शास्त्र से विज्ञान तक: चेतना का विकासात्मक मानचित्र
शास्त्र से विज्ञान तक: चेतना का विकासात्मक मानचित्र
बाइबिल–क़ुरान, वैदिक परंपरा, तारतम ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का टीलचेतना में पुनर्मिलन
संक्षेप सार
यह लेख बताता है कि विविध धर्म शास्त्र, तारतम ज्ञान और आधुनिक विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि मानव चेतना के विकास की अलग-अलग अवस्थाओंकी अभिव्यक्तियाँ हैं।
इस लेख में जिन "चेतना की अवस्थाओं" का उल्लेख है, वे किसी व्यक्ति की बुद्धि या श्रेष्ठता का माप नहीं हैं, बल्कि यह बताती हैं कि मनुष्य सत्य, संसार और स्वयं को किस तरह देखता और समझता है। एक ही व्यक्ति जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग स्तरों से सोच सकता है।
एम्बर (नियम–आधारित / मिथिक चेतना)
इस अवस्था में सत्य को ईश्वर, शास्त्र या परंपरा से मिला हुआ अंतिम नियम माना जाता है। सही–गलत स्पष्ट होते हैं, आज्ञापालन और कर्तव्य पर ज़ोर रहता है, और समूह की पहचान बहुत महत्वपूर्ण होती है। "मैं कौन हूँ?" से अधिक "मुझे क्या करना चाहिए?" का प्रश्न प्रमुख होता है। अधिकांश संगठित धर्मों का सामाजिक ढाँचा इसी स्तर पर खड़ा रहा है।
ऑरेंज (तर्कसंगत / विवेकशील चेतना)
यहाँ मनुष्य प्रश्न पूछना सीखता है। तर्क, प्रमाण, वैज्ञानिक सोच और व्यक्तिगत जिम्मेदारी को महत्व मिलता है। परंपरा को चुनौती दी जाती है और सत्य को समझने के लिए बुद्धि का उपयोग होता है। आधुनिक विज्ञान, शिक्षा और लोकतांत्रिक मूल्य इसी अवस्था से विकसित हुए।
ग्रीन (संवेदनशील / संबंधपरक चेतना)
इस स्तर पर केवल सही–गलत ही नहीं, बल्कि करुणा, प्रेम और आपसी समझमहत्वपूर्ण हो जाते हैं। दूसरे के दृष्टिकोण को समझने की क्षमता बढ़ती है। भक्ति, मानवीय मूल्य, समानता और समावेश पर ज़ोर रहता है। यहाँ "मैं" और "तुम" के बीच की दूरी कम होने लगती है।
टील (साक्षी / अनुभवात्मक चेतना)
इस अवस्था में व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और पहचान को देखने लगता है। सत्य को मानने के बजाय प्रत्यक्ष अनुभव (अनुभव, स्वसंवेद) से जाना जाता है। "मैं मन नहीं हूँ, मैं साक्षी हूँ" की समझ विकसित होती है। उपनिषद, गीता का गूढ़ संदेश, तारतम ज्ञान और आधुनिक चेतना-विज्ञान यहीं मिलते हैं।
टर्कॉइज़ (समग्र / कोस्मिक चेतना)
यह सबसे व्यापक दृष्टि है, जहाँ अद्वैत और विविधता विरोधी नहीं रहते। संसार को भ्रम नहीं, बल्कि चेतन लीला के रूप में देखा जाता है। व्यक्ति अपनी अलग पहचान रखते हुए भी समग्र अस्तित्व से जुड़ा अनुभव करता है। तारतम ज्ञान का "स्वलीलाद्वैत" इसी स्तर की अभिव्यक्ति है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि ये अवस्थाएँ सीढ़ी की तरह हैं—निचली अवस्था "गलत" नहीं होती, बल्कि अधूरी होती है। प्रत्येक अवस्था अपनी जगह आवश्यक है। समझ बढ़ने पर चेतना स्वाभाविक रूप से अगली अवस्था की ओर खुलती है।
बाइबिल और क़ुरान का ऐतिहासिक उपयोग मुख्यतः एम्बर (नियम-आधारित, मिथिक) चेतना से जुड़ा रहा, जबकि उनकी रहस्यवादी धाराएँ उच्च चेतना तक पहुँचती हैं। भारतीय परंपरा में यह विकास अधिक स्पष्ट है—प्रारंभिक वैदिक कर्मकांड से लेकर उपनिषदों की टील (साक्षी/अनुभवात्मक) चेतना और गीता की समन्वित दृष्टि तक।
