सनन्ध 40 धर्म के नाम पर आडंबर, हिंसा और अहंकार की आलोचना

महामति प्राणनाथ की दिव्य गवाही

सनंध, प्रकरण 40 : धर्म के नाम पर आडंबर, हिंसा और अहंकार की आलोचना

भूमिका (Introduction)

'सनंध' शब्द उर्दू के सनद से विकसित है—अर्थात प्रमाण, साक्ष्य और गवाही। तारतम वाणी में सनंध एक वैचारिक विवाद-ग्रंथ नहीं, बल्कि परब्रह्म-साक्षात्कार से प्रमाणित दिव्य गवाही है—जो धर्म के बाह्य आडंबर, कट्टरता और हिंसा के नाम पर चलने वाले "धर्म-व्यवसाय" को उजागर करती है। महामति प्राणनाथ ने इसके कुछ अंश उर्दू लिपि में लिखवाकर सम्राट औरंगज़ेब तक पहुँचाए—न किसी धर्म का अपमान करने हेतु, न किसी मत को श्रेष्ठ ठहराने हेतु—बल्कि यह दिखाने हेतु कि धर्मग्रंथों का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को करुणा, विवेक और प्रेम की ओर उठाना है, न कि उसे भय, हिंसा और घृणा के औज़ार में बदल देना।

सनंध का मर्म यह है कि धर्म की कसौटी "पहचान" नहीं, "परिणाम" हैयदि धर्म के नाम पर मनुष्य अधिक निर्दयी, अधिक संकीर्ण और अधिक आक्रामक बन रहा है, तो समझना चाहिए कि ग्रंथ का अर्थ भीतर तक नहीं उतरा। महामति ज्ञान और अंधविश्वास के अंतर को भी स्पष्ट करते हैं: जागरण और मुक्ति की दिशा देने वाला ज्ञान ही सार्थक है; जो ज्ञान अहंकार, कटुता और वैमनस्य बढ़ाए, वह "थोथा ज्ञान" बन जाता है—और अक्सर धन से भी बड़ी बाधा, क्योंकि जमे हुए विश्वास को छोड़ना कठिन होता है।

इसीलिए सनंध का स्वर "प्रचार" नहीं, जागरण है। यह बाह्य कर्मकांड और मत-टकराव से ऊपर उठाकर, शास्त्रों के बातिनी/आंतरिक अर्थ की ओर बुलाती है—जहाँ धर्म का केंद्र भय नहीं, मेहर (करुणा) है; और जहाँ ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग दिखावा नहीं, हृदय-शुद्धि, विवेक और सत्य-जीवन है।

समेकित नैतिक–आध्यात्मिक सार

(Integrated Ethical–Spiritual Summary)

सनंध अध्याय 40 में महामति प्राणनाथ धर्म के नाम पर चलने वाली उस मानसिकता का अनावरण करते हैं, जो पहचान, सत्ता और बाह्य कर्मकांड को ही ईश्वर-प्राप्ति मान बैठती है। यह अध्याय स्पष्ट करता है कि न तो पद, न विद्वत्ता, न धार्मिक लेबल, और न ही जन्मगत पहचान—परम सत्य की अनुभूति की गारंटी है। स्वयं नबी और फ़रिश्तों ने भी परमधाम तक प्रत्यक्ष पहुँच का दावा नहीं किया, तो फिर साधारण मनुष्य का ऐसा दावा अहंकार का ही रूप है।

महामति धर्म को उसके फल से परखते हैं—यदि धर्म मनुष्य को अधिक करुणामय, विवेकी और शांत नहीं बना रहा, बल्कि उसे अधिक हिंसक, संकीर्ण और घृणित बना रहा है, तो वहाँ धर्म का मर्म नष्ट हो चुका है। ऐसे में धर्म ज्ञान नहीं, बल्कि अंधविश्वास बन जाता है; और यह अंधविश्वास धन से भी बड़ा बंधन है, क्योंकि जमे हुए विश्वास को तोड़ना सबसे कठिन होता है।

