तारतम वाणी में प्रयुक्त 'धुतार' और 'छल' आदि शब्दों के समग्र अर्थ का विवेचन: माया , देह , बुद्धि , प्रपंच और आत्म-जागृति के संदर्भ में सारांश तारतम वाणी में प्रयुक्त "धुतार" , " धुतारी" , " छल" , " छलिया" , " प्रपंच" , " मोह" और "माया" जैसे शब्द सामान्य नैतिक धोखे का संकेत नहीं करते , बल्कि चेतना की उस गहरी विस्मृति को व्यक्त करते हैं जिसमें जीव अपने वास्तविक स्वरूप , अपने मूल घर और परम संबंध की पहचान खो देता है। इस भूल के कारण मनुष्य अस्थायी को स्थायी , देह को आत्मा और क्षणिक अनुभवों को परम आनंद समझ बैठता है। यही स्थिति माया का छल कहलाती है। यह भ्रम केवल मानसिक स्तर तक सीमित नहीं रहता ; यह देह , इन्द्रिय , विचार , सांस्कृतिक धारणाओं , धार्मिक पंथों और सामाजिक संरचनाओं में भी विभिन्न रूपों में कार्य करता है। परिणामस्वरूप संसार एक आकर्षक किंतु उलझाने वाला तंत्र बन जाता है जिसमें चेतना अपने मूल स्रोत से दूर भटकती रहती है। " धुतार" शब्द की विशेषता यह ह...
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