बाह्य आचरण और अंतर्भाव तारतम दृष्टि में “क्रिया–भाव भ्रांति”

बाह्य आचरण और अंतर्भाव

तारतम दृष्टि में क्रिया–भाव भ्रांति

 

नरेन्द्र पटेल, टेम्पा, मई 30, 2016

 

प्रस्तावना: बाह्य आचरण और अंतर्भाव का अंतर

मनुष्य प्रायः दूसरों का मूल्यांकन उनके बाहरी आचरण को देखकर करता है। कोई व्यक्ति मंदिर जाता है, भजन गाता है, सत्संग में बैठता है, सेवा करता है, धार्मिक भाषा बोलता है या आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करता है, तो हम सहज ही मान लेते हैं कि उसकी चेतना भी उसी अनुपात में विकसित होगी। किंतु क्या वास्तव में ऐसा है?

महामति प्राणनाथजी की वाणी हमें बार-बार सावधान करती है कि बाहरी क्रिया और भीतरी भाव एक ही बात नहीं हैं। दो व्यक्ति एक ही चौपाई पढ़ सकते हैं, एक ही नाम का स्मरण कर सकते हैं, एक ही बीतक में बैठ सकते हैं, फिर भी उनकी चेतना की अवस्था, उनकी प्रेरणा और उनका अनुभव एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हो सकता है। एक व्यक्ति परंपरा निभाने आया है, दूसरा प्रेम में खिंचा चला आया है। एक सामाजिक पहचान के लिए बैठा है, दूसरा अपने निजस्वरूप की खोज में। बाहर से दोनों समान दिखाई देते हैं, पर भीतर की दुनिया अलग है।

 

तारतम वाणी का आग्रह: क्रिया मात्र नहीं, भाव प्रमाण है।

इसी कारण तारतम वाणी बार-बार बाह्य कर्म से अधिक अंतःकरण की स्थिति को महत्त्व देती है—

अंदर नाहीं निरमल, फेर-फेर नहावे बाहेर।

कर देखाई कोट बेर, तोहे न मिले करतार।।”

और—

कोट करो बंदगी, बाहेर हो निर्मल।

तोलों पीऊ न पाइए, जो लो ना साधे दिल।।”

यहाँ संदेश स्पष्ट है—केवल क्रिया पर्याप्त नहीं है; क्रिया के पीछे का भाव ही उसकी वास्तविक आध्यात्मिक गुणवत्ता निर्धारित करता है। यदि दिल नहीं बदला, यदि चेतना में प्रेम, विनम्रता और स्वरूप-स्मृति नहीं जागी, तो बाहरी धार्मिकता केवल एक आवरण बनकर रह जाती है।

 

रस और रटन: एक ही शब्द, भिन्न चेतना

तारतम वाणी इस सत्य को “रस और रटन” के भेद द्वारा और अधिक स्पष्ट करती है। दो व्यक्ति एक ही चौपाई का पाठ कर सकते हैं। एक के लिए वह केवल शब्दों की पुनरावृत्ति है; दूसरे के लिए वही चौपाई चेतना का द्वार बन जाती है।

रटन में शब्द हैं, रस में अनुभव है। रटन में स्मृति है, रस में साक्षात्कार है। रटन में धर्म है, रस में प्रेम है। रटन में व्यक्ति वाणी चौपाई को पढ़ता है, जबकि रस में चौपाई व्यक्ति को पढ़ने लगती है। बाहर से दोनों समान दिखाई देते हैं, पर भीतर उनकी चेतना की संरचना भिन्न होती है।

 

आधुनिक मनोविज्ञान की दृष्टिमें:

