सनातन क्या है? (दूसरी आवृत्ति)
‘सत्’, ‘सत्य’ और शाश्वतता
आज “सनातन” शब्द का प्रयोग बहुत व्यापक अर्थों में होता है। कभी इसे भारतीय धार्मिक परंपरा के अर्थ में लिया जाता है, कभी वैदिक संस्कृति के पर्याय के रूप में और कभी सीधे “परम सत्य” के अर्थ में।
इस संबंध में जिज्ञासुओं एवं सुन्दरसाथ के मन में विभिन्न प्रश्न उठते हैं और इसकी चर्चा भी बार-बार होती रहती है। अतः यहाँ किसी मत का खंडन या समर्थन करने के बजाय, ‘सत्’, ‘सत्य’ और ‘सनातन’ के अर्थ को तारतम दृष्टि से समझने और स्पष्ट करने का एक छोटा-सा प्रयास है।
मूल प्रश्न यह है कि सनातन वास्तव में क्या है—कोई प्राचीन परंपरा, कोई ग्रंथ, उसमें व्यक्त ज्ञान, अथवा वह नित्य ‘सत्’ जिसकी ओर ये सभी संकेत करते हैं?
सनातन — केवल प्राचीन नहीं, नित्य
“सनातन” का सामान्य अर्थ है—नित्य, शाश्वत, चिरस्थायी और अनादि से विद्यमान। केवल बहुत पुराना होना और सनातन होना एक ही बात नहीं है। कोई परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही हो सकती है और इस अर्थ में अत्यंत प्राचीन हो सकती है; पर आध्यात्मिक अर्थ में “सनातन” उस वास्तविकता की ओर संकेत करता है जिसकी मूल सत्ता काल, स्थान और परिस्थितियों के परिवर्तन पर निर्भर नहीं है।
इसलिए सनातन की वास्तविक कसौटी केवल यह नहीं कि कोई विचार कितना पुराना है, बल्कि यह है कि उसमें ऐसा क्या है जो काल और सृष्टि के परिवर्तन के पार भी अपनी मूल सत्ता नहीं खोता।
‘सत्’ — जो वास्तव में है
‘सत्’ का मूल अर्थ है—जो वास्तव में है, जिसकी वास्तविक सत्ता है। इसलिए सत् केवल किसी मत, मान्यता अथवा सही कथन का नाम नहीं; वह स्वयं वास्तविकता की ओर संकेत करता है।
हमारे चारों ओर संसार निरंतर बदल रहा है। शरीर बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, विचार और संस्कृतियाँ बदलती हैं और हमारी समझ भी बदलती रहती है। आध्यात्मिक खोज इस परिवर्तनशीलता के बीच उस आधार की खोज है जो केवल हमारी कल्पना अथवा मान्यता पर निर्भर नहीं है।
यहीं ‘सत्’, ‘सत्य’ और ‘सनातन’ का संबंध समझ में आता है—
सत् — जो वास्तव में है।
सत्य — उस सत् का यथार्थ बोध, अनुभव और प्रकाशन।
सनातन — उस सत् की नित्य, अविनाशी और कालातीत सत्ता।
हमारा सत्य-बोध विकसित हो सकता है, परंतु सत् हमारी समझ के अनुसार बनता-बिगड़ता नहीं।
तारतम वाणी में ‘सत्’ — परमधाम की जीवंत वास्तविकता
तारतम वाणी में ‘सत्’ केवल एक अमूर्त दार्शनिक अवधारणा नहीं है। वाणी में सत सागर, सत धनी, सत साथ, सत धाम, सत खसम, सत नूर, सत संग, सत रस, सत सुख, सत आनंद, सत विलास, सत श्रृंगार, सत विचार, सत साँई और सत रंग जैसे अनेक प्रयोग मिलते हैं। इससे ‘सत्’ का अर्थ और व्यापक हो जाता है।
