“पार” और “परे” — नाम को छोड़ना नहीं, उसकी सीमा को जानना
“पार” और “परे” — नाम को छोड़ना नहीं, उसकी सीमा को जानना
तारतम वाणी में बार-बार आने वाले “पार”, “परे” और “पार के भी पार” जैसे शब्द केवल स्थानगत दूरी का संकेत नहीं देते। साधना की दृष्टि से वे चेतना को किसी एक दिखाई देने वाले स्तर, धारणा, नाम, रूप अथवा मानसिक निष्कर्ष को अंतिम सत्य मानकर वहीं रुक न जाने का आमंत्रण भी देते हैं।
वाणी कहती है—
निराकार के पार के पार, तारतम को जागनी भयो सार।
अछर पार घर अछरातीत, धाम के यामें सब चरित्र।।
और—
हद के पार बेहद है, बेहद पर अछर।
अछर पार वतन है, जागिए इन घर।।
यहाँ “पार” का अर्थ पीछे छोड़कर अस्वीकार कर देना नहीं है। जिस स्तर से हम आगे बढ़े, उसकी सत्यता और उपयोगिता अपने स्थान पर बनी रह सकती है; पर हम उसे सम्पूर्ण सत्य समझकर उसमें कैद नहीं होते। इसी अर्थ में “पार होना” केवल transcend करना नहीं, बल्कि transcend and include—अतिक्रमण करते हुए समाहित करना है।
एक सीढ़ी का अगला पायदान पिछले पायदान को झूठा नहीं बनाता। वह उसे अपने भीतर लेकर आगे बढ़ता है। उसी प्रकार रूप से पार जाने का अर्थ रूप का निषेध नहीं; नाम से पार जाने का अर्थ नाम छोड़ना नहीं; और विचार से पार जाने का अर्थ विचारहीन होना नहीं। अर्थ यह है कि जिसने हमें आगे जाने का संकेत दिया, उसी संकेत को मंज़िल न समझ लें।
यही बात “नाम से परे” को समझने में विशेष महत्वपूर्ण है।
नाम आवश्यक है। बिना नाम के संवाद, स्मरण और भक्ति कठिन हो सकते हैं। हम कहते हैं—“श्री कृष्ण”, “श्री राज जी”, “श्री जी साहेब जी”, “धनी”, “प्राणनाथ”। प्रत्येक नाम किसी विशेष स्तर पर अर्थपूर्ण संकेत है। समस्या नाम में नहीं है; समस्या तब उत्पन्न होती है जब संकेत को ही संपूर्ण संकेतित सत्य मान लिया जाता है।
नाम एक label—पहचान-सूचक है। वह हमें दिशा देता है, पर जिस वास्तविकता की ओर संकेत करता है, वह उस शब्द से कहीं बड़ी है।
इसे एक सरल उदाहरण से समझें। सूर्य की किरणें जब वातावरण के कणों, जल-बिंदुओं या किसी सतह से संपर्क करती हैं, तब प्रकाश हमें किसी विशेष रंग, चमक या आकृति में दिखाई देता है। दिखाई देने वाली अभिव्यक्ति वास्तविक है, लेकिन वह सूर्य की सम्पूर्णता नहीं है। उसी प्रकार चेतना जब जगत, इतिहास, व्यक्तित्व, भाषा और संस्कृति के माध्यम से व्यक्त होती है, तब वह नाम और रूप ग्रहण करती दिखाई देती है। नाम और रूप उस प्राकट्य को पहचानने में सहायता करते हैं; किंतु वे उसके परम रहस्य को समाप्त नहीं कर देते।
मन की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है—जैसे ही उसने किसी अनुभव को नाम दिया, उसे लगता है कि उसने उसे जान लिया। फूल को “गुलाब” कह दिया और मन को लगता है कि बात पूरी हो गई। आकाश को “आकाश”, चेतना को “चेतना”, परम सत्य को किसी प्रिय नाम से पुकार दिया—और नाम धीरे-धीरे जीवंत रहस्य का स्थान लेने लगता है।
पर नाम जान लेना और वास्तविकता को जान लेना एक बात नहीं है।
यहीं तारतम साधना हमें फिर “पार” जाने के लिए कहती है—शब्द के पार उसके अर्थ में, अर्थ के पार अनुभव में, अनुभव के पार संबंध में, और संबंध के भीतर उस जीवंत रहस्य में जिसे केवल बौद्धिक परिभाषा में पूरी तरह बाँधा नहीं जा सकता।
Transcend and Include का व्यावहारिक अर्थ
इस सिद्धांत को सुन्दरसाथ के वर्तमान प्रश्न पर लागू करें। यदि कोई साधक “श्री कृष्ण जी” में अपने अक्षरातीत प्रियतम का अनुभव करता है, तो अगली समझ उसे यह कहकर उस नाम को त्यागने के लिए बाध्य नहीं करती कि अब “श्री कृष्ण” पीछे छूट गए। बल्कि वह पूछती है—इस नाम ने तुम्हारे भीतर किस स्वरूप को जगाया? वह स्वरूप किस नूर, जोश या आवेश की अभिव्यक्ति है? उसका मूल संबंध कहाँ है?
