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खोजी खोजे बाहेर भीतर, ओ अंतर बैठा आप | सत सुपने को पारथीं पेखे, पर सुपना न देखे सख्यात || किर २/५

आज का श्री प्राणनाथ वाणी मंथन खोजी खोजे बाहेर भीतर, ओ अंतर बैठा आप | सत सुपने को पारथीं पेखे, पर सुपना न देखे सख्यात || किरनतन २/५                आत्म-खोजी साधक लोग पर-ब्रह्म (सुप्रीम बीइंग) को या तो इस परिवर्तनशील ब्रह्मांड में या अपने भीतर (पिंड में) खोजते रहते है । स्वप्न बुध्धि के प्रभाव में उन्हें आंशिक अनुभूति पूर्ण नजर आती है और प्रतिबिंबि को ही वे वास्तविकता समझ लेते हैं |                लेकिन वह पर-ब्रह्म तो भीतर में होने वाली अनुभूतियों एवं सृष्टि में बाहर प्रत्यक्ष रूप में होने वाली अनुभूतियों से अलग ही है | वह अपने पूर्ण 'शुध्ध साकार' स्वरुप से उस परमधाम में स्थित है, जहांसे वे यह जगत खेल दिखा रहे हैं | अर्थात, उनका पूर्ण सत-चिद-आनंद, अनंत और स्व-लीला अद्वैत स्वरुप इन सभी अनुभूतियों से बहुत दूर है ।                वास्तविकता तो यह है कि सत्य (नित्य-अस्तित्ववान) ब्रह्मात्माएं इस अवास्तविक सांसारिक स्वप्न को परे से, अर्थात, अपने परमधाम से देख रही हैं |...

Stage decor with eight oceans Toronto shivir

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Stage decor with eight oceans Toronto Shivir

Today’s centering Chopai is: एह जिन बांधे सो खोलहिं, तोलोना छूटे बंध ! एह विध खेल खावंदकी, तो औरों कहाँ सनंध कलस १/३५

Today’s centering Chopai is: एह जिन बांधे सो खोलहिं, तोलोना छूटे बंध ! एह विध खेल खावंदकी, तो औरों कहाँ सनंध  कलस १/३५ Eh Jin baandhe so kholhi , Unless the One who has created the web of world-game plan Himself untangles the complex puzzle of the worldly drama, Toh lon naa chhute bandh l One cannot hope to get out of this great entanglement (mess). Eah vidh khel khaavand ki, Even the revered Devtas, angels, Brahma, Vishnu, Mahesh also are all totally bewildered. None can solve the puzzle of dreamy creation. To auron kahaan sanandh ll Then what to talk of ordinary mortals (humans)! This chopai teaches a few points: 1. Humbleness: Recognizing limitations of our human intellect in fully understanding the universe and the Ultimate Reality. 2. Importance of having immovable rocklike faith that I am the soul of the Supreme Lord who is showing me this world drama. This opens the door of Paramdham Getting into our blissful love state - Nij -Ananda is possible by bu...

Today’s Prannath Wani Manthan

Today's Prannath Wani Manthan: पतिव्रता पणे सेविए, न थाय वेश्या जेम | एक मेलीने अनेक कीजे, तेणी थाय धणवट केम || किरंतन १२८/४४ परमात्मा का सेवन, उन्हें अपनी आत्मा का धणी समझ कर करना चाहिए | उनसे ऐसे अनन्य भाव से प्रेम करना चाहिए, जैसे संसार में एक आदर्श पत्नी अपने पति से करती है | वेश्या की तरह अप्रामाणिक व्यवहार करने से प्रेम का सच्चा सेवन नहीं हो सकता | प्रेम की खोज में जो एक परमात्मा की पहेचान कर के उन पर पूर्ण विश्वाश और श्रध्दा नहीं रखता, और अपने जीवन व्यवहार में जो नाना प्रकार के संसारी प्रलोभनों की परिपूर्ति में ही प्रेम खोजते रहता है, या लौकिक दिखावे का धर्म पालन करके परमात्मा के प्रेम की उपलब्धि का ढोंग करता रहता है, उस को परमात्मा का प्यार कैसे मिल सकता है? जब तक पत्नी (आत्मा) अपने पति रूप (परमात्मा) को अपना दिल पूर्णतः नहीं दे देती, अपना सर्वस्व समर्पण का भाव प्रगट नहीं करती, तब तक उसे अपने धणी की धणवट का, अर्थात, उनकी मेहेर या प्यार की अनुभूति कैसे हो सकती है? English: Pativrata pane seviye, Na thaaye veshya jem | Ek meli ne anek kije, Teni thaay dhanva...