यह अध्याय यह भी दिखाता है कि जब बाह्य शुद्धता को ही धर्म मान लिया जाता है, तब भीतर की अशुद्धि हिंसा, ज़बरदस्ती और अत्याचार के रूप में फूट पड़ती है। जबरन धर्मांतरण, कर्मकांडों की अदला-बदली, मंदिर-मस्जिदों का ध्वंस, और प्रतिशोध की श्रृंखला—ये सब उसी अज्ञान का परिणाम हैं जो धर्म के नाम पर पोषित होता है।

सनंध का केंद्रीय संदेश यह है कि सच्चा पुण्य एकत्व-दृष्टि से उत्पन्न होता हैजहाँ साधक छोटे-बड़े सभी जीवों में एक ही परमात्मा को देखता है। नबी ने मुसलमान का नाम मेहरबान रखा, अर्थात करुणामय। जो दूसरों को दुःख देता है, वह किसी भी धर्म का सच्चा अनुयायी नहीं हो सकता।

अंततः महामति यह स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक धर्म बाह्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि अंतरशुद्धि, आत्म-साक्षात्कार और विवेकपूर्ण जीवन है। जो इस सत्य से कटे रहते हैं, वे चाहे कितने ही पढ़े-लिखे क्यों न हों, अंतिम न्याय के सत्य से अनभिज्ञ ही रह जाते हैं।


प्रकाशन-योग्य टिप्पणीयुक्त संस्करण

(Annotated Interpretive Notes for Publication)

1. धर्म बनाम पहचान

सनंध में "मुसलमान", "ब्राह्मण", "काफ़िर" जैसे शब्द पहचान नहीं, चेतना की अवस्थाओं के रूप में प्रयुक्त हैं। आलोचना किसी समुदाय की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है जो धर्म को सत्ता और नियंत्रण का साधन बना लेती है।

2. स्वप्न-जगत की उपमा

चौदह लोकों को "स्वप्नवत" कहना तारतम दर्शन की केंद्रीय अवधारणा है—जहाँ संसार अनुभव में सत्य है, पर अंतिम सत्य नहीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि हिंसा और वैमनस्य स्वप्न में आग से खेलने जैसा है।

3. बाह्य कर्मकांड की सीमा

वुज़ू, नमाज़, रोज़ा, हज, जियारत—इन सबका मूल्य तभी है जब वे हृदय-शुद्धि की ओर ले जाएँ। केवल बाह्य पालन, बिना आंतरिक परिवर्तन के, धर्म को खोखला बना देता है।

4. जबरन धर्मांतरण की आलोचना

सनंध स्पष्ट रूप से बताता है कि ज़ोर-जबरदस्ती से बदली गई पहचान आत्मा का रूपांतरण नहीं होती। यह केवल एक गड्ढे से दूसरे गड्ढे में धकेलना है—चाहे वह किसी भी मत के नाम पर हो।

5. प्रतिशोध का चक्र

मंदिर तोड़े जाने पर मस्जिद तोड़ना, या मस्जिद तोड़े जाने पर मंदिर गिराना—दोनों को महामति समान अज्ञान मानते हैं। प्रतिशोध धर्म नहीं, बल्कि मोह-उन्माद है।

6. सच्चे पुण्य की कसौटी

सनंध के अनुसार पुण्य का मापदंड यह नहीं कि क्या किया, बल्कि यह है कि किस भाव से और किस परिणाम के साथ किया। जो सभी जीवों में एक परमात्मा को देखता है, वही वास्तविक पुण्य का अधिकारी है।

7. अंतिम न्याय की स्मृति

जो स्वयं को क़ाज़ी समझ बैठते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि अंतिम न्याय मनुष्य नहीं, स्वयं परमात्मा करेंगे। इस विस्मृति को महामति सबसे बड़ा आध्यात्मिक पतन मानते हैं।


