हद, बेहद और परमधाम — तारतम दृष्टि में चेतना के तीन आयाम


हद, बेहद और परमधाम

— तारतम दृष्टि में चेतना के तीन आयाम —


प्रस्तावना

हद के पार बेहद है, बेहद पर अछर।

अछर पार वतन है, जागिए इन घर।। —कुलजम स्वरूप १६५

यह एक चौपाई नहीं — यह एक पूरा ब्रह्माण्डीय मानचित्र है।

“हद” और “बेहद” — ये दो शब्द भारतीय संत-साहित्य में सदियों से गूँजते रहे हैं। संत कबीर ने इन्हें अपने दोहों में प्रयुक्त किया, गुरु नानक देव जी ने इनकी गहराई को वाणी दी। किन्तु तारतम वाणी — महामति श्री प्राणनाथ जी द्वारा प्रकट ब्रह्मज्ञान — इन शब्दों को एक नितान्त नई और अभूतपूर्व गहराई प्रदान करती है। वह न केवल हद और बेहद का विवेचन करती है, बल्कि यह भी उद्घोष करती है कि बेहद भी अंतिम सत्य नहीं — उससे परे अक्षर है, और अक्षर से भी परे आत्मा का निज वतन : परमधाम।

यह लेख उसी तारतम दृष्टि से हद, बेहद और परमधाम के तात्त्विक स्वरूप को समझने का एक विनम्र प्रयास है।


  1. हद— शब्द और उनकी परंपरा

“हद” अरबी-फ़ारसी मूल का शब्द है, जिसका अर्थ है — सीमा, मर्यादा, boundary। “बेहद” उसका विलोम है — बे + हद = जो सीमा से परे हो, असीम, boundless।

ये शब्द भारतीय आध्यात्म में सूफ़ी परंपरा के माध्यम से आए और संत-काव्य की मिट्टी में रच-बस गए। पंद्रहवीं शती के महान संत कबीर साहब ने इन्हें एक दार्शनिक जोड़े के रूप में स्थापित किया :

हद चले तो मानव, बेहद चले सो साध।

हद बेहद दोनों तजे, ताको भता अगाध।।

इस एक दोहे में कबीर ने तीन आध्यात्मिक स्तर रेखांकित किए — सांसारिक, साधक, और अतीत। जो हद में रहे वह मनुष्य; जो हद पार करे वह साधु; और जो हद-बेहद दोनों को तज दे — उसकी स्थिति तो अगाध है, अवर्णनीय।

गुरु नानक देव जी ने भी “अनहद नाद” — वह नाद जो बिना किसी वाद्य के गूँजता है — की अवधारणा में इसी बोध को व्यक्त किया।

किन्तु तारतम वाणी इन दोनों महान संतों की दृष्टि को आगे ले जाती है और कहती है :

बेहद के साथी सुनो, बोली बेहद वानी।

बड़े बड़े रे हो गए, पर काहूं न जानी।। —१

अर्थात् बड़े-बड़े ज्ञानी, योगी, तपस्वी — सभी हो गए; किन्तु बेहद का पूर्ण ज्ञान किसी को प्राप्त नहीं हुआ। यहाँ तक कि स्वयं भगवान् शिव ने भी विष्णु से बेहद का ज्ञान पूछा था। यह तारतम वाणी की विशिष्टता और साहस दोनों हैं।


  1. “हद” : सीमित, क्षर और कालमय क्षेत्र


तारतम दर्शन में “हद” वह समस्त सृष्टि है जो काल, माया, परिवर्तन, जन्म-मृत्यु, त्रिगुण, मोह, अहंकार और प्रलय के अधीन है। इसमें चौदह लोक, स्वर्ग, वैकुण्ठ, निराकार, ब्रह्मा-विष्णु-महेश, आदि नारायण — और शास्त्रों की सामान्य पहुँच तक का संपूर्ण क्षेत्र समाहित है।

