सृष्टि की रचना पर तारतम–आधारित एकीकृत दृष्टि
सृष्टि की रचना पर तारतम–आधारित एकीकृत दृष्टि:
वेद–पुराण–विज्ञान: सीमाएँ और संवाद
सृष्टि की उत्पत्ति का प्रश्न केवल खगोल-विज्ञान या धर्म का विषय नहीं, बल्कि मानव चेतना की मूल जिज्ञासा है। वेद, पुराण और आधुनिक विज्ञान—तीनों ने इस रहस्य को अपने-अपने स्तर से समझने का प्रयास किया है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब इन भिन्न दृष्टियों को एक ही स्तर की भाषा मानकर आपस में टकराया जाता है। तारतम-दृष्टि, जिसे स्वसंवेद की वाणी कहा गया है, इस भ्रम को दूर करती है और बताती है कि सृष्टि को समझने के लिए स्तरों का विवेक आवश्यक है।
ऋग्वेद का प्रजापति सूक्त (10/121) सृष्टि को किसी भौतिक विस्फोट की तरह नहीं, बल्कि चेतना के भीतर घटित होने वाली प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करता है। हिरण्यगर्भ, तप और सलिल—ये सभी शब्द सृष्टि के पहले अनुभव के संकेत हैं। तारतम वाणी भी यही स्पष्ट करती है कि सृष्टि का आरम्भ पदार्थ से नहीं, बल्कि सुरत (चेतना के रुख) से होता है—
उपज्यो मोह सुरत संचरी, खेल हुआ माया विस्तरी।
(प्रकाश 36/23)
यहाँ "मोह" कोई नैतिक दोष नहीं, बल्कि वह आवरण है जिसके द्वारा अव्यक्त चेतना व्यक्त होने लगती है। सृष्टि का "खेल" तभी प्रारम्भ होता है, जब सुरत संचरित होती है।
उसी वैदिक सत्य को जब पुराणों में कथात्मक रूप दिया गया, तब हिरण्यगर्भ विश्व-अण्ड बना, महाविष्णु और नारायण जैसे रूप प्रकट हुए। तारतम-दृष्टि इन रूपकों को शाब्दिक इतिहास नहीं मानती, बल्कि अनुभव की प्रतीकात्मक भाषा मानती है। यह दृष्टि बताती है कि सृष्टि का रहस्य बाहर जितना है, उतना ही भीतर भी है। इसलिए तारतम वाणी नींद और जागरण के उदाहरण से सृष्टि को समझाती है—
मोह तत्व कहा नींद को, सुरत अहंकार।
(प्रकाश 31/81)
यह चौपाई अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह स्पष्ट करती है कि जिस प्रकार गहरी नींद में जगत अव्यक्त रहता है और जागरण में "मैं" के साथ जगत प्रकट होता है, उसी प्रकार सृष्टि भी अव्यक्त प्रकृति से व्यक्त रूप में आती है।
सांख्य और तारतम परंपरा में सृष्टि का पहला चरण महत्तत्व है—अर्थात् सत्ता की पहली स्फूर्ति। इसके बाद अहंकार प्रकट होता है, जहाँ "है" का अनुभव "मैं हूँ" बन जाता है। यही अहंकार आगे त्रिगुणात्मक विस्तार का आधार बनता है। तारतम वाणी इसे स्पष्ट शब्दों में कहती है—
मूल प्रकृति मोह अहं ते, उपजे तीनों गुन। किरंतन 22/2
और — तामस राजस स्वांतस, चले माहें गुन तीन।किरंतन
यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि त्रिगुण कोई नैतिक वर्गीकरण नहीं, बल्कि चेतना की गतिशील अवस्थाएँ हैं, जिनसे इन्द्रियाँ, तत्व और लोकों की रचना होती है।
आधुनिक विज्ञान इसी सृष्टि को बाह्य आयाम से देखता है। वह नियम खोजता है, गणना करता है और मॉडल बनाता है। क्वांटम विज्ञान में भी यह स्वीकार किया गया है कि पहले संभावना होती है, फिर घटना। यह तथ्य तारतम-दृष्टि से सादृश्य रखता है, परन्तु दोनों को एक मान लेना उचित नहीं। तारतम वाणी स्वयं चेतावनी देती है कि बाह्य गणना से सत्य को बाँधना सीमित दृष्टि है—
तिल जेता न खाली मकान। तारतम वाणी
यह कथन कोई खगोलीय आँकड़ा नहीं, बल्कि चेतना का उद्घोष है कि अस्तित्व में कहीं भी शून्यता नहीं—कहीं न कहीं किसी रूप में जीवन-लीला चल रही है।
तारतम-दृष्टि सृष्टि को केवल पृथ्वी तक सीमित नहीं करती। वह चौदह भुवनों से आगे भी जीवन-लीला को स्वीकार करती है और बताती है कि सृष्टि एक श्रृंखलाबद्ध तारतम्य में चल रही है—सूक्ष्म जीव से लेकर विराट ब्रह्माण्ड तक। इसी व्यापक दृष्टि के कारण तारतम वाणी मनुष्य को बौद्धिक विनम्रता सिखाती है
सो धनी बल ऐसा दियो, हम तारे चौदह भुवन।
अर्थात् सृष्टि की शक्ति और योजना मानव-बुद्धि से कहीं व्यापक है।
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि वेद चेतना का आंतरिक सत्य उद्घाटित करते हैं, पुराण उस सत्य को सांस्कृतिक और कथात्मक रूप देते हैं, विज्ञान बाह्य संरचना और नियमों को समझता है, और तारतम वाणी इन सभी को एक जीवित अनुभव में जोड़ देती है। यह न तो विज्ञान का विरोध करती है, न वेद को विज्ञान में बदलती है, बल्कि यह दिखाती है कि सृष्टि का सत्य बहु-स्तरीय है और हर स्तर की अपनी भाषा और सीमा है।
अंततः तारतम-दृष्टि हमें यह समझने में सहायता करती है कि सृष्टि कोई एक बार घटित घटना नहीं, बल्कि नित्य घटित होने वाली चेतना-लीला है—जो भीतर भी चल रही है और बाहर भी। यही समग्र दृष्टि वेद–पुराण–विज्ञान के बीच वास्तविक संवाद को संभव बनाती है।
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