निष्कर्ष

सनंध अध्याय 40 किसी एक धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि धर्महीन धार्मिकता के विरुद्ध एक दिव्य साक्ष्य है। यह अध्याय आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि धर्म का उद्देश्य पहचान बनाना नहीं, मानव को मानवीय बनाना है।

 

(चौपाई 1 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
सेमिटिक धर्मग्रंथों में यह बात स्पष्ट रूप से कही गई है कि जिनको सर्वोच्च दूत और फ़रिश्ते माना जाता है, उन्होंने भी परमधाम तक प्रत्यक्ष पहुँच का दावा नहीं किया। इसलिए साधारण लोगों द्वारा ऐसे दावे करना सावधानी की माँग करता है। सच्ची अनुभूति पद, विद्वत्ता या जन्मगत पहचान से प्राप्त नहीं होती।


(चौपाई 2 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
नबियों द्वारा परम तत्त्व के विषय में दिए गए संकेत स्वयं उनकी दृष्टि में भी सामान्य बुद्धि से परे और अगम्य बताए गए हैं। चौदह लोकों का यह समस्त ब्रह्माण्ड एक स्वप्नवत अनुभव के रूप में वर्णित है—अनुभव में सत्य, पर अंतिम सत्य नहीं। इन सबसे परे और पूर्व स्थित परम प्रियतम ही सर्वोच्च है।


(चौपाई 3 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
जब स्वयं क़ुरआन के विद्वान व्याख्याकार भी उस परम अवस्था की अनुभूति तक नहीं पहुँचे, तब वही वर्ग अपने को क़ाज़ी (न्यायाधीश) मानकर तथाकथित दैवी फ़ैसले सुनाने लगा। वे यह दावा भी करते हैं कि जो कोई आध्यात्मिक कल्याण चाहता है, उसे उन्हीं के माध्यम से आना होगा—मानो परमात्मा से मिलने का एकमात्र अधिकार उन्हीं के पास हो।


(चौपाई 4 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
विद्वान मुल्ला मार्गदर्शन के लिए आगे तो आए, परंतु स्वयं ही अहंकार में फँस गए। जनता के सामने अपने ज्ञान का प्रदर्शन करते हुए, वे स्वयं को क़ुरआन के प्रामाणिक विद्वान सिद्ध करने में लग गए।


(चौपाई 5 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
वे सांसारिक मान–सम्मान के लोभ में धर्म के मूल सार को ही खो देते हैं और इसी कारण उलटी रीति पर चलते रहते हैं। इस स्वप्नवत संसार के क्षणिक सुखों के पीछे भागते हुए, उनका लोभ अंततः उन्हें गहरे अपमान की ओर ले जाता है।


(चौपाई 6 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
ऊपरी और स्वार्थपूर्ण व्याख्याओं के सहारे वे लोगों को "सही मार्ग" दिखाने का दावा करते हैं और कहते हैं कि यही नबी का वास्तविक अभिप्राय है। जबकि क़ुरआन का गहन उद्देश्य इन विकृत अर्थों से भिन्न है। इस प्रकार वे छलपूर्ण और हानिकारक खेल खेलते रहते हैं।


(चौपाई 7 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
ये तथाकथित धर्म-नेता विभिन्न भेष धारण कर निरर्थक विवादों में उलझते हैं। आपस में प्रतिस्पर्धा करते हुए, वे लोगों को उनकी पारंपरिक आस्था से जबरन तोड़ते हैं और दूसरी जीवन-प्रणाली अपनाने के लिए मजबूर करते हैं। ऐसा करते हुए वे स्वयं को पुण्य का अधिकारी समझ लेते हैं।


(चौपाई 8 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
जो लोग अपनी जीवन-शैली में संतुष्ट और स्थिर होते हैं, उन्हें हिंसा के बल पर उसे छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है। पीड़ित लोग सिर पीट–पीटकर रोते हैं, पर ये तथाकथित धार्मिक अगुआ इस क्रूरता को भी पुण्य-कर्म मान लेते हैं।


