विखंडित यथार्थ से एकीकृत चेतना तक: (समकालीन विश्व-घटनाओं और धर्म-समाज से उपजे कुछ आध्यात्मिक बोध)

विखंडित यथार्थ से एकीकृत चेतना तक:

(समकालीन विश्व-घटनाओं और धर्म-समाज से उपजे कुछ आध्यात्मिक बोध)


विखंडित यथार्थ वह दृष्टि है जिसमें जीवन और जगत को अलग-अलग, बिखरे और अधूरे टुकड़ों में देखा जाता है। धर्म, विचार, पहचान और अनुभव परस्पर जुड़े हुए नहीं, बल्कि एक-दूसरे से कटे हुए प्रतीत होते हैं। इस लेख का उद्देश्य इसी बिखराव से आगे बढ़कर उस एकीकृत चेतना की ओर संकेत करना है, जहाँ यथार्थ को खंडों में नहीं, समग्र रूप में अनुभव किया जाता है—और जहाँ प्रवेश का द्वार बाहर नहीं, भीतर खुलता है।


यह शीर्षक इसी यात्रा की ओर संकेत करता है—इंसान का सफर बिखरी हुई समझ से निकलकर उस चेतना तक पहुँचना है, जहाँ सब कुछ परस्पर जुड़ा हुआ, जीवंत और पूर्ण दिखाई देता है।


आज की विश्व-घटनाएँ केवल समाज, राजनीति या धर्म की सूचनाएँ भर नहीं हैं; वे मानव-चेतना की वर्तमान अवस्था का दर्पण हैं। जब सत्य को “मेरी टीम”, “मेरा मत”, “मेरी पहचान” और “मेरी निष्ठा” के संकुचित चश्मे से देखा जाने लगता है, तब यथार्थ-दर्शन स्वाभाविक रूप से विखंडित हो जाता है। ऐसी स्थिति में भय-आधारित व्यवस्थाएँ स्वयं ही उग्रता (escalation) को जन्म देती हैं, और “कर के दिखा दिया” का अहं त्वरित विजय की माँग करता है—भले ही उसकी कीमत दीर्घकालिक शांति क्यों न हो।


तारतम-दृष्टि इस विखंडन के प्रतिकार का मार्ग खोलती है। वह चेतना को एकीकृत करती है—जहाँ विवेक सत्य की रक्षा नहीं, उसकी खोज करता है; जहाँ सरदारी सिंहासन नहीं, सेतु बनती है; और जहाँ अकेले ‘मैं’ का भ्रम टूटकर ‘हम’ के सहयोग में रूपांतरित हो जाता है। इसलिए समाधान बाहरी संसार को जीतने में नहीं, बल्कि भीतर की दिशा बदलने में निहित है—क्योंकि भीतर की शीतलता ही बाहर के संसार को संतुलन दे सकती है।


आज हम जिन घटनाओं, प्रतिक्रियाओं और बहसों को देख रहे हैं, वे केवल राजनीति, समाज, धर्म या नीतियों की कहानी नहीं हैं। वे यह भी प्रकट करती हैं कि मनुष्य इस समय कैसे सोच रहा है, कैसे महसूस कर रहा है और कैसे निर्णय ले रहा है—अर्थात् वे उसकी मानव-चेतना की अवस्था को उजागर करती हैं। यह अवस्था बताती है कि हमारा मन केवल भय से संचालित है या विवेक से भी, केवल अहं से प्रतिक्रिया कर रहा है या समझ से संवाद भी कर पा रहा है, और हम “मैं बनाम वे” की दृष्टि में फँसे हैं या साझा मानवता की भावना से देख पा रहे हैं।


यदि हम इन प्रसंगों को थोड़ी दूरी से देखें, तो वे हमारे भीतर और समाज में चल रही उन्हीं गहरी प्रवृत्तियों—भय, असुरक्षा, पहचान-आधारित सोच और त्वरित प्रतिक्रिया—की ओर संकेत करते हैं।


