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“चरित्र देव"—एक ऐतिहासिक उपन्यास, जो स्वामी श्री प्राणनाथ जी, शक्तिपुत्र महाराजा छत्रसाल बुंदेला और अप्रतिम सुंदरी पद्मा के जीवन पर आधारित

श्री प्राणनाथ वैश्विक चेतना अभियान   और   श्री निजानंद आश्रम ,  वडोदरा   गर्वपूर्वक प्रस्तुत कर रहे हैं— " चरित्र देव" — एक ऐतिहासिक उपन्यास ,  जो स्वामी श्री प्राणनाथ जी ,  शक्तिपुत्र महाराजा छत्रसाल बुंदेला और अप्रतिम सुंदरी पद्मा के जीवन पर आधारित है। यह उपन्यास प्रेम और समर्पण की गाथा के साथ आपके समक्ष आ रहा है। इसके सभी पात्र ऐतिहासिक हैं ,  किंतु उनकी कहानी में कल्पना की कुछ सुंदर दस्तकारी अवश्य है। उपन्यास केवल इतिहास नहीं है—यह कल्पना की कोमल बुनावट के साथ जीवन के अनछुए पहलुओं को उजागर करता है। इतिहास घटनाओं का मात्र उल्लेख करता है ,  लेकिन उपन्यास उन्हें चित्रित कर जीवंत बना देता है। इस कथा की प्रमुख नायिका   पद्मा ,  अनुपम सौंदर्य की धनी युवती थी ,  जिसे पन्ना के   महाराजा छत्रसाल   ने मुगलों के बंधन से मुक्त कराया था। पद्मा अद्भुत रूपवती थी ,  किंतु युवक   छत्रसाल   ने उसे कामुक दृष्टि से नहीं ,  बल्कि   मातृभाव से देखा — यह नियति का अनूठा रहस्य ही रहा।   परंतु पद्मा ,  महाराज ...

*પરમધામ એટલે શું?*

*પરમધામ એટલે શું?* આત્મ સંબંધી શ્રી સુંદરસાથ જી, ચાલો પરમધામનો અર્થ સમજીએ. પરમધામ એ સર્વોચ્ચ સ્તરના સચ્ચિદાનંદ અક્ષરાતીતનું દિવ્ય ક્ષેત્ર છે. પરમધામ એટલે જ્યાં અસ્તિત્વ, પ્રેમભર્યું ચેતન અને આનંદ અક્ષરાતીત સ્તરની પરમ શુદ્ધતા સાથે સતત આનંદમય પ્રેમલીલામાં મગ્ન રહે છે. પરમધામ એ સર્વ રીતે પરિપૂર્ણ ક્ષણ-પ્રતિક્ષણ પ્રેમની જાગ્રતિનું સામ્રાજ્ય છે, જ્યાં ક્ષણનું પણ અસ્તિત્વ નથી.  હવે, બીજી રીતે સમજીએ તો પરમધામ સચ્ચિદાનંદ પરબ્રહ્મનું સર્વોચ્ચ ધામ છે. જેવી રીતે અનંત મહાસાગરમાં અસંખ્ય તરંગો લહેરાતી હોય છે, તેમ પરમાત્મા અનંત સત્વોથી અર્થાત્ રસીલા અર્કો (એસેન્સ)થી યુક્ત રહી સંપૂર્ણ પરમધામને આનંદિત રાખે છે, આ સત્વો (બ્રહ્માત્માઓ, ખૂબ ખુશાલીઓ, પશુ પક્ષીઓ. પચીસ પક્ષ આદિ) પરમાત્માના સ્વરૂપના જીવંત પ્રતિબિંબ છે. મહામતિ જી પરબ્રહ્મના હૃદયરૂપી આયના પર ઝીલાતા આ પ્રતિબિંબોની સમગ્ર શોભાને પરમધામ કહેતા હોય એમ શ્રી મુખ વાણીના ચિંતન દ્વારા સમજાય છે. સત્વોના દ્રષ્ટિકોણથી, પરમધામમાં કોઈ વિભાજન અથવા વિભિન્નતા નથી. માત્ર સ્પષ્ટ બહુવિધતા વચ્ચે પણ એક સરળ, અખંડ એકતા છે, જે સમયના પ્રવાહથી અસ્પર્શિત રહે છે.  કે...

The Sharpness of Truth and the World’s Intolerance Toward It

"The Sharpness of Truth and the World's Intolerance Toward It" Original Verses from   Tartam Vani : Kirantan 125/41 "Jhazhun kahe dukh sahune laage, sat vachan na sahevay। Sat sahue uthapiyun, asat brahmand na samay।।" When a piercing truth is spoken, it feels painful — people cannot bear it. What was once true has been buried and reversed by the world, while falsehood has spread so vastly that even the cosmos cannot contain it. The world hides the truth for comfort, while untruth expands so wildly that it overwhelms everything, pressing heavily on the very universe. Kirantan 128/5 "Saanchu kahe dukh laagse, saanchu te kehene na suhaay। Pragat kahiye mohonth upar, tyaare dohela te sahune thaay।।" Truth, when spoken, causes pain — it doesn't please the mind. If it's spoken openly to someone's face, it wounds their attachment and ego — and thus feels harsh to all. People prefer sweet illusions. When someone holds u...