(चौपाई 9 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
वे लोगों को एक कर्मकांड-प्रधान गड्ढे से खींचकर निकालते हैं और उन्हें दूसरे, उससे भी अधिक कठोर नियमों वाले गड्ढे में धकेल देते हैं। यह सब ज़ोर-जबरदस्ती, भय और कभी-कभी रक्तपात के माध्यम से किया जाता है, और फिर भी वे इसे पुण्य समझते हैं।


(चौपाई 10 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
हिन्दू अपने मृतकों का दाह-संस्कार करते हैं और मुसलमान उन्हें दफ़नाते हैं। इसके बाद दोनों ही गंगा या क़ब्रों की ज़ियारत करते हैं और आश्चर्यजनक रूप से यह मान लेते हैं कि केवल इन बाह्य क्रियाओं से ही उन्हें पुण्य प्राप्त हो गया।


(चौपाई 11 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
वे आक्रमण कर लोगों को मारते-पीटते और कुचलते हैं, जिससे वे देह और मन—दोनों से आहत होकर शोक और वेदना में डूब जाते हैं। इस प्रकार ज़ोर-जबरदस्ती से उनकी धार्मिक पहचान बदली जाती है, और फिर भी ऐसे कृत्यों को वे पुण्य मान लेते हैं।


(चौपाई 12 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
जिस प्रकार एक विशाल मगरमच्छ बिना किसी मर्यादा के छोटे जीवों को निगलता रहता है, उसी तरह ये लोग किसी संयम या नैतिक सीमा के बिना आचरण करते हैं। उसी उग्रता से वे असहायों को अपनी ओर खींचकर जबरन धर्मांतरण करते हैं—और विडंबना यह कि इस हिंसा को भी 'पुण्य' समझ बैठते हैं।


(चौपाई 13 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
वे गरीब और असहायों पर अत्याचार करते हैं, इतना कि कोई शिकायत करने का साहस भी नहीं कर पाता। ज़बरदस्ती किए गए कर्म—जैसे जबरन सुन्नत और गहरे आस्थागत आहार-नियमों का अपमान—के माध्यम से वे निर्बलों को तोड़ते-अपमानित करते हैं, और फिर भी इसे पुण्यकर्म मानते हैं।


(चौपाई 14 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
जो लोग जीवनभर क्रूरता में डूबे रहे हों, नैतिक पतन और मांस-मदिरा की लत में फँसे हों, उन्हें भी बिना विवेक के स्वीकार कर लिया जाता है। और आश्चर्य यह कि ऐसी अंधी स्वीकृति को भी वे पुण्य समझ लेते हैं।


(चौपाई 15 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
जबरन बनाए गए परिवर्तित व्यक्तियों को सिर से पाँव तक नए वस्त्र पहनाकर औपचारिक रूप से हाथी पर बैठाया जाता है। भीतर से टूटे और अपमानित वे लोग होते हैं, जबकि अत्याचारी ढोल-नगाड़ों के साथ उत्सव मनाते हैं—और इसे भी पुण्य मान लेते हैं।


(चौपाई 16 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
जिन्हें वे पहले 'काफ़िर' कहते थे, उन्हें ज़ोर से 'मुसलमान' बनाया जाता है और तुरंत समुदाय में गिन लिया जाता है। फिर उनसे सिर मुँडवाना और दाढ़ी रखना जैसी बाहरी पहचानें अपनवाई जाती हैं—और ऐसा करने वाले इसे पुण्यकर्म समझते हैं।


(चौपाई 17 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
परिवर्तित लोगों को सामूहिक भोजन में शामिल किया जाता है और नियमित रूप से मस्जिद जाकर मेहराब के सामने कलमा पढ़ने व नमाज़ अदा करने को बाध्य किया जाता है। इन बाहरी अनुष्ठानों की जबरन पालना को भी वे पुण्य का साधन मान लेते हैं।