इसी पृष्ठभूमि में, अब हम एकीकृत बोध के इस संक्षिप्त नक्शे पर विचार करेंगे।


1. वास्तविकता का विखंडन (Reality-splitting): सत्य जब पहचान बन जाता है, विवेक क्षीण होने लगता है।

2. भय-आधारित व्यवस्था: तनाव या उग्रता बढ़ाने की प्रवृत्ति : “Maximum force” को सामान्य मानते ही टकराव उस व्यवस्था का स्वाभाविक परिणाम बन जाता है।

3. भाषा : प्रथम हिंसा: कठोर शब्द पहले मन को घायल करते हैं, फिर कर्म को विकृत करते हैं।

4. सत्य बनाम निष्ठा: सच जब “हमारे पक्ष” का रंग पहन लेता है, संवाद समाप्त हो जाता है।

5. त्वरित विजय का मोह: “कर के दिखा दिया” अक्सर परिपक्वता नहीं, अहं की अधीरता का संकेत होता है।

6. सच्ची सरदारी: नेता केंद्र नहीं होता—वह ध्येय (धनी) और समुदाय (साथ) के बीच सेतु होता है।

7. अकेले ‘मैं’ का भ्रम: समग्रता अकेलेपन से नहीं, सहयोग से जन्म लेती है; मसलत तारतम की मूल पद्धति है।

8. वर्तमान में वापसी: ऑनलाइन उत्तेजना से हटकर देह-उपस्थिति, समुदाय, मौन और मानवीय संवाद की ओर लौटना आवश्यक है।

9. निजी जीवन में सत्ता-भाषा: उपदेश और नियंत्रण रिश्तों में वही तानाशाही-बीज बोते हैं, जो सत्ता में विकृति बनते हैं।


आइए, प्रत्येक बिंदु पर ध्यानपूर्वक विचार करते हैं :


1️⃣ वास्तविकता का विखंडन: जब सत्य एक नहीं रहता


आज वास्तविकता का विखंडन( Reality-splitting) एक रणनीति बन चुका है। एक ही घटना को लोग अपनी मानसिक अवस्थापहचान और पूर्वधारणाओं के कारण अलग–अलग “सत्य” के रूप में देखते हैं। इस में, लोग घटना को नहीं,

अधिकतर अपने भीतर की अवस्था को ही पढ़ रहे होते हैं। अधिकतर प्रशासनिक, सामाजिक और धार्मिक नेतृत्व “अपनी आँख-कान पर भरोसा करना सिखाने के बजाय “मेरी बात पर भरोसा करो” वाला पैटर्न तेज़ी से चला रहे हैं—और यह समस्या घटना के बाद, लंबी अवधि तक टिक सकती है। एक बार शुरू हुई दृष्टि विशेष 

समाज की सोच, निर्णय और आत्म-विश्वास को दीर्घकाल तक उसी में ढाल देती है - बॉक्स अप कर देती है।


यह स्थिति केवल सूचना (इन्फ़ॉर्मेशन) की कमी की वजह से नहीं, बल्कि चित्त की प्रतिबद्धता (allegiance, व्यक्ति या ग्रुप के प्रति समर्पितता) से पैदा होती है। जब सत्य देखने से अधिक, पहचान निभाने का विषय बन जाए—तब विवेक (विवेक-बुद्धि) क्षीण होने लगती है। 


तारतम की भाषा में यह माया की सूक्ष्म चाल है— जहाँ आँखें देखती हैं, पर मन मानने को तैयार नहीं होता। “सखी री जान बूझ क्यों खोइए, ऐसा अलेखे सुख अखण्ड। सो जाग देख क्यों भूलिए, बदले सुख ब्रह्मांड।।”