यहाँ सत् केवल “सही कथन” नहीं, बल्कि नित्य वास्तविकता और उस वास्तविकता में विद्यमान धनी, धाम, नूर, आत्म-संबंध, प्रेम, रस, आनंद और लीला की ओर संकेत करता है।
अर्थात् तारतम वाणी का ‘सत्’ केवल अस्तित्व का प्रश्न नहीं है—“क्या नित्य है?”—बल्कि यह भी बताता है कि उस नित्य सत्ता का स्वरूप कैसा है। वह केवल निर्गुण रिक्तता या निष्क्रिय शाश्वतता नहीं, बल्कि परमधाम की प्रेममयी और आनंदमयी वास्तविकता है।
सत धनी — नित्य प्रियतम की ओर संकेत करता है।
सत धाम — नित्य मूल घर की ओर।
सत नूर — उस नित्य प्रकाश की ओर।
सत साथ — नित्य आत्म-संबंध की ओर।
सत रस और सत रंग — उस संबंध के प्रेमानुभव की ओर।
सत सुख और सत आनंद — उसकी अखण्ड आनंदमयता की ओर।
सत विलास और सत श्रृंगार — परमधाम की नित्य प्रेम-लीला की ओर।
इस प्रकार ‘सत्’ को केवल एक निर्जीव metaphysical “existence” के रूप में समझना तारतम वाणी की पूरी अभिव्यक्ति को नहीं पकड़ता। यहाँ सत् अस्तित्व भी है, संबंध भी; प्रकाश भी है, प्रेम भी; धाम भी है, आनंद भी; और नित्य लीला भी।
इसीलिए ‘सत्’ और ‘सनातन’ का संबंध अत्यंत गहरा है। जो वास्तविक सत् है, उसकी मूल सत्ता काल की परिवर्तनशीलता से बंधी नहीं; और जो इस प्रकार नित्य है, वही वास्तविक अर्थ में सनातन है।
सृष्टि से पहले क्या था?
अब प्रश्न और गहरा होता है। यदि किसी सत्ता, तत्त्व या अवस्था का कभी प्रकटन हुआ है, तो क्या उसे ही परम सनातन कहा जा सकता है? उससे पहले क्या था?
तारतम वाणी इस खोज को सृष्टि के बहुत पीछे ले जाती है—
ना ईस्वर ना मूल प्रकृती, ता दिन की कहूँ आपा बीती।
निज लीला ब्रह्म बाल चरित्र, जाकी इछा मूल प्रकृत।।१५।।
यहाँ वाणी ऐसे प्रसंग की ओर संकेत करती है जब ईश्वर के सृष्टिगत स्वरूप और मूल प्रकृति का भी प्रकटन नहीं हुआ था। अक्षर ब्रह्म की लीला को बालक की क्रीड़ा के रूपक से समझाया गया है—ब्रह्माण्डों का प्रकटन और लय उसकी लीला में होता है और सृष्टि-रचना की इच्छा को ‘मूल प्रकृति’ कहा गया है।
इससे एक महत्वपूर्ण विवेक सामने आता है—जो सृष्टि के किसी चरण में प्रकट होता है, उसे उस मूल नित्य सत्ता के समान नहीं माना जा सकता जो उसके प्रकटन से पूर्व भी विद्यमान है।
वाणी आगे कहती है—
अब सुनियो मूल वचन प्रकार, जब नहीं उपज्यो मोह अहंकार।
नाहीं निराकार नाहीं सुन्य, ना निरगुन ना निरंजन।।१४।।
यहाँ वाणी उस मूल प्रसंग की ओर संकेत करती है जहाँ अभी मोह-अहंकार का उदय नहीं हुआ था; न निराकार, न शून्य, न निर्गुण और न निरंजन की वह अवस्था प्रकट हुई थी।
इसका आशय अत्यंत महत्वपूर्ण है—आध्यात्मिक यात्रा केवल दृश्य जगत से निराकार तक पहुँचकर समाप्त नहीं होती। यदि निराकार, शून्य, निर्गुण और निरंजन भी किसी स्तर या अवस्था के सूचक हैं, तो सनातन की खोज उनसे भी परे उस नित्य सत् की ओर जाएगी।