आधुनिक भाषा में क्रिया–भाव भ्रांति की भूल को “कंटेन्ट -स्ट्रक्चर फालेसी” कहा जाता है। सरल शब्दों में इसका अर्थ है—किसी व्यक्ति की बाहरी अभिव्यक्तियों (Content) को देखकर उसकी आंतरिक चेतना, प्रेरणा या विकासात्मक अवस्था (Structure) का अनुमान लगा लेना। अर्थात क्रिया को देखकर भाव का, और अभिव्यक्ति को देखकर चेतना-विकास की संरचना का निर्णय कर लेना।

मनोविज्ञान, शिक्षा और नेतृत्व-अध्ययन में इस अवधारणा का उपयोग यह समझने के लिए किया जाता है कि समान विचार, भाषा या व्यवहार रखने वाले लोग आवश्यक नहीं कि चेतना या व्यक्तित्व-विकास के समान स्तर पर हों। उदाहरण के लिए, दो व्यक्ति कह सकते हैं—“सभी मनुष्य समान हैं।” पहला व्यक्ति इसे केवल एक सामाजिक आदर्श के रूप में दोहरा रहा हो सकता है, जबकि दूसरा वास्तव में विविध संस्कृतियों, धर्मों और विचारों के प्रति गहरा सम्मान विकसित कर चुका होता है। दोनों का कथन समान है, पर उनकी चेतना की संरचना भिन्न है।

            इसी प्रकार दो व्यक्ति कह सकते हैं—“ईश्वर सर्वत्र है।” एक ने यह वाक्य सुन रखा है; दूसरा उसे अपने जीवन का अनुभव बना चुका है। वाक्य समान है, पर चेतना समान नहीं है।

 

चेतना-संरचना (Structure) क्या निर्धारित करती है?

चेतना-संरचना (Structure of Consciousness) यह निर्धारित करती है कि व्यक्ति संसार को कैसे देखता है, किन बातों को महत्वपूर्ण मानता है, और किसी कार्य के पीछे उसकी वास्तविक प्रेरणा (motivation) क्या है। उसी के आधार पर उसकी सोच (thought), कथन (speech) और कर्म (action) आकार लेते हैं।

इसी कारण विकास-स्तर का निर्धारण मुख्यतः इस बात से नहीं होता कि व्यक्ति क्या सोचता है, क्या कहता है या क्या करता है, बल्कि इस बात से होता है कि वह किस चेतना-संरचना से सोचता, कहता और करता है।

एक ही कर्म, अलग-अलग चेतना-संरचनाएँ: मान लीजिए छह व्यक्ति किसी गरीब को दान देते हैं। बाहरी दृष्टि से सभी का कर्म (Action) समान है—सभी ने दान दिया। किन्तु उनके भीतर कार्य कर रही चेतना भिन्न हो सकती है: दंड-आधारित चेतना:
"दान नहीं दूँगा तो पाप लगेगा।" स्वार्थ-आधारित चेतना:"दान देने से मेरा पुण्य बढ़ेगा।" सामाजिक स्वीकृति-आधारित चेतना:
"लोग मुझे अच्छा इंसान समझेंगे।" कर्तव्य-आधारित चेतना:"समाज और धर्म का यही नियम है; मुझे अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।" मानवतावादी चेतना:"हर मनुष्य सम्मान और सहायता का अधिकारी है।"  सार्वभौमिक करुणा की चेतना:"दूसरे का दुःख भी किसी अर्थ में मेरा ही दुःख है।"  कर्म एक ही है, पर उसके पीछे कार्यरत चेतना-संरचना अलग-अलग है।

 

सामान्य भूल यह हो जाती है कि हम अक्सर किसी व्यक्ति के कथनों, मान्यताओं या व्यवहार को देखकर उसके विकास-स्तर का अनुमान लगा लेते हैं। जबकि समान कथन और समान व्यवहार के पीछे बिल्कुल भिन्न चेतना-स्तर कार्य कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, केवल इसलिए कि कोई किशोर जलवायु परिवर्तन (Climate Change) या वैश्विक तापमान वृद्धि (Global Warming) की बात कर रहा है, यह आवश्यक नहीं कि वह बहुलवादी (ग्रीन, Pluralistic) चेतना में कार्य कर रहा हो। वह यह विषय:

  • परीक्षा की तैयारी के लिए पढ़ रहा हो सकता है,
  • सामाजिक स्वीकृति पाने के लिए दोहरा रहा हो सकता है,
  • किसी समूह की विचारधारा से प्रभावित होकर बोल रहा हो सकता है,
  • या वास्तव में समस्त पृथ्वी और भावी पीढ़ियों के प्रति गहरी करुणा और उत्तरदायित्व से प्रेरित हो सकता है।

विषय (Content) एक ही है, पर चेतना की संरचना (Structure) अलग-अलग हो सकती है।

 

पुरातन और नवीन के बीच संतुलित दृष्टि

एक और रोचक विडम्बना यह है कि मनुष्य प्रायः दो अतियों में झूलता रहता है। एक ओर कुछ लोग प्राचीन धर्मग्रंथों और आध्यात्मिक परंपराओं का गहन अध्ययन एवं मनन किए बिना ही नई मनोवैज्ञानिक या दार्शनिक शब्दावली से इतने प्रभावित हो जाते हैं कि उन्हें लगता है मानो ये सत्य पहली बार आधुनिक युग में खोजे गए हों। परिणामस्वरूप वे शास्त्रीय ज्ञान की गहराई का पर्याप्त सम्मान नहीं कर पाते। दूसरी ओर कुछ कट्टर धार्मिक प्रवृत्तियाँ ऐसी भी हैं जो किसी आधुनिक अंतर्दृष्टि या वैज्ञानिक खोज को केवल इसलिए अस्वीकार कर देती हैं क्योंकि वह पारंपरिक भाषा में व्यक्त नहीं हुई है।

तारतम वाणी दोनों अतियों से बचने की प्रेरणा देती है। वह न तो अंध-परंपरावाद का समर्थन करती है और न ही नवीनता-मोह का। वास्तविक विवेक यह है कि सत्य को उसके स्रोत या भाषा से नहीं, बल्कि उसके सार और अनुभवजन्य मूल्य से परखा जाए।

 

नाम-स्मरण: ध्वनि से स्वरूप-स्मृति तक

यही बात नाम-स्मरण पर भी लागू होती है। दो व्यक्ति समान संख्या में नाम-जप कर सकते हैं। एक यांत्रिक रूप से कर रहा है, दूसरा प्रेम और स्वरूप-स्मृति में डूबकर। बाहरी दृष्टि से दोनों समान हैं, पर चेतना की दृष्टि से उनके बीच विशाल अंतर है।

तारतम वाणी में नाम केवल ध्वनि नहीं, बल्कि निजस्वरूप की स्मृति का माध्यम है। यदि नाम केवल होंठों तक सीमित रह जाए तो वह Content है; यदि वह चेतना को रूपांतरित करने लगे तो वह Structure को स्पर्श करता है।

 

क्षर–अक्षर–अक्षरातीत: चेतना की विभिन्न संरचनाएँ

तारतम वाणी का क्षर–अक्षर–अक्षरातीत का सिद्धांत भी इस विषय को समझने की एक गहन कुंजी प्रदान करता है। क्षर स्तर पर व्यक्ति देह, अहंकार, सामाजिक पहचान और सांसारिक अपेक्षाओं में केंद्रित रहता है। अक्षर स्तर पर वह आत्मिक विवेक, आध्यात्मिक अर्थ और सूक्ष्म सत्यों की ओर उन्मुख होता है। अक्षरातीत की अनुभूति में प्रेम, समर्पण और निजस्वरूप का बोध प्रमुख हो जाता है।

इन तीनों स्तरों के व्यक्ति एक ही भजन गा सकते हैं, एक ही वाणी पढ़ सकते हैं, पर उनके अनुभव और चेतना की गहराई भिन्न होगी। शब्द समान हैं, परंतु वे जिस भूमिका और चेतना से निकल रहे हैं, वही उनकी वास्तविक आध्यात्मिक अवस्था को प्रकट करती है।