(चौपाई 18 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
आदि काल से हिन्दुओं ने श्रद्धा और प्रेम से अपने मंदिर बनाए। पर ये तथाकथित धर्म-नेता अपने अनुयायियों को उन्हें बलपूर्वक गिराने के लिए उकसाते हैं—और दुखद यह कि इसे भी पुण्य समझते हैं।


(चौपाई 19 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
ऐसे अत्याचारों की प्रतिक्रिया में, हिन्दू भी मस्जिदों को गिराने और अपने देवताओं की स्थापना करने लगते हैं—और वे भी यह मान बैठते हैं कि प्रतिशोध में किया गया यह कर्म पुण्य है।


(चौपाई 20 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
न तो उन्हें अपने इष्ट-देव का वास्तविक बोध है, न अपने धर्म की आत्मा का। मोह और अज्ञान के उन्माद में डूबे हुए, वे जितना वैर बढ़ाते हैं, उतना ही उसे सद्गुण समझने लगते हैं और उसे पुण्यकर्म मान लेते हैं।


(चौपाई 21 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
ऐसे लोग मोह और अहंकार में डूबे रहते हैं और झगड़ों, वैर-भाव तथा भड़काऊ तर्क-वितर्कों में अपना जीवन नष्ट कर देते हैं। इस प्रकार परस्पर शत्रुता निरंतर चलती रहती है—और फिर भी, विडंबना यह है कि वे इन कृत्यों को पुण्य मान लेते हैं।


(चौपाई 22 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
इसी प्रकार ये स्वयंभू विद्वान लोगों को मार्ग दिखाने का दावा करते हुए उन्हें भटकाते रहते हैं। अपनी सतही और विकृत समझ के सहारे वे इस स्वप्न-जगत में आग से खेलते हैं। आँखों के सामने अत्याचार बढ़ते रहते हैं, फिर भी वे इन्हें पुण्यकर्म मानते हैं।


(चौपाई 23 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
वास्तविक पुण्य तो केवल उन्हें ही प्राप्त होता है, जो छोटे-बड़े सभी जीवों को एकत्व की दृष्टि से देखते हैं और यह पहचानते हैं कि एक ही परम प्रिय—परमात्मा—सबका स्वामी और अंतर्यामी है।


(चौपाई 24 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
जो दूसरों को दुःख देता है, वह मुसलमान नहीं हो सकता। क्योंकि नबी ने मुसलमान का नाम 'मेहरबान'—अर्थात करुणामय और दयालु—रखा है।


(चौपाई 25 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
कोई भी इस्लाम के वास्तविक मर्म को नहीं समझ पाता; नबी की शिक्षाएँ उनके हृदय को भेद नहीं पातीं। वे न तो नमाज़ और इबादत के आंतरिक अर्थ को जानते हैं, फिर भी स्वयं को मुसलमान कहते रहते हैं।


(चौपाई 26 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
सच्चा धर्म क्या है और उसे क्यों व कैसे जीना चाहिए—इसका उन्हें बोध नहीं है। धर्म का अनुभव भीतर आत्मा में, आचरण में देह के माध्यम से और बाहर संसार में कैसे प्रकट होना चाहिए—इसकी भी स्पष्टता नहीं है। फिर भी, इन सब बातों की समझ के बिना वे स्वयं को मुसलमान कहते हैं।
टिप्पणी: जब साधक आत्मा के उस अंतःस्थ केन्द्र में पहुँचता है जहाँ विचारों और दृश्यों की तरंगें नहीं उठतीं, तब देह और बाह्य संसार स्वाभाविक रूप से उसी सत्य के अनुरूप हो जाते हैं।