पंचतत्त्व और चेतन-प्रकाश से भी पूर्व
जल जिमी न तेज वाए, न सोहं सब्द आकास।
तब ए आद अनाद की, जब नहीं चेतन प्रकास।।६।।
यहाँ संकेत उस अवस्था की ओर है जब पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश जैसे पंचतत्त्व भी प्रकट नहीं हुए थे; ‘सोऽहं’ शब्द का भाव भी नहीं था और चेतन-प्रकाश का वह सृष्टिगत प्रकटन भी नहीं हुआ था।
अर्थात् जो कुछ आज हमें जगत, प्रकृति, तत्त्व और चेतना के प्रकट रूपों में दिखाई देता है, वाणी उसके भी पूर्व की अवस्था की चर्चा करती है। इसलिए सनातन को केवल वर्तमान सृष्टि-व्यवस्था के भीतर खोजना पर्याप्त नहीं; खोज को उसके मूल आधार तक पहुँचना होगा।
मूल अद्वैत — जहाँ सत् प्रेम और आनंद भी है
यहीं पहले वर्णित सत धनी, सत धाम, सत साथ, सत रस और सत आनंद का वास्तविक महत्व और स्पष्ट होता है। वाणी इस खोज को अंततः किसी रिक्त शून्यता में नहीं रोकती, बल्कि परम प्रेममयी मूल भूमि की ओर ले जाती है—
पहले मूल अद्वैत में, भोम जहाँ इस्क।
तहां प्रेम रबद में, भया हुकम हक।।२।।
यहाँ “मूल अद्वैत” उस परम भूमि की ओर संकेत करता है जिसके मूल में इश्क—प्रेम है। इसीलिए परमधाम का सत् केवल “नित्य अस्तित्व” नहीं रह जाता; वह नित्य प्रेममय अस्तित्व है।
यहीं तारतम वाणी की ‘सत्’ संबंधी विविध अभिव्यक्तियाँ एक सूत्र में जुड़ती हैं—सत धनी हैं, सत धाम है, सत नूर है, सत साथ है, सत संबंध है, सत रस है, सत रंग है, सत सुख है और सत आनंद है।
अर्थात् परम वास्तविकता केवल “मैं हूँ” के बोध तक सीमित नहीं रहती; वहाँ “मैं किसका हूँ, मेरा मूल घर कहाँ है, मेरा प्रियतम कौन है और मेरा नित्य संबंध क्या है”—ये प्रश्न भी उतने ही केंद्रीय हो जाते हैं।
यही कारण है कि परमधाम का ‘सत्’ केवल ontological reality—“अस्तित्व”—नहीं, बल्कि relational reality—“नित्य संबंध” भी है। और उस संबंध का स्वभाव प्रेम, रस और आनंद है।
आंशिक सत्य और पूर्ण सत्य
यहाँ एक महत्वपूर्ण विवेक आवश्यक है। किसी स्तर का सत्य असत्य नहीं हो जाता केवल इसलिए कि उससे आगे भी कोई व्यापक सत्य है। परंतु आंशिक सत्य को पूर्ण सत्य मान लेना भूल हो सकती है।
दृश्य जगत अपने स्तर पर अनुभव-सत्य है; निराकार का बोध उससे अधिक सूक्ष्म हो सकता है; अक्षर की सत्ता उससे व्यापक हो सकती है; किंतु यदि वाणी अक्षर से भी परे अक्षरातीत और परमधाम की ओर संकेत करती है, तो साधक किसी मध्यवर्ती अवस्था को अंतिम घोषित नहीं कर सकता।
इसलिए प्रश्न केवल “सही या गलत?” नहीं है। प्रश्न यह भी है—कितना सत्य? किस स्तर का सत्य? उसकी सीमा क्या है? और उससे आगे क्या है?
