रस–रंग और तारतम्य
रस–रंग और तारतम्य: महामति प्राणनाथ की दृष्टि में आत्मा–परमात्मा का प्रेममय स्वलीलाद्वैत
परमात्मा का रसस्वरूप
महामति प्राणनाथ की वाणी में परमात्मा किसी निर्गुण, निष्क्रिय अथवा भावशून्य सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि रसस्वरूप चिदानन्द के रूप में प्रकट होते हैं—"रसो वै सः"। यह रस कोई लौकिक सुख नहीं, बल्कि प्रेम, आनन्द और चेतना का अमृत है, जो आत्मा को भीतर से जाग्रत करता है। आत्मा स्वयं प्रेमरस की प्यासी है और परमात्मा रसराज—जो आत्मा को आकर्षित करने के लिए रंग, रूप, खेल और लीलाओं के असंख्य आयाम रचते हैं।
आत्मा की प्यास और हक़-कदम का आकर्षण
आत्मा जब तक संसार की माया-लीला में उलझी रहती है, तब तक वह असंतोष और अपूर्णता अनुभव करती है। किंतु जैसे ही उसे हक़-कदम—अर्थात् परमात्मा के चरणों—का स्वाद मिलता है, वह रस में डूबने लगती है।
लग रहे हक कदम को, सोई रूह अर्स की।
ए रस अमृत अर्स का, कोई और न सके पी।। सिंगार 6/ 10
यह रस विशिष्ट है—इसे वही आत्मा पी सकती है जो परमधाम (अर्स) की निस्बत में लग चुकी हो। यह प्रेमरस किसी अन्य साधन या भोग से उपलब्ध नहीं होता।
अज्ञान का क्षय और पारब्रह्म का प्राकट्य
महामति की दृष्टि में आत्मा का वास्तविक परिवर्तन तब होता है, जब अज्ञान का अंधकार नष्ट हो जाता है। जैसे ही अंध अगनान उड़ जाता है, पारब्रह्म स्वयं प्रकट हो जाते हैं और आत्मा उनके रस-रंग में रंग जाती है।
ज्यारे अंध अगनान उडी गयुं, त्यारे प्रगट थया पारब्रह्म।
रंग लाग्यो ए रस तनो, ते छूटे वलतो केम।। किरन्तन 128/ 54
एक बार जो आत्मा इस रस में रंग जाती है, वह फिर उससे अलग क्यों और कैसे हो सकती है? यह रंग स्थायी है—यह अनुभवात्मक सत्य है, न कि केवल वैचारिक धारणा।
योगमाया और "एक रस एक रंग" का सिद्धान्त
संसार माया की परिवर्तनशील लीला है, किंतु परमधाम में योगमाया की एकरसता है—जहाँ द्वैत का विलय होकर प्रेम की अखंड धारा बहती है।
जोगमाया की जुगत जुई, एक रस एक रंग।
एक संगे सदा रेहेना, अंगना एकै अंग।। कलश हि. 20/ 11
यहाँ आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध अंग–अंगी का है—दो प्रतीत होते हुए भी वस्तुतः एक। यही तारतम्य की पराकाष्ठा है।
रस–रंग: प्रेम, हास, विनोद और लीलाएँ
महामति की वाणी में प्रेम कोई गंभीर, बोझिल या संकुचित अनुभव नहीं, बल्कि हँसी, विनोद, खेल और विलास से परिपूर्ण है। यही प्रेम आत्मा को सहज रूप से परमात्मा से जोड़ता है।
हांसी होसी साथ में, इन खेल के रस रंग।
पूर बिना बहे जात हें, कोई आड़ी होत अभंग।। कलश हि 22/14
यह रस बिना किसी बाँध के बहता है—कोई रुकावट उसे रोक नहीं सकती।
सोई खेलना सोई हंसना, सोई रस रंग के मिलाप।
जो होवे इन साथ का, सो याद करो अपना आप।। किरन्तन 93/ 10
यह स्मरण आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप की याद दिलाता है।
प्रेमरस की तृप्ति और आत्मिक आरोग्य
परमात्मा स्वयं कहते हैं कि वे आत्मा के अंग-अंग से प्रेमरस उत्पन्न करते हैं और पूर्ण प्रकाश देकर सभी रोग-विकार हर लेते हैं।
उपजाए देऊं अंग थें, रस प्रेम के प्रकार।
प्रकास पूरन करके, सब टालूं रोग विकार।। कलश हि. 23/36
यह प्रेमरस केवल भावात्मक नहीं, बल्कि आत्मा के सम्पूर्ण अस्तित्व को आरोग्य प्रदान करने वाला है।
स्वलीलाद्वैत: परमधाम का स्वरूप
आत्मा और परमात्मा के बीच का यह प्रेममय सम्बन्ध स्वलीलाद्वैत कहलाता है—जहाँ अनेक रूप, अनेक अनुभव और अनेक लीलाएँ होते हुए भी रस एक ही रहता है।
याको प्रेमैं है रस रंग, याको प्रेम सबों में अभंग।
याको प्रेम सनेह सुख साज, याको प्रेम खेलन संग राज।। परिक्रमा 1/ 38
परमधाम इसी रसरूप चिद्घन आनन्द की अखंड लीला-भूमि है, जहाँ आत्मा पूर्ण तृप्ति, उल्लास और एकता का अनुभव करती है।
निष्कर्ष: प्रेम, समर्पण और जिज्ञासा का मार्ग
महामति प्राणनाथ का सन्देश स्पष्ट है—परमात्मा तक पहुँचने के लिए कठिन योग, तर्क या कर्मकाण्ड आवश्यक नहीं। सच्ची जिज्ञासा, प्रेम और समर्पण ही पर्याप्त हैं। आत्मा जब अपने हृदय के दोनों पाँव परमात्मा के चरणों में धर देती है, तब वह पल-पल इस रस को पीती है और यह अमल कभी उतरता नहीं।
सो पल पल ए रस पीवत, फेर फेर प्याले लेत।
ए अमल क्यों उतरे, जाको हक बका सुख देत।। सिंगार 6/ 53
यही वास्तविक मुक्ति है—जहाँ आत्मा परम प्रेम, आनन्द और एकता में परमात्मा के विराट रसस्वरूप में विलीन हो जाती है।
मुख्य सूत्र (सार): परमात्मा रसरूप चिदानन्द हैं, आत्मा प्रेमरस की प्यासी है, संसार परिवर्तनशील माया-लीला है, परमधाम प्रेम और ज्ञान का उल्लासपूर्ण स्वलीलाद्वैत है, और इस तक पहुँचने का मार्ग केवल प्रेम, समर्पण और जिज्ञासा है।
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