 

चेतना अवस्था (State of consciousness) और विकास-स्तर (Stage of development) का अंतर

दूसरी ध्यान देने योग्य बात यह है कि किसी व्यक्ति को ध्यान, भक्ति या प्रेम में कभी-कभी अत्यंत ऊँचा अनुभव हो सकता है; परंतु यह आवश्यक नहीं कि उसकी चेतना की संरचना भी उसी स्तर तक विकसित हो गई हो। आधुनिक चेतना-अध्ययन में ऊँचे अनुभव को State (अवस्था) और चेतना की स्थायी परिपक्वता को Stage (विकास-स्तर) कहा जाता है।

तारतम वाणी भी क्षणिक भावावेश और स्थायी जागृति में अंतर करती है। किसी क्षण की आध्यात्मिक अनुभूति और जीवन में स्थायी स्वरूप-स्थिति एक ही बात नहीं हैं। क्षणिक झलक और स्थायी जागनी में अंतर है।

 

आध्यात्मिक पलायन (Spiritual Bypassing) का खतरा

इसी प्रकार आध्यात्मिक पलायन (Spiritual Bypassing) का खतरा भी उपस्थित रहता है। जब व्यक्ति धर्म, ज्ञान, साधना, आध्यात्मिक भाषा या धार्मिक पहचान का उपयोग अपनी भीतरी अपरिपक्वताओं, भय, क्रोध या अहंकार को छिपाने के लिए करने लगता है, तब वह वास्तविक विकास से दूर होने लगता है।

वह प्रेम की बात करता है, पर क्षमा नहीं कर पाता। समर्पण की चर्चा करता है, पर नियंत्रण नहीं छोड़ पाता। ज्ञान की बात करता है, पर विनम्रता विकसित नहीं कर पाता। इस प्रकार धर्म और ज्ञान की ओट में अंतःकरण की अशुद्धियों को अनदेखा कर देने से बाहरी विषय-वस्तु (Content) और चेतना की वास्तविक संरचना (Structure) के बीच अंतर बना रहता है।

 

जागनी: सूचना नहीं, रूपांतरण

तारतम वाणी का वास्तविक आग्रह केवल बाहरी धार्मिकता या मानसिक विकास नहीं, बल्कि जागनी है। जागनी का अर्थ मात्र सूचना प्राप्त करना नहीं, बल्कि चेतना का रूपांतरण है—रटन से रस तक, कर्म से प्रेम तक, देहाभिमान से स्वरूप-बोध तक, और आत्मबोध से परमधामिक स्मृति तक की यात्रा। यही वह प्रक्रिया है जिसमें विषय-वस्तु (Content) धीरे-धीरे चेतना की संरचना (Structure) में और Structure अंततः स्वरूप-बोध में रूपांतरित होता है।

 

तारतम वाणी और आधुनिक विकासात्मक मनोविज्ञान

यहाँ तारतम वाणी एक और महत्त्वपूर्ण आयाम जोड़ती है। आधुनिक विकासात्मक सिद्धांत चेतना की संरचना तक पहुँचकर रुक जाते हैं, जबकि तारतम वाणी उससे भी आगे बढ़ती है। उसके अनुसार आध्यात्मिक पूर्णता केवल चेतना की परिपक्वता नहीं, बल्कि अपने अक्षरातीत स्वरूप की पहचान और परमधामिक स्मृति में प्रतिष्ठा है।

अतः विकास (Development) महत्वपूर्ण है, किंतु उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है स्मरण (Remembrance)। चेतना का उत्कर्ष आवश्यक है, पर अंतिम लक्ष्य घर-वापसी—अपने मूल स्वरूप की पहचान है। इसके लिए ध्यान के साथ चितवन, ज्ञान के साथ प्रेम और साधना के साथ स्मृति का जुड़ना आवश्यक है।