शास्त्र और सनातन सत्य
वेद, उपनिषद, कतेब और अन्य महान आध्यात्मिक ग्रंथ मानवता को सत्य के महत्वपूर्ण संकेत देते हैं। उनका सम्मान इसलिए है कि वे मनुष्य को सीमित अनुभव से ऊपर उठाकर व्यापक वास्तविकता की ओर ले जाते हैं।
परंतु किसी शास्त्र में सनातन सत्य का प्रकाश होना और सनातन सत्य को केवल उसी शास्त्र तक सीमित कर देना दो अलग बातें हैं। शास्त्र जिस वास्तविकता की ओर संकेत करता है, वह वास्तविकता स्वयं शास्त्र के शब्दों से बड़ी है। जैसे नक्शा सही और अत्यंत उपयोगी हो सकता है, किंतु नक्शा स्वयं मंजिल नहीं होता।
सनातन धर्म — केवल नाम नहीं, जीवन की दिशा
यदि सनातन सत्य वह नित्य वास्तविकता है जो हमारे स्वीकार या अस्वीकार से स्वतंत्र है, तो व्यापक आध्यात्मिक अर्थ में सनातन धर्म उस नित्य सत् को पहचानने और उसके अनुरूप जीवन जीने की दिशा है।
इसलिए सनातनता केवल किसी धार्मिक नाम, ऐतिहासिक पहचान या परंपरा की श्रेष्ठता का प्रश्न नहीं रह जाती। उसकी वास्तविक परीक्षा जीवन में है—क्या हमारी कथनी, करनी और रहनी सत्य के निकट जा रही है? क्या प्रेम बढ़ रहा है? क्या अहंकार घट रहा है? क्या विवेक के साथ करुणा बढ़ रही है? क्या ज्ञान केवल जानकारी बनकर रह गया है, अथवा जीवन को रूपांतरित कर रहा है?
अंततः शास्त्र का फल केवल अधिक जान लेना नहीं, बल्कि जागना और उस सत्य के अनुरूप जीना है।
अंत में — सनातन और तारतम वाणी का संबंध
सनातन का अर्थ केवल “बहुत प्राचीन” नहीं, बल्कि वह नित्य सत् है जिसकी मूल सत्ता काल और सृष्टि के परिवर्तन से नष्ट नहीं होती। तारतम वाणी इस सत् को केवल अमूर्त सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि सत धनी, सत धाम, सत नूर, सत साथ, सत रस, सत रंग, सत सुख और सत आनंद के रूप में जीवंत करती है। वह दृश्य जगत से निराकार और शून्य तक जाकर भी यात्रा को समाप्त नहीं मानती, बल्कि उनसे भी परे अक्षर और अक्षरातीत की पहचान कराती है। इस दृष्टि में परमधाम केवल नित्य “अस्तित्व” नहीं, बल्कि नित्य प्रेम, संबंध, रस, आनंद और लीला की भूमि है। शास्त्र उस सत् की ओर संकेत करते हैं; तारतम उन संकेतों के स्तर और सीमा का विवेक कराता है। जागनी उस सत् को केवल विचार में जानना नहीं, बल्कि अपने मूल धाम, धनी और संबंध में जागना है।
जो केवल प्राचीन है, वह आवश्यक नहीं कि सनातन हो।
जो वास्तव में ‘सत्’ है और काल के पार भी सत् ही रहता है—वही सनातन है।
और तारतम वाणी में यह सत् केवल नित्य सत्ता नहीं—नित्य धाम, नित्य धनी, नित्य प्रेम, नित्य संबंध और नित्य आनंद भी है।
इस संशोधन से लेख में एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट हो जाता है: “सनातन = जो कभी नष्ट नहीं होता” केवल आधी व्याख्या है; तारतम वाणी के संदर्भ में अगला प्रश्न है—“वह नित्य सत् कैसा है?” और यहीं सत धनी–सत धाम–सत साथ–सत नूर–सत रस–सत आनंद परमधाम के सत् को सकारात्मक और जीवंत रूप से प्रकट करते हैं।
सदा आनंद मंगल में रहिए
टैम्पा, सितंबर २२, २०२६
नरेंद्र पटेल
(यह पूर्व लेख की दूसरी आवृत्ति है)
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