तारतम वाणी कई बार इसे माया का “फंद” और “बंध” कहती है—लोक चौदमायानों फंद… समझया विना सहुए अंध; यानी संसार का जाल ऐसा है कि समझ के बिना सब अंधे हो जाते हैं। माया की सूक्ष्मता यह है कि वह केवल अज्ञानी को नहीं, बल्कि “निर्मल नेत्र” वाले को भी अंधा कर देती है—मायानी तां एह सनंधनिरमलनेत्रे थैए अंध। तब आँखें खुली रहती हैं, फिर भी भीतर दृष्टि नहीं खुलती—आंखांतोहे  उघडी…” और हम विचार करना छोड़ देते हैं—जो कीधो नहीं विचार। ऐसे में लोग सत्य की खोज नहीं करते, “देखा-देखी” कतार पकड़ लेते हैं—ज्यों चले चींटीहार… बांधे जाएँ कतार। और फिर अहंकार सत्य नहीं, “मत” की रक्षा करने लगता है—मत लिए चलत अहंकार… विवेक खाली विचार। 


यही कारण है कि आज बहसें बढ़ती हैं, पर समझ घटती है—क्योंकि संकट बाहर के तथ्यों का नहीं, भीतर की प्रतिबद्धता का है; और तारतम-प्रकाश का काम वही है: चित्त को इस जाल से जगाकर, सत्य को पहचान से मुक्त देखना सिखाना।


2️⃣ तनाव या उग्रता बढ़ाने की प्रवृत्ति(escalation): जब व्यवस्था स्वयं तनाव पैदा करे


जब किसी भी व्यवस्था में डर, सख़्ती और अधिकतम बल “maximum force” के उपयोग को सामान्य तरीका बना लिया जाता है, तब टकराव कोई अचानक होने वाली घटना नहीं रह जाता। वह उसी व्यवस्था का स्वाभाविक नतीजा बन जाता है। ऐसी प्रणाली बाहर से शांति बनाए रखने की बात करती है, लेकिन भीतर से वह तनाव ही पैदा करती रहती है।


यहीं यह समझ ज़रूरी हो जाती है कि बाहर शीतलभीतर आग सही दिशा नहीं है। जो व्यवस्था अपने भीतर शांति, भरोसे और संतुलन से जुड़ी नहीं होती, वह बाहर शांति कैसे फैला सकती है? यह बात केवल सरकारों पर नहीं, परिवारों, संस्थाओं और धार्मिक संगठनों पर भी उतनी ही लागू होती है।


तारतम वाणी की यह चौपाई इसी सत्य को सरल शब्दों में कहती है—चोर फेर करूंबोलावेसुख सीतल करूं संसार। महामति बताते हैं कि आत्मा का आनंद किसी बाहर वाले ने नहीं छीना; हमारे ही मन और इंद्रियाँ डर और तृष्णा के कारण उसे चुरा लेती हैं। समाधान इन्हें दबाना नहीं है, बल्कि उनकी दिशा बदलना है—वही ऊर्जा जब प्रेम और समझ की ओर मुड़ती है, तो शांति अपने आप फैलने लगती है।


इसके उलट, जब डर को अनुशासन और सख़्ती को सुरक्षा समझ लिया जाता है, तब बल का प्रयोग बढ़ता जाता है। टकराव बढ़ता है, और उसे रोकने के लिए और ज़्यादा बल चाहिए—यानी escalation खुद को ही बढ़ाती रहती है। बाहर शांति दिखती है, भीतर आग जलती रहती है।


सच्ची शांति ज़ोर-ज़बरदस्ती से नहीं आती। वह तब आती है जब भीतर की दिशा बदलती है। जब भीतर शीतलता आती है, तभी बाहर का संसार भी शीतल हो पाता है।


3️⃣ भाषा भी हिंसा बन सकती है:


किसी भी घटना के तुरंत बाद जब कठोर लेबल, निर्णायक शब्द और चरम आरोप सामने आते हैं, तो वे केवल प्रतिक्रिया नहीं रहते—वे स्वयं एक प्रकार की द्वितीय हिंसा बन जाते हैं। शब्द पहले मन को घायल करते हैं, और घायल मन आगे चलकर कर्म को विकृत करता है। इसलिए हिंसा का पहला रूप अक्सर हथियार नहीं, भाषा होती है।


महामति की दृष्टि में यह क्रम बहुत स्पष्ट है— अविवेकी वाणी, अविवेकी कर्म से पहले आती है यही बात इन चौपाइयों में सरल लेकिन गहरे रूप में कही गई है।