तारतम ज्ञान किसी एक स्तर पर नहीं रुकता; वह अंध-आस्था की समीक्षा करता है, तर्क और प्रेम को जोड़ता है, स्वसंवेद और साक्षीभाव पर आधारित टील चेतना में स्थापित होता है, और आगे बढ़कर स्वलीलाद्वैत के माध्यम से कोस्मिक, समग्र दृष्टि प्रस्तुत करता है।
आधुनिक विज्ञान ने एम्बर से मुक्त होने के लिए ऑरेंज वस्तुनिष्ठता अपनाई, पर चेतना के प्रश्न पर आकर उसकी सीमा प्रकट हुई। आज विज्ञान ध्यान, अनुभूति और प्रेक्षक की भूमिका के अध्ययन के माध्यम से फिर से टील चेतना की ओर लौट रहा है। इस स्तर पर विज्ञान और तारतम ज्ञान मिलते हैं—दोनों प्रत्यक्ष अनुभव पर ज़ोर देते हैं—पर तारतम आगे जाकर अर्थ, स्मरण और लीला को भी जोड़ता है।
आइए, इन पर विस्तृत रूप से विचार करते हैं:
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मानव ज्ञान का विकास केवल विचारों का परिवर्तन नहीं है, बल्कि चेतना के देखने के ढंग का क्रमिक विस्तार है। धर्म, दर्शन और विज्ञान—तीनों को यदि विकासात्मक मनोविज्ञान (Spiral Dynamics / Integral दृष्टि) के संदर्भ में देखा जाए, तो वे परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि चेतना की भिन्न–भिन्न अवस्थाओं की अभिव्यक्तियाँप्रतीत होते हैं। इस दृष्टि से देखने पर शास्त्र, तारतम ज्ञान और आधुनिक विज्ञान एक ही सीढ़ी के अलग-अलग पायदानों पर खड़े दिखते हैं।
बाइबिल और क़ुरान का सामाजिक–ऐतिहासिक उपयोग प्रायः एम्बर (मिथिक–नियम आधारित) चेतना से जुड़ा रहा है। इस स्तर पर सत्य को ईश्वर-प्रदत्त, अंतिम और अक्षरशः माना जाता है; आज्ञापालन, नियम, नैतिक निश्चितता और "हम–वे" की स्पष्ट रेखाएँ प्रमुख होती हैं। यह अवस्था प्रारंभिक सभ्यताओं के लिए आवश्यक थी, क्योंकि इससे सामाजिक व्यवस्था और पहचान बनी। परंतु यह ध्यान रखना आवश्यक है कि शास्त्र स्वयं किसी एक स्तर तक सीमित नहीं होते—व्याख्याएँ सीमित होती हैं। ईसाई रहस्यवादी (जैसे माइसटर एकहार्ट) और इस्लाम के सूफ़ी संत (जैसे रूमी, इब्न अरबी) इसी परंपरा के भीतर रहते हुए टील (साक्षी/अद्वैत)चेतना तक पहुँचे।
भारतीय परंपरा में यह विकास अधिक स्पष्ट रूप से अंतर्निहित है। प्रारंभिक वैदिक कर्मकांड में एम्बर तत्व मिलते हैं—यज्ञ, ऋत, सामाजिक भूमिकाएँ। किंतु उपनिषद एक निर्णायक छलांग हैं। वे कर्म और अनुष्ठान की सत्ता पर प्रश्न उठाते हैं और "मैं कौन हूँ?" जैसे मूल प्रश्न के द्वारा प्रत्यक्ष अनुभूति (अनुभव) को केंद्र में रखते हैं। यहाँ ब्रह्म कोई मिथकीय देव नहीं, बल्कि निराकार चेतना है—यह स्पष्ट रूप से टील चेतना का संकेत है। भगवद्गीता इस विकास को और भी समन्वित करती है: वह एम्बर का धर्म (कर्तव्य), ऑरेंज का विवेक (नैतिक विवेचन), ग्रीन की भक्ति (प्रेम) और टील की साक्षी-दृष्टि—सभी को एक साथ साधती है। गीता का संदेश त्याग नहीं, बल्कि अनासक्ति के साथ कर्म है—जो परिपक्व चेतना का लक्षण है।
