हमें कसाला देने वाले को आखिर हम कैसे चाहें?

हमें कसाला देने वाले को आखिर हम कैसे चाहें?

यह तारतम वाणी की साधना का अत्यंत व्यावहारिक प्रश्न है कि सामान्यतः जब कोई हमें कष्ट देता है, अपमान करता है या धोखा देता है, तो मन की स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है—क्रोध, द्वेष, प्रतिशोध या दूरी। परन्तु तारतम वाणी प्रेम का जो मार्ग बताती है, वह इन प्रतिक्रियाओं को दबाने का नहीं, बल्कि उन्हें रूपांतरित करने का मार्ग है।

“कोई देत कसाला तुम को, तुम भला चाहियो तिन।

सरत धाम की न छोड़ियों, सुरत पीछे फिराओ जिन ।।

अर्थ: यदि कोई तुम्हें कष्ट दे, कटु व्यवहार करे या तुम्हारे लिए परेशानी पैदा करे, तब भी उसके लिए बुरा न चाहो; उसके मंगल की ही कामना करो। किसी दूसरे के व्यवहार के कारण धाम की सुध और अपने मूल सम्बन्ध का निश्चय मत छोड़ो, और अपनी सुरता को पीछे—द्वेष, प्रतिक्रिया, बदला या उसी व्यक्ति के व्यवहार में—मत उलझने दो।

यहाँ “सरत धाम की” का भाव धाम की सुध, स्मृति और अपने मूल धाम-सम्बन्ध की जागरूकता से है; और “सुरत पीछे फिराओ जिन” का सुंदर व्यावहारिक संकेत है—जिसने तुम्हें दुःख दिया, अपनी चेतना को बार-बार उसी के पीछे मत भेजते रहो। सुरता को प्रियतम की ओर रखो। जो तुम्हें दुःख दे, उसका भी भला चाहो; उसके व्यवहार को अपनी चितवनी का केंद्र मत बनने दो। धाम की सुध न छोड़ो और सुरता को प्रियतम से विमुख न होने दो।

इस बात पर अमल करने की व्यावहारिक कमी को तारतम वाणी का उपाय पाँच चरणों में समझा जा सकता है:

१. पहले अपने चित्त को देखें, दूसरे के दोष को नहीं: यदि किसी ने हमें कसाला (दुःख) दिया, तो सबसे पहले यह देखें कि मेरे भीतर क्या चल रहा है—क्रोध, चोट, अहंकार, अपेक्षा या असुरक्षा? चितवनी का पहला लक्ष्य दूसरे को बदलना नहीं, अपने चित्त को पहचानना है। चित्त कैसो भयो?” — यह प्रश्न उसने ऐसा क्यों किया?” से अधिक महत्वपूर्ण है।

२. प्रत्येक जीव अपनी चेतना के स्तर से व्यवहार करता है: तारतम वाणी जीव को दोष देने के स्थान पर उसकी अज्ञानावस्था को देखने की दृष्टि देती है। जिसके भीतर अंधकार है, वह प्रकाश कैसे बाँटेगा? जैसे बीमार व्यक्ति कभी-कभी कटु बोलता है, वैसे ही अज्ञान से पीड़ित व्यक्ति भी दूसरों को पीड़ा देता है। इस दृष्टि से व्यक्ति शत्रु नहीं रह जाता; वह जागृति का अभिलाषी जीव दिखाई देने लगता है।

३. अपने मूल स्वरूप का स्मरण करें: यदि मैं केवल शरीर और अहंकार हूँ, तो अपमान असहनीय लगेगा। पर यदि मैं आत्मा हूँ, प्रियतम की सुहागिन हूँ, तो कोई भी घटना मेरे वास्तविक स्वरूप को छू नहीं सकती। इसलिए तारतम वाणी बार-बार स्मृति जगाती है—मैं कौन हूँ?” यह स्मरण प्रतिक्रिया की आग को शांत करता है।

४. प्रेम का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना नहीं: यह बहुत आवश्यक भेद है। तारतम वाणी कहीं भी अन्याय का समर्थन नहीं करती। यदि किसी का व्यवहार अनुचित है, तो उसे स्पष्ट, मर्यादित और सत्यपूर्ण ढंग से रोका जा सकता है। किन्तु भीतर द्वेष न रखा जाए। अर्थात्—व्यवहार में विवेक, हृदय में करुणा। क्षमा का अर्थ यह नहीं कि हम गलत आचरण को सही मान लें; इसका अर्थ है कि हम स्वयं द्वेष के बंधन में न रहें।

५. चितवनी: व्यक्ति से ऊपर उठकर प्रियतम को देखना: चितवनी की सर्वोच्च अवस्था यह है कि हर परिस्थिति को प्रियतम की दृष्टि से देखना प्रारम्भ करें। अपने आप से पूछें—यह घटना मुझे क्या सिखा रही है? मेरे भीतर कौन-सा संस्कार सामने आया? यदि श्री राज जी मेरे स्थान पर होते, तो वे कैसी दृष्टि रखते? यहीं से प्रतिक्रिया प्रेम में बदलने लगती है।

एक सरल दृष्टांत

यदि कोई बच्चा क्रोध में अपनी माँ को मार देता है, तो माँ को चोट अवश्य लगती है, पर वह बच्चे से घृणा नहीं करने लगती। क्यों? क्योंकि माँ बच्चे के व्यवहार से अधिक उसके भीतर की अपरिपक्वता को देखती है। तारतम वाणी हमें समस्त जीवों के प्रति ऐसी ही परिपक्व दृष्टि विकसित करने का निमंत्रण देती है।

चितवनी का अभ्यास

जब भी कोई हमें कसाला दे, तुरंत प्रतिक्रिया देने से पहले कुछ क्षण रुककर यह आंतरिक संवाद करें—प्रियतम, इस समय मेरा चित्त विचलित है। मुझे दूसरे का दोष नहीं, अपना चित्त दिखाइए। मुझे मेरे मूल स्वरूप की याद दिलाइए। मैं सत्य और मर्यादा रखूँ, पर हृदय में द्वेष न रखूँ। मुझे ऐसा प्रेम दीजिए जो अज्ञान को देखे, व्यक्ति से घृणा न करे।”

मुख्य बोध

तारतम वाणी का प्रेम भावुकता नहीं है। यह स्मृति पर आधारित प्रेम है। स्मृति हो तो करुणा जन्म लेती है। करुणा हो तो क्षमा सहज होती है। क्षमा हो तो चित्त निर्मल होता है। और निर्मल चित्त में ही प्रियतम की चितवनी स्थिर होती है। इसलिए तारतम वाणी का संदेश केवल शत्रु से प्रेम करो” नहीं है, बल्कि उससे भी गहरा है—पहले अपने चित्त को प्रियतम में स्थिर करो; तब तुम्हारा प्रेम किसी के व्यवहार पर निर्भर नहीं रहेगा।”

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टेम्पा, 9/11/26


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