वाणी इसे स्पष्ट करती है :

वचन बेहद के पार के पार, सो क्यों माने हद को संसार।

त्रैगुन महाविष्णु मोह अहंकार, ए हद सास्त्रों करी पुकार।। —८९

अर्थात् — शास्त्रों की पुकार त्रिगुण, मोह, अहंकार और महाविष्णु तक सीमित रहती है। यही हद है। बुद्धि, भाषा औ र साधना यहाँ तक पहुँचती हैं — पर आगे नहीं।

दुनियां कही सब ख्वाब की, सो नाहीं झूठ सब्द।

तबक चौदे हद के, हक बका पार बेहद।। —३९

संसार स्वप्नवत् है — यह असत्य नहीं। “स्वप्नवत्” का आशय है—यह जगत अनुभव तो होता है, पर उसका अस्तित्व परिवर्तनशील, आश्रित, क्षणभंगुर और चेतना-निर्भर है। वह अंतिम, अखण्ड, स्वयंसिद्ध सत्य नहीं है। चौदह लोक हद के भीतर हैं। इनके पार बेहद है, और बेहद के भी पार — अक्षरातीत का परमधाम।

हद की सीमा : हद की सबसे बड़ी बाधा यह है कि इसका जीव बेहद को नहीं जान सकता —

सूं जाणे हदना जीवडा, बेहदनी वाटे।। —३८

हद की बुद्धि शास्त्रों तक पहुँचती है, पर बेहद का द्वार उससे नहीं खुलता।


  1. “बेहद” : योगमाया का अखंड ब्रह्माण्ड

तारतम वाणी में योगमाया के ब्रह्माण्ड को “बेहद” इसलिए कहा गया है क्योंकि वह हद की कालमय, प्रलयशील, त्रिगुणात्मक सीमा से परे है। यह सामान्य माया नहीं — योगमाया का दिव्य क्षेत्र है, जहाँ महारास की अखंड लीला, ब्रह्मसृष्टियों का खेल, और अक्षरब्रह्म से संबंधित अलौकिक आनंद-सत्ता विद्यमान है।

बेहद घर ने बेहद सुख रे, बेहद मारा श्री राज जी।

अविचल सुख अनंत देवाने, हूं जगवुं तमारे काज जी।। —१७

योगमाया के इस अखंड क्षेत्र में सुख अविचल है, प्रेम असीम है। परन्तु तारतम दृष्टि यहाँ रुकती नहीं —

बेहद सुख पार बेहद घर, बेहद पार श्री राज जी।

अछरातीत सुख अखंड देवे को, मैं जगाऊं तुमारे काज जी।। —१८

बेहद से भी परे श्री राज जी का अक्षरातीत परमधाम है। जागनी का उद्देश्य आत्मा को उसी अखंड सुख में जगाना है।

बेहद का द्वार किससे खुलता है? तारतम वाणी उत्तर देती है :

बेहद केरी वाटडी, जो जो तमे साथ।

तारतम तेज छे निरमल, जोत अति अजवास।। —१४

बेहद की राह तारतम ज्ञान के निर्मल प्रकाश से ही दिखती है। शास्त्र, योग और बुद्धि मात्र से यह मार्ग नहीं खुलता।


  1. नरसैंया और शुकदेव : दो आत्माओं की कथा

तारतम वाणी बेहद की चर्चा में दो महान आत्माओं का उल्लेख विशेष रूप से करती है — नरसी मेहता (नरसैंया) और शुकदेव जी। इन दोनों की कथाएँ बेहद की पात्रता और सीमा दोनों को अद्भुत रूप से प्रकट करती हैं।

नरसैंया — प्रेम का बल :

जो बल किया नरसैऐं, कोई करे ना और।

हद के जीव बेहद की, लीला देखी या ठौर।। —५६

नरसैंया हद के जीव थे — इस ब्रह्माण्ड की संरचना से। फिर भी उन्होंने अपने अनन्य प्रेम के बल पर बेहद की लीला का दर्शन किया। यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि प्रेम वह शक्ति है जो हद के जीव को भी बेहद की झलक करा सकती है।