तारतम ज्ञान किसी एक स्तर पर नहीं रुकता। यह एक निदानात्मक और जागरणात्मक प्रणाली है, जो हर स्तर से बात करते हुए उससे आगे ले जाती है। यह अंध-आस्था, मूर्तिपूजा में फँसी चेतना और शास्त्रीय अहंकार—इन सबकी तीखी समीक्षा करता है; यह एम्बर की सीमाओं को उजागर करता है, पर उसे नष्ट नहीं करता—उसे पार करता है। तारतम तर्क (ऑरेंज) का प्रयोग करता है, पर तर्कवाद पर नहीं रुकता। यह प्रेम (ग्रीन) को आवश्यक मानता है, पर भावुकता में नहीं बहता। इसका केंद्र स्वसंवेद, साक्षीभाव और प्रत्यक्ष अनुभूति है—यानी टील चेतना। किंतु तारतम यहाँ भी नहीं ठहरता; वह स्वलीलाद्वैत की बात करता है—जहाँ अद्वैत के भीतर भी लीला, संबंध और चेतन आनंद बना रहता है। यह टर्कॉइज़ (समग्र/कोस्मिक) दृष्टि है—जहाँ एक और अनेक विरोधी नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व में हैं।
आधुनिक विज्ञान ने एक भिन्न मार्ग अपनाया। एम्बर धर्मसत्ता से मुक्त होने के लिए उसे ऑरेंज वस्तुनिष्ठता अपनानी पड़ी—मापन, पुनरावृत्ति और बाह्य प्रमाण। यह कदम आवश्यक था और अत्यंत सफल भी रहा। परंतु इसी प्रक्रिया में चेतना स्वयं विज्ञान से बाहर हो गई। समय के साथ विज्ञान एक दीवार से टकराया—चेतना की हार्ड प्रॉब्लम, क्वांटम भौतिकी में प्रेक्षक की भूमिका, और अनुभव को न्यूरॉन्स में घटा पाने की असमर्थता। परिणामस्वरूप विज्ञान अब चुपचाप टील चेतना की ओर लौट रहा है। न्यूरो-फिनोमेनोलॉजी में प्रथम-पुरुष अनुभव को डेटा माना जा रहा है; ध्यान और साक्षी अवस्थाओं पर वैज्ञानिक अध्ययन हो रहे हैं; संज्ञानात्मक विज्ञान "स्व" को एक निर्मित मॉडल मान रहा है। यहाँ वस्तु और प्रेक्षक का कठोर विभाजन ढहने लगता है।
यहीं पर विज्ञान और तारतम ज्ञान का स्पर्श-बिंदु बनता है। दोनों अंध-विश्वास को अस्वीकार करते हैं, दोनों प्रत्यक्ष देखने (अनुभव) पर ज़ोर देते हैं, दोनों अहं-स्व की कृत्रिमता को उजागर करते हैं। अंतर यह है कि विज्ञान वर्णन तक रुक जाता है, जबकि तारतम स्मरण और उद्देश्य को पुनः स्थापित करता है। विज्ञान कहता है—"चेतना है।" तारतम कहता है—"तुम वही हो, और तुम अपनी लीला को भूल गए हो।"
इस प्रकार धर्म, दर्शन और विज्ञान का संघर्ष वास्तव में संघर्ष नहीं, बल्कि असमान विकास की कहानी है। जब इन्हें चेतना के विकासक्रम में रखा जाता है, तो वे एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही यात्रा के अलग-अलग पड़ाव बन जाते हैं। और टील चेतना पर पहुँचकर—वे फिर से एक-दूसरे को समझना शुरू करते हैं।
चेतना अवस्था | अवस्था का स्वरूप | तारतम ज्ञान की दृष्टि | मुख्य संदेश |
एम्बर (नियम–मिथिक) | शास्त्र, मूर्ति, कर्मकांड, भय-आधारित धर्म | अंध-आस्था की समीक्षा करता है, बाह्य रूप सेमुक्त करता है | "शब्द में मत अटक, सार कोदेख।" |
ऑरेंज (तर्क–विवेक) | प्रश्न, तर्क, आलोचना, बौद्धिकस्पष्टता | तर्क का उपयोग करता है, पर तर्क में कैद नहींकरता | "बुद्धि साधन है, सत्य नहीं।" |
ग्रीन (प्रेम–भक्ति) | भाव, करुणा, संबंध, समावेश | प्रेम को शुद्ध करता है, भावुकता से बचाता है | "प्रेम बिना ज्ञान अंधा है।" |
टील (साक्षी–अनुभव) | स्वसंवेद, साक्षीभाव, अहं काविघटन | यहाँ तारतम स्थापित होता है | "जो देख रहा है, वही तू है।" |
टर्कॉइज़(स्वलीलाद्वैत) | अद्वैत + लीला, एक में अनेक | परमधाम और दिव्य खेल की अनुभूति | "एक ही अनेक बनकर खेलरहा है।" |
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