आत्मा-विहीन धर्म:हमारे ध्रुवीकृत युग का दर्पण: महामति प्राणनाथ की सनंध अध्याय 40

आत्मा-विहीन धर्म: 

हमारे ध्रुवीकृत युग का दर्पण: महामति प्राणनाथ की सनंध अध्याय 40 :

(युवाओं का पुनःकेंद्रणसमाज की सुरक्षाऔर विवेक की पुनर्स्थापना)

 

मैंने जीवनभर यह समझने का प्रयास किया है कि धर्म मानवता को कैसे जगाता है—और जब वह आत्मा से रिक्त हो जाता है तो कैसे उसे तोड़ देता है। इसी दृष्टि-स्थान से, आगे के ये चिंतन—महामति प्राणनाथ के सनंध अध्याय 40, prophetic history (नबियों/पैगम्बरों के ऐतिहासिक संदर्भ) और आज की समकालीन वास्तविकताओं के आलोक में—हमारे समुदाय, विशेषकर युवा पीढ़ी, के हित में प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

 

1) हमारे समय का संकट: विवेक के स्थान पर भय

धार्मिक ध्रुवीकरण (religious polarization) के युग में महामति प्राणनाथ हमें स्मरण कराते हैं कि धर्म का सच्चा उद्देश्य मानवता को बाँटना नहीं, बल्कि उसे जगाना है। सनंध प्रकरण 40 किसी धर्म विशेष पर आक्रमण नहीं है; वह आत्मा-विहीन धर्म का अनावरण है। इसकी प्रासंगिकता कालातीत है।

 

आज social media अधूरी/आंशिक सूचना को तेजी से पूर्ण और अंतिम निर्णय (absolute judgment) में बदल देता है। युवा अक्सर selective clips (चुने हुए क्लिप)viral accusations (वायरल आरोप)identity panic (पहचान-आतंक), और "हम बनाम वे" वाली narratives के माध्यम से धर्म से परिचित होते हैं।

 

ऐसे वातावरण में sincere (ईमानदार) लोग भी अपना inner balance (आंतरिक संतुलन) खो बैठते हैं। मन reactive (प्रतिक्रियाशील) हो जाता है, और धर्म transformation (रूपांतरण) का मार्ग बनने के बजाय एक badge (पहचान-चिह्न) बन जाता है। आज, लगभग चार दशकों बाद, मैं देखता हूँ कि मेरे कई प्रियजन और मित्र भी —अक्सर existential scare (अस्तित्वगत भय) के कारण—reality (वास्तविकता) के बजाय conspiracies (षड्यंत्र-कथाओं) को चुन लेते हैं।

 

महामति प्राणनाथ का कार्य यहाँ एक सर्जन डॉक्टर की तरह सामने आता है—किसी एक पक्ष को भड़काने के लिए नहीं, बल्कि उस गहरे रोग को पहचानने और दिखाने के लिए जिसे हम अक्सर धार्मिक निश्चितता के रूप में ओढ़ लेते हैं, जबकि भीतर से वह आध्यात्मिक खालीपन होता है।

 

2) सनंध 40: आत्मा-विहीन धर्म के सामने रखा दर्पण

सनंध अध्याय 40 विशेष रूप से उन ज़ाहिरी मुसलमानों पर ध्यान केंद्रित करता है जो धर्म को आत्मा से रिक्त करके दिखावे का जी रहे हैं—इसलिए नहीं कि केवल इस्लाम या हिंदू धर्म ही खोखला (hollow) हो सकता है; बल्कि इसलिए कि महामति एक universal pattern (सार्वभौमिक प्रवृत्ति) का निदान कर रहे हैं: जब धार्मिक identity सत्ता, भय, status (प्रतिष्ठा) या coercion (बल-प्रयोग) बन जाती है, तब faith (आस्था) की आत्मा मर जाती है।

 

वे आध्यात्मिक अहंकार और झूठे दावों के विरुद्ध तीखी चेतावनी से आरंभ करते हैं:

"लिख्या है कतेब में, पाया न किन ठौर।

ना फिरस्तों ना नबियों, तो क्यों पावे कोई और॥" (1)

यदि सेमिटिक शास्त्रों में यह स्पष्ट लिखा है कि फ़रिश्तों और नबियों में से भी किसी ने परम धाम का ठौर-ठिकाना पाने का दावा नहीं किया, तो फिर साधारण लोग या साधारण दावेदार इतनी निश्चयात्मकता से कैसे बोल सकते हैं? सच्ची अनुभूति को पद, विद्वत्ता, या वंशानुगत पहचान में घटाया नहीं जा सकता।

 

फिर वे बताते हैं कि नबियों/रसूलों की लिखी बातों में भी परम-तत्त्व को अगम माना गया है:

"लिख्या जो रसूल ने, तिन तो कह्या अगम।

तबक चौदे ख्वाब के, न्यारा रह्या खसम॥" (2)

नबी/रसूल ने उच्चतम सत्य के विषय में संकेत दिए, पर उसे सामान्य समझ के परे (अगम) माना। चौदह लोकों/तबकों को "ख्वाब"-सा बताया—अनुभव में वास्तविक, पर अंतिम नहीं—जबकि परम प्रियतम उन सब से परे और पूर्व है। ये पंक्तियाँ केवल इस्लाम की बात नहीं करतीं। ये धार्मिक ego पर सार्वभौमिक लगाम हैं: status, scholarship, और inherited identity (पद, विद्वत्ता, विरासत) realization नहीं हैं।

 

3) वह रोग जिसे महामति उजागर करते हैं: अनुभूति-रहित अधिकार

महमति उन लोगों के प्रति विशेष कठोर हैं जो धर्म को control (नियंत्रण) का उद्योग बना देते हैं:

            "खुद किन को ना मिल्या, अब काजी कजा चलाए।

कहें जो चाहे खुद को, हम मिलावें ताए॥" (3)

जब स्वयं किसी ने उस परम अवस्था की अनुभूति नहीं पाई, तब भी वही वर्ग "काज़ी" बनकर न्याय (कज़ा) चलाने लगता है—और यह दावा करता है कि जो भी आध्यात्मिक कल्याण चाहता है, उसे उन्हीं के माध्यम से जाना होगा, मानो वही परमात्मा से मिलाने के एकमात्र मध्यस्थ हों।

 

वे बताते हैं कि ज्ञान किस तरह अहंकार बन जाता है:

"पढे मुल्लां आगूं हुए, सो तो खाए गुमान।

लोकों को बतावहीं, कहें हम पढे कुरान॥" (4)

पढ़े-लिखे मुल्ला लोगों को मार्ग बताने आगे आए—पर अपने ही गुमान (अहं) में फँस गए। सार्वजनिक रूप से अपनी विद्या का प्रदर्शन करके वे स्वयं को कुरान का एकमात्र authoritative विद्वान सिद्ध करना चाहते रहे। और वे बताते हैं कि धर्म किस तरह दुनिया (दुनी) के लोभ से बदल दिया जाता है:

"दुनी बदले दीन खोवहीं, चलें सो उलटी रीत।

सुपने के सुख कारने, लोभें किए फजीत॥" (5)

वे दुनिया के बदले दीन (धर्म-सार) खो देते हैं और उलटी रीति पर चलते हैं। स्वप्न-सुखों के लिए लोभ करते-करते अंततः फजीहत (अपमान) पाते हैं। यह आलोचना विद्वत्ता का विरोध नहीं है। यह दोगलापन या पाखंड का विरोध है—जब सीखना प्रदर्शन बन जाए, और सत्ता नियंत्रण बन जाए।

 

4) सबसे खतरनाक भ्रम: हिंसा को "पुण्य/सवाब" मान लेना

पूरे प्रकरण में एक वाक्यांश बार-बार चेतावनी की तरह गूँजता है: "कहें हमें होत सवाब"अर्थात "वे मानते हैं कि इससे उन्हें सवाब/पुण्य मिलता है।"

 