बढ़िया । पतंगोत्सव की शुभ कामना ।

बढ़िया । पतंगोत्सव की शुभ कामना । इसी संदर्भ में एक जागनी प्रयोग हम सब कर सकते हैं : यदि अपने भीतर में ईर्ष्या, प्रमाद, कायरता, डर, मिथ्या अहंकार, लोभ, काम क्रोध, किसी के भी प्रति घृणा , बदले की भावना आदि नकारात्मक भाव होने का आपको स्वीकार है, तो उन सभी को आज अपनी अपनी पतंग पर लिख दीजिए। फिर पतंग को आकाश में उड़ाइए। फिर किसी दूसरे से पेच नहीं लड़ाना है । किसी और की पतंग नहीं काटनी है । बस, अपने हाथ को खुला कर लेना है, पतंग के धागे को हाथ से छोड देना है । फिर देखते रहिए, कि पतंग के साथ साथ ऊस पर लिखे हुए ईर्ष्या, प्रमाद, कायरता, डर, मिथ्या अहंकार, लोभ, काम क्रोध, घृणा आदि सभी नकारात्मक भाव भी आप से दूर दूर उड़ जा रहे हैं । दूर से दूर ....नज़र से ग़ायब हो रहे हैं। आप अपने आप में हल्केपन का एहसास कर रहे है। चेहरे पर ख़ुशियों के आँसू । भीतर का आसमान निर्मल हो रहा है । इसी अवकाश में प्रेम, आनंद, शांति, एकदिली का मोहोल तैयार हो रहा है। अब आप भी - भीतर से बाहर तक - चिल्ला रहे हैं- काटी....काटी...काटी! नकारात्मक एमोसंस की पतंग को अपने आप से काट दी! काट दी! हास...बड़ा अच...

नए वर्ष २०२० की शुभ कामना

संकल्प विकल्प छे तुझ माहें, ते तू कर सेवानी। मन उमंगआण तुं अति घणी, श्री  धाम धणी मलवानी ।। प्र २०/८५ नए वर्ष के शुभारंभ पर, हम यह शुभ भावना करते है कि आप के संकल्प विकल्प के केंद्र में सदा प्रेम सेवा ही रहें और आप के मन में धाम धणी से मिलने का उमंग सदैव बना रहे । इसके लिए, यह याद रहें, श्री राज जी की नज़र में क़ोई गलत नहीं कर /हो रहा । “महाकारन “ स्तर से सोचे तो सब कुछ सही और सच ही हो रहा है। जब खेल ही हाँसी वास्ते है, हाश्य वास्ते है, रूह, जो सच है, उसकी नज़र खुलते ही यह वास्तविकता सामने आ जाती है क़ि धनी का इश्क़ ही, इश्क़के नए अनुभव के लिए, खेल दिखा रहा है । क़िसी सुन्दर साथ से क्षमा देने योग्य करनी-कथनी करवाता है; तो दूसरी और यह इश्क़ किसी दूसरे साथ को क्षमा करने की क्षमता प्रदान करता है। उपरोक्त दोनो को, यदि अपनी हर कथनी-करनी की मोमेंट में, यह याद आ जाता है कि “मैं कौन हूँ” तो फिर  सुख-दुःख के खेल से आनंद ही फलित होता रहेगा और निरंतर बढ़ता भी रहेगा । सुन्दरसाथ जी, २०२० वर्ष प्रारम्भ मुझे एक और महत्वपूर्ण बात याद दिला रहा है । जब आप आँखों की जाँच करवाने आई डॉ...

Celebrating the Holiday season

Dear Sundar Sath Ji: As I see Many of us and our children celebrating the Holiday season marking the end of year 2019, I am Thinking of Christmas gifts, and visualizing Chhatta as my Shanta! As soon as I chose Chhatta, as my Hero of Jagni Leela, as my architypal energy of inspiration, here is the  key lesson that emerge in my consciousness and that jolts my inner being: "Giving is ALWAYS Greater Than Receiving! " Chhatta's life practice or Happiness Formula goes like this: पहले दाता हम भए, गुर को दिन्हों शिस । पीछे दाता सदगुरु (परमात्मा , भीतर से) भए, सब कुछ कियो बख्शीश।। First, I chose "Giving," And I "Gave" my All -100%! Next, Wow! Beloved Lord's Infinite abundance Was Gifted to me! Greatest Gifts Always Comes From WITHIN -Our True Being first, then the universe aligns to manifest them in life. All feelings of lack disappears, as soon as we CHOOSE to be on the Giving side! Wow! That's the secret! And I think of no b...