढ़ी का अपमान नहीं होता, वैसे ही किसी दैवी स्वरूप से प्रेरित होकर परम मूल की ओर बढ़ना उस स्वरूप की आध्यात्मिक भूमिका को सार्थक करता है।

 

13. क्या शिव की पूजा “गलत” है?

 

इस प्रश्न का उत्तर भी तारतम्य से देना चाहिए। किसी श्रद्धालु की शिव-भक्ति को सीधे “गलत” कहना आवश्यक नहीं। भक्ति मनुष्य को अहंकार से निकालकर प्रेम, अनुशासन और अंतर्मुखता की ओर ले जा सकती है।

 

लेकिन यदि यह दावा किया जाए कि— “शिव/महेश से परे कोई उच्चतर ब्रह्म-सत्ता नहीं है और वही अक्षरातीत परब्रह्म की अंतिम अवस्था हैं,” तो यह तारतम वाणी की ब्रह्म-दृष्टि से मेल नहीं खाता।

 

इसलिए अधिक उचित भाषा होगी— शिव की उपासना आध्यात्मिक यात्रा का एक सार्थक द्वार हो सकती है; किन्तु तारतम ज्ञान साधक को किसी भी देव-स्वरूप पर रुकने के बजाय उसके मूल अक्षरातीत परब्रह्म तक पहुँचने की प्रेरणा देता है। यह दृष्टि न देवताओं का निषेध करती है, न उन्हें परम सत्य के साथ मिला देती है। यही तारतम्य की क्रमबद्ध देखने की दृष्टि है।

 

14. केवल अष्टाङ्ग योग या उससे भी आगे?

 

इस के साथ साथ कभी कभी यह भी समझाया जाता है कि पतञ्जलि के अष्टाङ्ग योग द्वारा परमात्मा को पाया जा सकता है। तो तारतम वाणी योग के अनुशासन और अन्तर्मुखता के मूल्य को अस्वीकार नहीं करती, परन्तु उसकी मंजिल उससे आगे जाती है।

 

योग चित्त को स्थिर कर सकता है। ध्यान साक्षीभाव जगा सकता है। समाधि सूक्ष्म और निराकार अवस्थाओं का अनुभव करा सकती है।

 

किन्तु तारतम वाणी पूछती है— “तुम कौन हो?” “तुम्हारा निज सम्बन्ध किससे है?” “तुम्हारा मूल वतन कहाँ है?” इसलिए तारतम मार्ग में केवल समाधि नहींपहचान और जागनी आवश्यक हैं। और जागनी का चरम केवल ब्रह्म में विलीन हो जाना नहीं, बल्कि अपने निज स्वरूप, प्रियतम और परमधाम के अखण्ड सम्बन्ध में जागना है।

 

15. रास, प्रकाश, कलश और किरन्तन का संयुक्त संदेश

 

चारों ग्रंथों को साथ रखकर देखें तो एक सुंदर क्रम उभरता है—

रास हमें दिव्य प्रेम और लीला की गहराई में ले जाता है। प्रकाश विभिन्न ब्रह्माण्डीय स्तरों और उनके मूल सम्बन्धों पर प्रकाश डालता है। कलश बाहरी भ्रम और अधूरी पहचान से ऊपर उठाकर अखण्ड वस्तु की पहचान की ओर ले जाता है। किरन्तन साधक को खोज, जागनी, इश्क, सद्गुरु और निज घर की ओर चलने की प्रेरणा देता है। इन सबका संयुक्त संदेश है— किसी रूप का तिरस्कार मत करो, पर किसी सीमित स्तर को असीम समझकर वहीं रुक भी मत जाओ।

 

निष्कर्ष : शिव से शिवत्व के मूल तक

 

तारतम वाणी हमें धार्मिक विवाद नहींचेतना की ऊँचाई प्रदान करती है। इसलिए प्रश्न— “शिव परमात्मा हैं या नहीं?” को अधिक परिपक्व रूप में इस प्रकार पूछना चाहिए— “तारतम ब्रह्माण्ड-दृष्टि में शिव का स्थान क्या है, और शिव सहित समस्त दैवी सत्ताओं का परम मूल कौन है?”

 

तब उत्तर स्पष्ट होता है— शिव/महेश अत्यन्त आदरणीय दैवी सत्ता हैं। वे तप, वैराग्य, ध्यान और रूपान्तरण के महान प्रतीक हैं। उनका सम्मान होना चाहिए। किन्तु तारतम वाणी की दृष्टि में सृष्टि-व्यवस्था के किसी देव-तत्त्व को अक्षरातीत परब्रह्म के समान नहीं माना जा सकता। साथ ही, केवल “निराकार सर्वव्यापक सत्ता” को ही अंतिम सत्य मानकर रुक जाना भी तारतम वाणी की पूर्ण दृष्टि नहीं है।

 

तारतम ज्ञान साधक सुन्दरसाथ को क्रमशः— रूप से तत्त्व,

तत्त्व से ब्रह्म, ब्रह्म से अक्षर, अक्षर से अक्षरातीत, ज्ञान से पहचान, पहचान से प्रेम, और प्रेम से निज परमधाम-संबंध

की ओर ले जाता है।

 

इसलिए तारतम वाणी का संदेश न तो शिव को छोड़ो” है,  शिव ही अंतिम हैं।” उसका संदेश कहीं अधिक समन्वित है—

शिव का सम्मान करो, शिवत्व को अपने जीवन में उतारो, पर अपनी खोज को शिव पर समाप्त मत करो। उस परम स्रोत को पहचानो जिससे ब्रह्माण्ड, ब्रह्म-सत्ताएँ और समस्त दैवी महिमा अपना प्रकाश पाती हैं—अक्षरातीत परब्रह्म श्री राज जी।

 

यही तारतम है— सबको यथास्थान देखना, किसी को छोटा न करना, और परम को परम के रूप में पहचानना।

 

सदा आनंद मंगल में रहिए

 

नरेंद्र पटेल, टैम्पा, फ़्लोरिडा यूएसए

दिनांक अगस्त ९, २०२६


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