महामति उस भयावहता को उजागर करते हैं जहाँ coercion (जबरदस्ती) आध्यात्मिकता का रूप ले लेती है: लोगों को अपने जीवन-पथ से जबरन हटाना (7–9), असहायों को अपमानित करना और उसे भक्ति-पुण्य कहना (8, 13–17), और यहाँ तक कि coerced conversions (जबरन धर्म-परिवर्तन) को "धार्मिक विजय" की तरह उत्सव बनाना (15–17)  वे प्रतिशोध के उस दुखद चक्र को भी दिखाते हैं—जहाँ identity (पहचान) spirit (आत्मा) की जगह ले लेती है, और हिंसा बढ़ती जाती है:                 

"हिंदू मसीतां ढहावहीं, मुसलमान सों बाद।

दें सोभा इस्ट दीन को, कहे हमें होत सवाब॥" (19)

"मुसलमानों की आक्रामकता के बाद, हिंदू भी मस्जिदें ढहाने लगते हैं और अपनी आराध्य-प्रतिष्ठा करते हैं—और दुखद यह कि वे मान लेते हैं कि प्रतिशोध भी पुण्य है।" फिर आता है और गहरा निदान:

"सुध इस्ट ना दीन की, मोह माते उनमाद।

ज्यों ज्यों बैर बढावहीं, कहें हमें होत सवाब॥" (20)

उन्हें न अपने इष्ट का सार पता है, न अपने दीन/धर्म की आत्मा। मोह-उन्माद में वे जैसे-जैसे बैर बढ़ाते हैं, वैसे-वैसे उसे ही पुण्य मानते जाते हैं। यह एक timeless spiritual psychology है: जब धर्म inner awakening (आंतरिक जागरण) खो देता है, वह rivalry, humiliation और revenge की मशीन बन जाता है।

 

महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण: सनंध 40 — चौपाई 19 और "प्रतिशोध-पुण्य" का जाल

यह चौपाई विशेष सावधानी और स्पष्टता मांगती है, क्योंकि यदि इसे भावुकता से पढ़ा जाए, तो इसका अर्थ विकृत हो सकता है।पी "हिंदू मसीतां ढहावहीं, मुसलमान सों बाद। दें सोभा इस्ट दीन को, कहे हमें होत सवाब॥" अर्थात "मुसलमानों की आक्रामकता के बाद, हिंदू भी मस्जिदें ढहाने लगते हैं और अपनी आराध्य-प्रतिष्ठा करते हैं—और दुखद यह कि वे मान लेते हैं कि प्रतिशोध भी पुण्य है।"

 

यह पंक्ति न तो संयोगवश है, न ही केवल अलंकारिक अतिशयोक्ति। जैसा कि उचित रूप से कहा गया हैयदि ऐसा घटित न हुआ होता तो महमति प्राणनाथ इसे यूँ नहीं कहते। इतिहास-रिकॉर्ड यह संकेत देता है कि कुछ समय-खंडों में—विशेषकर लंबे समय तक चले धार्मिक आक्रमण/उत्पीड़न के बाद—कुछ हिंदू समूहों द्वारा प्रतिशोधात्मक कार्रवाइयाँ हुईं, जिनमें मुस्लिम धार्मिक ढाँचों पर हमले भी शामिल रहे। ये घटनाएँ संदर्भ-विशिष्ट थीं, systematic (व्यवस्थित/नियमित) नहीं—पर वास्तविक थीं।

 

फिर भी, इस चौपाई का आध्यात्मिक अर्थ अक्सर चूक जाता है। महामति प्राणनाथ प्रतिशोध (बदले) को सही ठहराते नहीं हैं; वे उसके भ्रम को उजागर कर रहे हैं। निर्णायक वाक्यांश "कर्म" नहीं, "मान्यता" है: "कहें हमें होत सवाब"यानी वे मान लेते हैं कि इससे पुण्य मिलता है। यहीं चेतावनी है: जब प्रतिशोध को धर्म मान लिया जाता है, तब धर्म अपनी आत्मा खो देता है। उत्पीड़न से घायल पीड़ित, उसी तर्क को अपनाने लगता है जो शोषक का तर्क था। हिंसा का हाथ बदल जाता है—पर आध्यात्मिक भूल वही रहती है।