(चौपाई 27 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
उन्हें न तो वुज़ू, नमाज़ और रोज़े के आंतरिक अर्थ का बोध है, न रमज़ान के गहरे उद्देश्य की समझ। वे माला फेरते हुए ईश्वर-नाम तो जपते हैं, पर अपने भीतर की स्थिति से अनभिज्ञ रहते हैं—और फिर भी स्वयं को मुसलमान कहते हैं।


(चौपाई 28 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
हृदय-शुद्धि का महत्व उन्हें ज्ञात नहीं, शास्त्र-वचनों के वास्तविक अभिप्राय की पहचान नहीं, न ही संसार के छल और शाश्वत परमधाम की समझ—फिर भी वे मुसलमान होने का गर्व करते हैं।


(चौपाई 29 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, इस संसार में क्या देख रहा हूँ, नबी कौन हैं और मुझे किसने भेजा है—इन मूल प्रश्नों की स्पष्टता के बिना भी वे स्वयं को मुसलमान कहते हैं।


(चौपाई 30 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
उन्होंने कभी परम सत्य को स्मरण नहीं किया, न उसके विरह की पीड़ा का अनुभव किया। स्वप्न में भी ईश्वर-स्मृति का उदय नहीं हुआ—फिर भी वे अपने को मुसलमान कहते रहते हैं।


(चौपाई 31 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
यह संसार प्रचंड रूप से जलती हुई आग के समान है, फिर भी वे भौतिक लालसाओं को ही सच्चा सुख मान लेते हैं। सत्य को सामने दिखाए जाने पर भी उनकी अंतःदृष्टि अंधी बनी रहती है, और फिर भी वे स्वयं को मुसलमान कहते रहते हैं।


(चौपाई 32 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
वे बाहरी दिखावे में भक्ति का प्रदर्शन करते हैं, पर भीतर न देखने की आँख है न सुनने का कान। तब वे न परमात्मा की वाणी कैसे सुन सकते हैं, न उसके संकेतों को कैसे देख सकते हैं—फिर भी स्वयं को मुसलमान कहते हैं।


(चौपाई 33 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
वे उपासना की केवल बाहरी विधियों में उलझे रहते हैं और यह समझ खो चुके हैं कि क्या हितकर है और क्या अहितकर। आत्मा-तत्त्व की पहचान उन्हें नहीं है, फिर भी वे अपने को मुसलमान कहते हैं।


(चौपाई 34 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
वे किसी के गुण नहीं देखते, बल्कि दूसरों के अवगुणों को बढ़ा-चढ़ाकर अपने सिर पर लाद लेते हैं। स्वयं अपनी इंद्रियों के वश में पड़े रहते हैं, फिर भी अपने को मुसलमान कहते हैं।


(चौपाई 35 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
ऐसे लोग असंख्य अत्याचार करते हैं। अहंकार में अंधे होकर उनकी अंतर-दृष्टि बंद हो चुकी है, और वे हत्या करने से भी नहीं डरते—फिर भी स्वयं को मुसलमान कहते हैं।


(चौपाई 36 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
उनकी नीयत कभी शुद्ध नहीं रही, मानो छल ही उनका स्वभाव बन गया हो। दिन-रात वे धोखे की कामना करते रहते हैं, और फिर भी अपने को मुसलमान कहते हैं।


(चौपाई 37 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
उनका चंचल मन उन्हें रूई की तरह उड़ाता रहता है, जिससे वे कहीं टिककर शांति नहीं पा सकते। वे सब ग़फ़लत में भटकते रहते हैं, और फिर भी स्वयं को मुसलमान कहते हैं।


(चौपाई 38 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
वे घमंड में खड़े रहते हैं और स्वयं को पर्वत के समान ऊँचा समझते हैं, पर उन्हें यह विवेक नहीं रहता कि क्या महत्वपूर्ण है और क्या तुच्छ। फिर भी वे अपने को मुसलमान कहते हैं।


(चौपाई 39 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
उनका शरीर काम और क्रोध से भरा रहता है; वे मांसाहार और मदिरापान में डूबे रहते हैं। उन्हें यह भी ज्ञान नहीं कि क्या हक़ है और क्या हराम, फिर भी वे अपने को मुसलमान कहते हैं।