 

निष्कर्ष: क्रिया से भाव और भाव से स्वरूप तक

 

इस प्रकार बाह्य आचरण और अंतर्भाव के बीच का अंतर केवल आध्यात्मिक साधना का विषय नहीं, बल्कि चेतना-विज्ञान का भी एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। आधुनिक मनोविज्ञान इसे Content–Structure Fallacy कहता है, जबकि तारतम वाणी इसे रस और रटन, बाह्य कर्म और अंतःकरण, तथा देहाभिमान और स्वरूप-बोध के भेद द्वारा बहुत पहले से स्पष्ट करती आई है।

महामति प्राणनाथजी का संदेश है कि आध्यात्मिक जीवन का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि व्यक्ति क्या बोलता है, क्या पढ़ता है, या कौन-सी धार्मिक क्रियाएँ करता है; बल्कि इस आधार पर किया जाना चाहिए कि उसके भीतर प्रेम, विनम्रता, करुणा, स्वरूप-स्मृति और जागृति कितनी विकसित हुई है।

इसलिए वास्तविक साधना केवल सही शब्द सीखना नहीं, बल्कि सही चेतना में जीना है; केवल धर्म का पालन करना नहीं, बल्कि धर्म के मर्म को आत्मसात करना है; केवल नाम का उच्चारण करना नहीं, बल्कि नाम के माध्यम से अपने निजस्वरूप को पहचानना है। जब क्रिया भाव में, भाव चेतना में, और चेतना स्वरूप-बोध में रूपांतरित हो जाती है, तभी जागनी पूर्ण होती है। यही वास्तविक जागनी है, यही रस है, और यही तारतम का सार है।

 

केवल कथन नहीं, चेतना का स्तर भी देखना चाहिए

मुत्तकी शब्द को समझते समय एक महत्वपूर्ण भूल से बचना आवश्यक है। हम अक्सर किसी व्यक्ति के शब्दों, धार्मिक भाषा, या बाहरी आचरण को देखकर उसकी चेतना का स्तर निर्धारित कर लेते हैं। परंतु आधुनिक विकासात्मक मनोविज्ञान और इंटीग्रल दृष्टि दोनों बताती हैं कि समान शब्दों के पीछे भिन्न चेतना-स्तर कार्य कर सकते हैं।

लॉरेंस कोहलबर्ग नामक मनोविज्ञानी ने इसे समझाने के लिए एक प्रसिद्ध उदाहरण दिया, जिसे हाइन्ज़ दुविधा कहा जाता है: एक व्यक्ति अपनी मृत्युशय्या पर पड़ी पत्नी को बचाने के लिए महँगी दवा चुरा लेता है। प्रश्न पूछा जाता है: क्या हाइन्ज़ को दवा चुरानी चाहिए थी?”

आश्चर्य की बात यह है कि दो व्यक्ति “हाँ” कह सकते हैं, फिर भी उनकी चेतना समान नहीं होती। एक कह सकता है: हाँ, क्योंकि पत्नी उसके काम आती है।” दूसरा कह सकता है: हाँ, क्योंकि मानव जीवन किसी संपत्ति से अधिक मूल्यवान है।” उत्तर समान है, परंतु तर्क और चेतना-स्तर अलग हैं।

इस प्रयोग द्वारा कोहलबर्ग ने दिखाया कि नैतिक विकास के विभिन्न स्तरों पर व्यक्ति एक ही उत्तर दे सकता है, पर उसका आधार अलग होता है—दंड का भय, स्वार्थ, सामाजिक स्वीकृति, कानून, सार्वभौमिक अधिकार या सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत।

 