 

इसीलिए चौपाई आगे कहती है: "सुध इस्ट ना दीन की… ज्यों ज्यों बैर बढावहीं, कहें हमें होत सवाब॥" अर्थात वे न अपने इष्ट का सार जानते हैं, न अपने धर्म की आत्मा; मोह-उन्माद में जितना बैर बढ़ाते हैं, उतना उसे पुण्य मानते जाते हैं। उन का निदान अत्यंत सटीक और कठोर है: दमन शोषक को भ्रष्ट करता है, प्रतिशोध पीड़ित को भ्रष्ट करता है, और दोनों में से किसी को भी "धार्मिक पुण्य" कहना—धर्म की हत्या कर देता है। इसलिए सनंध 40 हिंदू-मुस्लिम "किसने ज्यादा किया" जैसी द्वंद्वात्मकता नहीं रचता; वह एक साझा आध्यात्मिक पतन को उजागर करता है—जहाँ आत्मा-विहीन धर्म पहचान-युद्ध का औज़ार बन जाता है। इसी कारण चौपाई 23 में हमे तुरंत पुनःकेंद्रित करते हैं: सच्चा पुण्य केवल उन्हीं को है जो सभी जीवों को एकत्व-दृष्टि से देखते हैं। चौपाई 19 हिंदू प्रतिशोध का औचित्य-स्थापन नहीं है; वह "जिससे लड़ रहे हो—वैसा बन जाने" के खतरे के विरुद्ध चेतावनी है।

 

संक्षिप्त में, महामति प्राणनाथ स्वीकार करते हैं कि उस वक्त प्रतिशोध हुआ—पर वे उसी क्षण की निंदा करते हैं जब प्रतिशोध को धर्म समझ लिया जाता है; वहीं धर्म वास्तव में मर जाता है।

 

5) महामति की "सफाई" हिंदुओं पर भी लागू होती है

महामति उन हिंदुओं को भी नहीं छोड़ते जो बाहरी कर्मकांड/चिह्नों (externalities) में फँस गए हैं। वे दिखाते हैं कि दाह-संस्कार, दफ़्न, तीर्थ, जारत/यात्रा जैसे बाह्य-चिह्न—यदि भीतर परिवर्तन न हो—तो आत्म-रूपांतरण का विकल्प बन जाते हैं:

 

"हिंदू मुए जलावहीं, और ए आए तिन गाड।

मिल तिन की जारत करें, कहें हमें होत सवाब॥" (10)

दोनों पक्ष बाह्य कर्म करते हैं और मान लेते हैं कि बाह्य रूप ही पुण्य दिला देगा।

 

फिर वे श्रेष्ठता-अहंकार को तोड़ने हेतु वे कहते हैं:

"ब्राह्मण कहे हम उतम, मुसलमान कहे हम पाक।

दोऊ मुठी एक ठौर की, एक राख दूजी खाक॥" (42)

एक पक्ष अपने को श्रेष्ठ कहता है, दूसरा अपने को पाक; पर दोनों की देह-चेतना एक ही स्रोत से आई है—अंततः एक राख बनती है, दूसरी खाक (मिट्टी)। यह "anti-Hindu" या "anti-Muslim" नहीं है; यह anti-ego और anti-tribal intoxication है।

 

6) सच्चे धर्म की सकारात्मक परिभाषा: करुणा और एकत्व

झूठे "सवाब/पुण्य" को उजागर करने के बाद, महमति सच्चे धर्म की कसौटी रखते हैं:

"पर सवाब तो तिन को होवहीं, छोटा सब जीउ।

एकै नजरों देखहीं, सब का खावंद पीउ॥" (23)

सच्चा पुण्य उन्हीं को है जो छोटे-बड़े सभी जीवों को एक-ही दृष्टि से देखें और सभी के स्वामी-प्रियतम को एक समझें।