(चौपाई 40 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
बाल सफ़ेद हो जाने पर भी उनके भीतर की स्याही—अज्ञान—और अधिक बढ़ती जाती है। उसी अंधकार में वे निर्दोषों का गला काटते हैं, उनके अधिकार छीनते हैं और रक्तपान तक करते हैं—फिर भी स्वयं को मुसलमान कहते हैं।


(चौपाई 41 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
वे दूसरों के दुःख को देख ही नहीं पाते; उनके हृदय पत्थर के समान कठोर हो चुके हैं। वे बिना किसी संकोच के दूसरों को पीड़ा देते हैं, और फिर भी स्वयं को मुसलमान कहते हैं।


(चौपाई 42 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
ब्राह्मण अपने को श्रेष्ठ कहते हैं और मुसलमान अपने को पवित्र मानते हैं, किंतु दोनों की चेतना और देह एक ही मूल स्रोत से उत्पन्न हैं। मानो एक ही परम सत्ता ने अपनी दो मुट्ठियों से उन्हें भेजा हो। अंततः एक देह राख बनती है और दूसरी मिट्टी में मिल जाती है।


(चौपाई 43 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
वे अपने भीतर के कुफ़्र और दुर्भावना को नहीं निकालते, पर सभी दूसरों को ही काफ़िर समझते हैं। अपने अवगुण उन्हें दिखाई नहीं देते, फिर भी वे अपने को मुसलमान कहते हैं।


(चौपाई 44 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
जैसे स्वप्न में मन अनेक दृश्यों में प्रवेश करता है और हर स्थान पर अपने भाव को ही देखता है, वैसे ही जाग्रत अवस्था में मन में जो तरंगें और भाव होते हैं, वही भाव मनुष्य को दूसरों में दिखाई देते हैं।


(चौपाई 45 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
वे एक क्षण के लिए भी अपनी बुराइयों को नहीं छोड़ते और न ही परमात्मा का कोई भय रखते हैं। मनमाने ढंग से आचरण करते हुए भी वे अपने को मुसलमान कहते हैं।


(चौपाई 46 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
दूसरों पर विश्वास न रखते हुए, उसी कठोर मनोवृत्ति के साथ वे क़ुरान पढ़ते हैं, स्वयं को क़ाज़ी मान लेते हैं और दूसरों को राह दिखाने लगते हैं—फिर भी अपने को मुसलमान कहते हैं।


(चौपाई 47 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
अज्ञान में उनके हृदय इस प्रकार फट चुके हैं कि उन्हें यह मूल सत्य भी स्मरण नहीं रहता कि अंत में स्वयं परमात्मा ही न्यायाधीश के रूप में प्रकट होंगे। तब वे क्या उत्तर देंगे?


(चौपाई 48 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
वे दावा करते हैं कि उन्होंने अल्लाह का कलाम पढ़ा है, पर उसमें उनका विश्वास नहीं जगा। यह कहकर कि "डर किस बात का, कौन आने वाला है?", वे अपने ही धर्म को हल्का और खोखला बना देते हैं।


(चौपाई 49 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
जिन्हें अपने धर्म पर वास्तविक भरोसा नहीं है, उन्होंने उसी को सस्ता और तुच्छ बना दिया है। इस प्रकार वे स्वयं अपने हाथों से क़ुरान की प्रतिष्ठा को घटाते हैं।


(चौपाई 50 का अर्थ – हिन्दी अनुवाद)
महामति कहते हैं कि इस प्रकार पढ़े-लिखे और स्वयंभू क़ाज़ी वास्तव में बड़े कुफ़्र में पड़े हैं। उनके पास न अंतर्दृष्टि है, न गहरी समझ—इसी कारण वे अंतिम न्याय (क़ज़ा) के सत्य से अनजान रह गए हैं।


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