यही भूल आध्यात्मिक जीवन में भी होती है।

दो व्यक्ति कह सकते हैं—ईश्वर सर्वत्र है।” पहला व्यक्ति केवल सुनी हुई बात दोहरा रहा हो सकता है। दूसरा व्यक्ति उस सत्य को अपने जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव बना चुका हो सकता है।

इसी प्रकार दो व्यक्ति कह सकते हैं— सभी मनुष्य समान हैं।” एक इसे सामाजिक नारा समझकर दोहरा रहा है। दूसरा वास्तव में विविध संस्कृतियों, धर्मों और दृष्टिकोणों के प्रति गहरा सम्मान विकसित कर चुका है।

शब्द समान हैं, पर चेतना समान नहीं है।

 

मुत्तकी को समझने में यह बात क्यों महत्वपूर्ण है?

यदि कोई व्यक्ति “अल्लाह”, “ईमान”, “बन्दगी”, “तक़वा” या “मुत्तकी” जैसे शब्द बोलता है, तो केवल शब्द सुनकर यह नहीं माना जा सकता कि वह तारतम वाणी में वर्णित ईश्वरी सृष्टि की चेतना में स्थित है।

तारतम वाणी के अनुसार ईश्वरी सृष्टि की पहचान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उसके आंतरिक गुणों से होती है—

और सृष्ट जो ईश्वरी, कही जाग्रत सृष्ट आतम।

सुबुध अंग करनी सुध, चले फुरमान हुकम।।”

अर्थात्: जाग्रत चेतना, सद्बुद्धि, निर्मल आचरण, और हुक्म के अनुसार चलना ये ईश्वरी सृष्टि के लक्षण हैं। इसीलिए तारतम वाणी बार-बार पहचान (Recognition) पर बल देती है:

ना पेहेचान मुतकी की, ना पेहेचान मोमिन।।”

अर्थात् समस्या शब्दों की नहीं, पहचान की है।

 

एकीकृत बोध

Content (विषय-वस्तु) का अर्थ है: व्यक्ति क्या कह रहा है। Structure (चेतना की संरचना) का अर्थ है: वह किस स्तर की चेतना से कह रहा है। तारतम वाणी का जोर भी केवल कथन पर नहीं, बल्कि चेतना की वास्तविक पहचान पर है। इसलिए “मुत्तकी” को केवल एक धार्मिक पद या परहेज़गार व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि ईश्वरी सृष्टि की जाग्रत चेतना के रूप में समझना चाहिए।

 

अंदर नाहीं निरमल, फेर-फेर नहावे बाहेर। कर देखाई कोट बेर, तोहे न मिले करतार।।”

चर्चा श्री धाम की, करे बिहारीजी बाहिर: बीतक 17/4 क्रिया में चर्चा है, लेकिन भाव दिखावे का। जो जाग्रत नहीं थे वे भ्रांति में रहे।

दृष्ट दज्जाल की बाहिर, तुम को दाई दृष्ट अंदर। : अंतर्दृष्टि खुलने पर करीत-भाव भ्रांति समाप्त हो जाती है। बीतक 47/32

बाहेर देखावे बंदगी, माहें करें कुकरम काम। महामत पूछे ब्रह्मसृष्ट को, ए वैकुंठ जायसी के धाम।। प्रकाश 6/32

दुष्ट थई अवगुण करे, ते जी जमपुरी रोय। पण साध थई कुकरम करे, तेणूँ थाम न देखूँ कोय।। किरन्तन 128/7

कायरों के दिल में, बड़ा जो पैठा डर। दिल में मुनाफ़की थी, बनाए बातें करें ऊपर ।। बीतक 43/3

इन विध सेवें श्याम को, कहे जो मुनाफक। कहावे बराबर बुजरक, पर गई न आखिर लों शक।। किरन्तन 94/16

कई जूबाँ ईमान दिल में नहीं, सो तो कहे मुनाफक।। खुलासा 7/17 माहें मैले बाहेर उजले, सो तो कहे मुनाफाक। सिनगार 1/41

 


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