 

फिर वे निर्णायक नैतिक मानदंड देते हैं:

"जो दुःख देवे किनको, सो नाहीं मुसलमान।

नबिएं मुसलमान का, नाम धरया मेहेरबान॥" (24)

जो किसी को दुःख देता है, वह मुसलमान नहीं; नबी ने मुसलमान का नाम "मेहरबान" (दयालु-करुणामय) रखा है। यही आध्यात्मिक हृदय है: जो धर्म क्रूरता पैदा करे, उसने अपना सार खो दिया है।

 

7) ऐतिहासिक ईमानदारी से पुनःकेंद्रण: नबी मुहम्मद का उदाहरण

आज के ध्रुवीकृत वातावरण में कई युवा selective clips, आरोप और वायरल कथाएँ देखते हैं जो नबी मुहम्मद को नैतिक रूप से संदिग्ध या स्वभावतः हिंसक बताती हैं। ये कथाएँ अक्सर ऐतिहासिक संदर्भ से कटकर फैलती हैं और भय, घृणा या "सभ्यतागत आतंक" (civilizational panic) को जायज़ ठहराने के लिए इस्तेमाल होती हैं। यहाँ स्पष्टता आवश्यक है।

 

एक सावधानीपूर्ण ऐतिहासिक अध्ययन—जिसे मुस्लिम और गैर-मुस्लिम विद्वानों ने व्यापक रूप से स्वीकार किया है—यह दिखाता है कि नबी मुहम्मद ने अपने जीवन का बड़ा भाग खदीजा के साथ लगभग 25 वर्षों तक एक-पत्नी-व्रत (monogamy) में बिताया; उनकी बाद की शादियाँ प्रायः 50 वर्ष के बाद हुईं, जिनमें अधिकांश विधवाएँ और असहाय-संवेदनशील स्त्रियाँ थीं; ये विवाह उस समय की सामाजिक व्यवस्था में सार्वजनिक, वैध और सामान्य थे; किसी प्रकार के गुप्त, शोषणकारी या अनैतिक संबंध का कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिलता; और यह भी कि उनके कठोरतम समकालीन विरोधियों ने भी उन पर यौन-दुराचार का आरोप नहीं लगाया—यह तथ्य आधुनिक हमलों में अक्सर भुला दिया जाता है।

 

यह बात आज के युवाओं के लिए इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह एक "धार्मिक निष्कर्ष" नहीं, बल्कि सोचने की विधि सिखाती है—जिसे महामति प्राणनाथ समर्थन करते। सनंध 40 बार-बार अहंकार-रूप authority के विरुद्ध चेतावनी देता है: "पढे मुल्लां… खाए गुमान" (4) और "दुनी बदले दीन खोवहीं" (5)। इसी भाव में महमति युवाओं को सावधान करते: viral certainty को सत्य न मानो; outrage को inquiry का स्थान न लेने दो; propaganda को perspective का विकल्प न बनने दो।

 

महामति प्राणनाथ हमसे यह नहीं कहते कि नबियों का अंध-समर्थन करो; और यह भी नहीं कहते कि उन्हें लापरवाही से दोषी ठहराते रहो। वे विवेक मांगते हैं। गंभीर आरोपों के लिए ऐतिहासिक संदर्भ, अनुपात-बोध और आंतरिक संयम आवश्यक है।

 

जब युवा-मन 7वीं शताब्दी के व्यक्तित्व को 21वीं शताब्दी के चश्मे से, बिना संदर्भ और ईमानदारी के, आँकना सीख जाता है—तो विवेक ढह जाता है और उसकी जगह सत्य नहीं, वैचारिक नशा (ideological intoxication) आ जाती है।

 

महामति सनंध में इसी रोग को उजागर करते हैं— जब अनुभूति की जगह सत्ता, जाँच-पड़ताल की जगह आरोप, और जागरण की जगह क्रोध आ जाता है।

 

8) आज के हिंदू-मुस्लिम तनाव में इसका अर्थ

(घृणा के बिना सुरक्षाभोलेपन के बिना स्पष्टता)