इसी प्रकार “श्री राज जी” की पहचान प्राप्त होना भी केवल एक पुराने label के स्थान पर नया label लगा लेना नहीं होना चाहिए। यदि “श्री कृष्ण” को लेकर हमारी चेतना संकीर्ण हो सकती है, तो “श्री राज जी” शब्द को पकड़कर भी वही संकीर्णता संभव है। नाम बदल गया, लेकिन यदि पकड़ नहीं बदली, तो चेतना वास्तव में पार नहीं हुई।
इसलिए वास्तविक यात्रा यह नहीं—
श्री कृष्ण → छोड़ दिए → श्री राज जी पकड़ लिए।
बल्कि—
नाम → अर्थ → स्वरूप → नूर/आवेश → निस्बत → मूल → प्रत्यक्ष आत्मिक अनुभूति
यही transcend and include का व्यावहारिक रूप है: पहले स्तर की सच्चाई को नष्ट किए बिना उसकी सीमा पहचानना, उसके सार को साथ लेकर व्यापक स्तर में प्रवेश करना।
इस दृष्टि से हम कह सकते हैं—
व्रज को छोड़कर रास नहीं; व्रज को समाहित करते हुए रास।
रास को नकारकर जागनी नहीं; रास के प्रेम को समाहित करते हुए जागनी।
नाम को मिटाकर स्वरूप नहीं; नाम के संकेत को समझते हुए स्वरूप।
स्वरूप को नकारकर अक्षरातीत नहीं; स्वरूप के मूल-संबंध को पहचानते हुए अक्षरातीत।
और शायद “पार” का सबसे व्यावहारिक अर्थ यही है—जहाँ तक वर्तमान समझ हमें पहुँचा चुकी है, उसका शुक्राना करें; पर उसे अंतिम सीमा बनाकर वहीं न बैठ जाएँ।
नाम से परे—पर नाम को साथ लेकर
अब Beyond the Names का अर्थ और स्पष्ट हो जाता है। इसका अर्थ against the names नहीं है। इसका अर्थ है—through the names, beyond the names, into the relationship.
नाम से परे जाना नाम-विहीन हो जाना नहीं है। इसका अर्थ है यह जानना कि नाम एक द्वार है, घर नहीं; मानचित्र है, भूमि नहीं; संकेत है, स्वयं सत्य की सम्पूर्णता नहीं।
इसीलिए दो साधक अलग-अलग प्रिय नामों का उच्चारण करते हुए भी उसी मूल संबंध की ओर जाग सकते हैं। और दो साधक एक ही नाम बोलते हुए भी भीतर से बहुत अलग स्तरों पर हो सकते हैं। केवल उच्चारित शब्द अंतिम कसौटी नहीं हो सकता।
अंततः तारतम हमें बाहरी label से inner realization—आंतरिक अनुभूति की ओर बुलाता है।
और तब लेख का मूल सूत्र और गहरा हो जाता है—
नाम → रूप → नूर/आवेश → निस्बत → अनुभव → मूल
फिर वहाँ पहुँचकर नाम समाप्त नहीं होता—नाम प्रेम में पुनः लौट आता है। अब “श्री कृष्ण”, “श्री राज जी”, “धनी” या “प्राणनाथ” केवल दार्शनिक label नहीं रहता; वह जीवंत संबंध का प्रेमपूर्ण संबोधन बन जाता है।
यही शायद “पार” की सुंदर विडम्बना है—हम नाम के पार जाते हैं और फिर उसी नाम में लौटते हैं, पर अब हमारी पकड़ बदल चुकी होती है। पहले हम सोचते थे कि नाम ही सत्य है; अब जानते हैं कि नाम सत्य की ओर खुलने वाला प्रेम-द्वार है।
इसलिए Beyond the Names की यात्रा नाम से दूर नहीं ले जाती—वह नाम की गहराई में ले जाती है:
नाम से स्वरूप,
स्वरूप से नूर,
नूर से निस्बत,
निस्बत से इश्क़,
इश्क़ से अनुभूति,
और अनुभूति से उस मूल की ओर—
जो प्रत्येक नाम को अर्थ देता है,
पर किसी एक नाम में सीमित नहीं हो जाता।
और तब आरम्भ की चौपाई केवल सामाजिक सद्भाव का संदेश नहीं रहती; वह चेतना की पूरी यात्रा का सूत्र बन जाती है—
जुदे जुदे नामें गावहीं, जुदे जुदे भेष अनेक।
जिन कोई झगड़ो आप में, धनी सबों का एक।।
नाम अलग हो सकते हैं। भेष अलग हो सकते हैं। प्राकट्य और भूमिकाएँ भी अलग हो सकती हैं। तारतम्य उन भेदों को मिटाता नहीं—उनके पार जाकर उनका मूल संबंध दिखाता है। यही “नाम से परे” जाने का अर्थ है, और यही transcend and include का जीवंत, व्यावहारिक रूप है।
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