“सत्य वचन” की तीव्रता और उसके प्रति संसार की असहिष्णुता

"सत्य वचन" की तीव्रता और उसके प्रति संसार की असहिष्णुता  झाझुं कहे दुख सहुने लागे, सत वचन ना सेहेवाय।  सत सहुए उथापियूं, असत ब्रह्मांड न समाय।। किरंतन १२५/४१ सांचु कहे दुख लागसे, सांचु ते केहेने न सुहाय। प्रगट कहिए मोंहों ऊपर, त्यारे दोहेला ते सहुने थाय।। किरंतन १२८/५ 🌿 किरंतन १२५/४१ "झाझुं कहे दुख सहुने लागे, सत वचन ना सेहेवाय। सत सहुए उथापियूं, असत ब्रह्मांड न समाय।।" भावार्थ (संशोधित): जब कोई तीखा और असहज सत्य बोला जाता है, तो लोगों को वह दुःखद लगता है — वे उसे सह नहीं पाते। जो सत्य कभी स्पष्ट और उजागर था, उसे ही लोगों ने उल्टा करके ढँक दिया, ताकि उनकी सुविधा और भ्रम बने रहें। दूसरी ओर, झूठ इतना फैल चुका है, इतना गाढ़ा हो गया है, कि वह ब्रह्मांड में भी समा नहीं पा रहा — वह हर दिशा में उफन रहा है। संदेश: यह संसार सत्य से भागता है और झूठ को इतना बढ़ा देता है कि वह अब स्वयं उसके बोझ से दब रहा है। सत्य को तो लोग छुपाते हैं, लेकिन असत्य का ऐसा विस्तार हो गया है कि अब वह सब कुछ निगलने को तत्पर है। ⸻ 🌿 किरंतन १२८/५ "सांचु कहे दुख लागसे, सांचु ते केहेने न सुहाय। प...

ए बोहोत झूठे क्यों होई

मैं कहूं दुनियां भई बावरी,  ओ कहे बावरा मोही।  अब एक मेरे कहे कौन पतीजे,  ए बोहोत झूठे क्यों होई।। Moral in English, Gujarati, Hindi, and Nepali:  "Hallucinations become reality when experienced by many."  જ્યારે ઘણા લોકો ભ્રમનો અનુભવ કરે છે ત્યારે તે વાસ્તવિકતા બની જાય છે. जब बहुत से लोग एक ही भ्रांति का अनुभव करते हैं, तो वह वास्तविकता बन जाती है। जब धेरै मानिसहरूले एउटै भ्रम अनुभव गर्छन्, त्यो नै यथार्थ बन्न पुग्छ। Sada Anand Mangal Mein Rahiye

🎶 “परब्रह्म की लीला दो” 🎶 (तारतम ज्ञान पर आधारित)

🎶 "परब्रह्म की लीला दो" 🎶 (तारतम ज्ञान पर आधारित) (1) परब्रह्म एक, लीलाएँ दो, रस का सागर, रूप न खो। एक में सृष्टि, एक में ध्यान, प्रेम में बहे, ज्ञान में जान॥ (2) अक्षर रचता जगत विशाल, प्रकृति के संग लीला चाल। छाया-सी रस की बू झलके, दुख-सुख के रंगों में ढलके॥ (3) अक्षरातीत, परे माया, निवृत्ति लीला, पूर्ण छाया। जहाँ न कर्ता, न कोई जाल, केवल प्रेमरस की धार॥ (4) बाल रूप में रचे ब्रह्माण्ड, किशोर रूप में प्रेम का छंद। वृद्ध लीला शून्य बनी, युवा स्वरूप रस में रमी॥ (5) ज्ञान में वे स्वयं मगन, प्रेम में आत्मा से मिलन। जब मधु बने वे रसराज, भक्त बनें उनकी आवाज़॥ (6) रस स्वयं को न जान सके, रसिक आत्मा में प्रकट झलके। मक्खी जाने मधु का मोल, प्रेम से खुलता है सब पोल॥ (7) स्वप्न जगत में रूप अधूरा, धाम में होता रस पूरा। यह दृश्य जग केवल प्रतिच्छाया, सच्चा रस है निज धाम माया॥ (8) एको ब्रह्म, न दूजा कोय, पर लीलाओं में भेद संजोय। ज्ञान-प्रेम का संगम रूप, परब्रह्म की यह रस-प्रतिभूति॥ सप्रेम प्रणाम जी  सदा आनंद मंगल में रहिए