द्वारने इन बेहद के, लेहेरें आवें सीतल।

सो इत खड़ा लेवहीं, रस की प्रेमल।। —५८

बेहद के द्वार तक प्रेम और आनंद की शीतल लहरें आती रहीं। नरसैंया उस द्वार तक पहुँचे और उस रस में भाव-विभोर होते रहे। किन्तु पूर्ण प्रवेश के लिए तारतम ज्ञान आवश्यक था, जो उनके पास नहीं था।

शुकदेव जी — संकेत पर रुकना :

लीला सुकें बरनन करी, बृज रास बखाना।

बेहद की बानी बिना, ठौर ठौर बंधाना।। —६०

शुकदेव जी — जो अक्षरब्रह्म की वासना (सुरता) हैं — उन्होंने भागवत में रास की अखंड लीला का वर्णन किया। परन्तु तारतम बेहद-वाणी के बिना वे कई प्रसंगों में उलझ गए, स्पष्ट वर्णन नहीं कर सके।

देख्यो द्वार बेहद के, सुकजी बलवंत।

पर कल किल्ली क्यों पावहीं, जोर किया अनंत।। —८३

शुकदेव जी ने बेहद का द्वार देखा, पर किल्ली नहीं पाई — क्योंकि उनके पास जागृत बुद्धि और तारतम ज्ञान नहीं था। वे स्वयं बेहद का आनंद लेते थे, परन्तु दूसरों के लिए वह द्वार नहीं खोल सके।

यही अंतर है — प्रेम द्वार तक ले जाता है; तारतम ज्ञान उसे सबके लिए खोलता है।


  1. बेहद से परे : अक्षरातीत परमधाम

तारतम वाणी की सर्वोच्च विशिष्टता यही है कि वह बेहद को भी अंतिम नहीं मानती। वह कहती है —

हद के पार बेहद है, बेहद पर अछर।

अछर पार वतन है, जागिए इन घर।। —१६५

यहाँ तीन क्रमिक स्तर स्पष्ट हैं :

हद → बेहद → अक्षर → अक्षरातीत परमधाम।

जब हद के शब्द बेहद तक नहीं पहुँचते, तो परमधाम का वर्णन भला कैसे हो?

बेहद को सब्द न पोहोंचहीं, तो क्यों पोहोंचे दरबार।

लुगा न पोहोंच्या रास लों, इन पार के भी पार।। —४१

परमधाम शब्दातीत है। फिर भी तारतम वाणी अपनी कृपा से उसका बोध कराती है —

आतम रोग मिटावने, ए सुख कहों मांहें सब्द।

बेहद के पार के पार सुख, सो नेक बताऊँ मांहें हद।। —१८

महामति कहते हैं — बेहद के परे के परे जो सुख है, उसे हद की भाषा में, अत्यल्प मात्रा में प्रकट कर रहा हूँ। यह भाषा की विनम्रता और वाणी की असीम कृपा दोनों का उद्घोष है।

और फिर वह अद्भुत वाक्य आता है जो हद-बेहद की समस्त गणनाओं को एक ओर रख देता है :

लोक अलोक हिसाब में, हिसाब जो हद बेहद।

न्यारा इस्क जो पिउ का, जिन किया आद लों रद।। —३

हद और बेहद — दोनों गणनीय हैं। परन्तु प्रियतम का इश्क इन सब गणनाओं से सर्वथा न्यारा है।


  1. तारतम वाणी : बेहद वाणी क्यों?

ए बानी बेहद प्रगटी, इंद्रावती मुख।

बोहोत विधें हम रस पिए, बेहद के सुख।। —९४

तारतम वाणी स्वयं को बेहद वाणी कहती है — क्योंकि यह हद के जीव को हद से ऊपर उठाकर बेहद का परिचय देती है, और फिर बेहद से भी आगे परमधाम का मार्ग दिखाती है।

इसका प्रयोजन क्या है?