आज कई हिंदू युवा यह डर रखते हैं कि इस्लाम भारत के सामाजिक ताने-बाने को मूलतः खतरा है, मुसलमान समान रूप से शत्रुतापूर्ण हैं, और ऐतिहासिक पीड़ाएँ वर्तमान संदेह को उचित ठहराती हैं। महामति प्राणनाथ इस भ्रम को अत्यंत सटीकता से काटते हैं: वे coercion और violence की निंदा बिना किसी अपवाद के करते हैं (7–22); forced conversion की निंदा बिना किसी अस्पष्टता के करते हैं (8–17); retaliatory destruction की भी निंदा करते हैं (19–21); और साथ ही collective demonization (समूह-स्तरीय दानवीकरण) को अस्वीकार करते हैं। वे कहते हैं कि सच्चा पुण्य एकत्व और करुणा है (23–24)। वे स्मरण कराते हैं कि जब धर्म आत्मा से रिक्त हो जाता है, वह अत्याचारी पैदा करता है—चाहे वह किसी भी शास्त्र का उद्धरण दे।

 

इसलिए सुरक्षा कानून, न्याय और संस्थाओं की मजबूती से सुनिश्चित होनी चाहिए—मिथक-निर्माण, अफ़वाहों, और सामूहिक आरोप से नहीं।

 

9) युवाओं के लिए सीख

(आज के समय की व्यावहारिक नैतिक दिशा-सूची)

युवाओं के लिए संदेश स्पष्ट है: बिना जाँच-परख घृणा विरासत में मत लो; उग्रवाद की आलोचना को लोगों से घृणा में मत बदलो; viral outrage को wisdom मत समझो; identity defense के नाम पर विवेक मत छोड़ो; और महमति की अंतिम कसौटी याद रखो कि सच्चा "सवाब" करुणा और एकत्व है (23–24)। वास्तव में महमति चेतावनी देते हैं कि delusion (मोह-उन्माद) में डूबे लोग बैर बढ़ाते-बढ़ाते उसे पुण्य कहने लगते हैं: "ज्यों ज्यों बैर बढावहीं, कहें हमें होत सवाब॥" (20) — यही वह फंदा है जिससे युवाओं को बाहर निकलना है।

 

समापन चिंतन: धर्म का वास्तविक उद्देश्य

सनंध अध्याय 40 किसी धर्म पर हमला नहीं है; वह आत्मा-विहीन धर्म का अनावरण है—इसीलिए वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। धार्मिक ध्रुवीकरण के युग में महमति प्राणनाथ स्मरण कराते हैं कि धर्म का उद्देश्य मानवता को बाँटना नहीं, बल्कि उसे जगाना है। किसी परंपरा का मूल्यांकन उसके सबसे ऊँचे आध्यात्मिक फल से होता है—स्पष्टता, करुणा, संयम, और आंतरिक रूपांतरणन कि उन चरमपंथियों से जो उसे विकृत करके इस्तेमाल करते हैं।

 

समापन पंक्ति: "धर्म उच्च चिंतन की माँग करता है, निम्न प्रवृत्तियों की नहीं। जहाँ भय राज करता है, वहाँ आत्मा पहले ही जा चुकी होती है।"

 

सदा आनंद मंगल में रहिए

 

नरेंद्र पटेल,

श्री प्राणनाथ वैश्विक चेतना अभियान

श्री निजानंद आश्रम वडोदरा

लार्ड प्राणनाथ डिवाईन सेंटर, मैकॉन, जॉर्जिया

Macon "Where soul lives"

 

आज फ़रवरी ५, २०२६ मेरे सतगुरु धर्मवीर जागनी रत्न सरकार श्री जगदीश चंद्र के १०१ वें प्रगटन दिन पर अर्पण है।


Comments

Popular posts from this blog

On Integrity : Tartam Vani

આધ્યાત્મિક અનુભવોના મુખ્ય પ્રકારો

Super Integral Love of Brahmn Srishti Sundersath