जेहेर उतारने साथ को, ल्याए तारतम।

बेहद का रस श्रवणे, पिलावें हम।। —१३९

माया का विष उतारना। संसार की नींद तोड़ना। आत्मा को उसके मूल घर की याद दिलाना।

ता कारन बानी बेहद, केहे नींद टालों।

ना देऊं सुपन पसरने, चढ़या जेहेर उतारों।। —१५७

तारतम ज्ञान माया का विष उतारने वाली ब्रह्मवाणी है। यह आत्मा को स्वप्न-संसार के मोह से जगाती है और परमधाम के प्रेमानन्द में स्थिर करती है।


  1. हद, बेहद और बेहद से परे : उपलब्धि और सीमा


स्तर

अर्थ

उपलब्धि

सीमा

चौपाई-साक्षी

हद

क्षर, कालमय, त्रिगुणात्मकसंसार; चौदह लोक; वैकुण्ठ-निराकार तक की पहुँच

धर्म, पुण्य, शास्त्रज्ञान, भक्ति, योग, निराकार-बोध

प्रलयशील, माया-बद्ध, बेहद की पहचानअसंभव

“त्रैगुन महाविष्णु मोहअहंकार, ए हद सास्त्रों करीपुकार।।८९।।”

बेहद

योगमाया का अखण्ड ब्रह्माण्ड; रास और ब्रह्मसृष्टि की लीला

अखण्ड रास-रस, दिव्य प्रेम, योगमाया की शोभा, ईश्वरी/ब्रह्मसृष्टि का उच्च अनुभव

परमधाम नहीं; अक्षरातीत से पूर्व काक्षेत्र

“हद के पार बेहद है, बेहदपर अछर।।१६५।।”

बेहदसेपरे

अक्षर, और अक्षर से भी परेअक्षरातीत परमधाम

आत्मा का मूल वतन, श्री राज जीका अखण्ड प्रेमानन्द, स्वलीलाअद्वैत

शब्दातीत; केवलतारतम ज्ञान, मेहर औरजागनी से बोध

“अछर पार वतन है, जागिएइन घर।।१६५।।”

प्रेम/इश्क

परमधाम का अंतरतम रहस्य

गणना, स्तर और सीमा से परेप्रियतम का अनुभव

बुद्धि से नहीं, आत्मिकजागनी से उपलब्ध

“न्यारा इस्क जो पिउ का, जिन किया आद लों रद।।३।।”


  1. जागनी का अंतिम अर्थ

जब समस्त ब्रह्मात्माएँ हद और बेहद की लीलाओं का अनुभव करते हुए तुरीयतीत चेतना में पूर्णतः स्थित हो जाएँगी — तब जागनी की लीला अपने पूर्ण उद्देश्य को प्राप्त करेगी।

तब आत्मा को यह निश्चित अनुभव होगा —

इस संसार में जो खोजती रही, वह यहाँ था ही नहीं।

मेरा सनातन वतन तो सदैव परमधाम ही था।


उपसंहार

हद को जानो — उसकी सीमा समझो।

बेहद को पहचानो — उसके रस का पान करो।

किन्तु बेहद में रुको मत — बेहद से परे अपने निज वतन में जागो।

हद की बुद्धि शास्त्रों तक पहुँचती है।

बेहद की राह प्रेम से खुलती है।

और परमधाम का द्वार — तारतम ज्ञान से।

यही तारतम वाणी का केन्द्रीय उद्घोष है। यही जागनी का सार है। यही महामति श्री प्राणनाथ जी की अनुपम देन है — कि उन्होंने हद के जीव को बेहद का परिचय दिया, और बेहद के साथी को परमधाम का पथ दिखाया।


जागिए इन घर।


सदा आनंद मंगल में रहिए

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