“अब क्यों देऊं कसनी, मुख करमाने न सहूं।

तिन कारन सब्द कठन, मेरे प्यारों को मैं क्यों कहूं।”

यहाँ महामति स्पष्ट करते हैं कि कठोर शब्द बोलना केवल असंयम नहीं, बल्कि अनावश्यक चोट है। “कसनी” यानी कड़ाई, और “सब्द कठन” यानी तीखे शब्द—ये समस्या को सुलझाते नहीं, बल्कि संबंधों में और तनाव भर देते हैं। इसलिए वे कहते हैं कि जिन्हें मैं अपना मानता हूँ, उन्हें कठोर शब्दों से क्यों घायल करूँ?


दूसरी चौपाई इस बात को और साफ़ करती है—

“पहिले इनके रूचता, तुम बोलियो जुबान।

इनके होए इन्हें बस करो, रूचता ही करो बयान।”

महामति यहाँ संयमित भाषा की विधि बताते हैं। पहले सामने वाले की रुचि, उसकी स्थिति और मनोभाव को समझो। फिर वही भाषा बोलो जो उसे और उग्र न करे, बल्कि उसे संभाल सके। अर्थात् शब्दों का उद्देश्य जीतना नहीं, शांत करना होना चाहिए।


इस प्रकार ये चौपाइयाँ यह सिखाती हैं कि जब भाषा अविवेक से चलती है, तो वह स्वयं हिंसा बन जाती है—और वही हिंसा आगे कर्म में फूट पड़ती है। इसके विपरीत, विवेकपूर्ण वाणी मन को ठंडा करती है, जिससे कर्म भी संतुलित रहता है। इसलिए किसी भी संकट की घड़ी में पहला अनुशासन हथियारों का नहीं, शब्दों का होना चाहिए। यही कारण है कि महामति की चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है—अगर भाषा हिंसक हो गई, तो शांति की कोई नीति टिक नहीं सकती।


4️⃣ सत्य बनाम निष्ठा: जब ‘सच’ टीम का रंग ले ले


जब किसी तथ्य को इस आधार पर स्वीकार या अस्वीकार किया जाए कि वह “हमारे पक्ष” के अनुकूल है या नहीं, तब सत्य धीरे-धीरे पीछे हट जाता है और उसकी जगह निष्ठा ले लेती है। ऐसे में प्रश्न यह नहीं रहता कि क्या सही है, बल्कि यह हो जाता है कि कौन सही है—और यही क्षण है जब सच टीम का रंग पहन लेता है।


जहाँ सत्य से पहले यह पूछा जाने लगे कि “मैं किसके साथ हूँ”, वहाँ विवेक गौण हो जाता है। यही प्रवृत्ति जब धर्म और आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश करती है, तो साधना भी खोज न रहकर पक्षपात बन जाती है। सत्य की ओर उन्मुख होने के बजाय, व्यक्ति अपने समूह, मत या गुरु-परंपरा की रक्षा में लग जाता है। यह संकट केवल राजनीति तक सीमित नहीं, बल्कि हर उस क्षेत्र में दिखाई देता है जहाँ पहचान, सत्य से ऊपर बैठ जाती है।


तारतम की यह चौपाई इसी मनोदशा को सटीक शब्द देती है—

जाहिर झूठा खेलहींहिरदे अति अंधेर।

कहें हम सांचे और झूठेयों फिरें उलटे फेर।

जब व्यक्ति अपने सीमित दृष्टिकोण को ही अंतिम सत्य मान लेता है, तो वही अज्ञान उसके हृदय का अंधकार बन जाता है। बाहर उसे सब कुछ स्पष्ट लगता है, पर भीतर विवेक की रोशनी मंद पड़ जाती है।


यह अवस्था अविकसित चेतना का संकेत है—जहाँ मेरा ही सत्य सही है की भावना स्वाभाविक संघर्ष को जन्म देती है। इस अंधकार में सापेक्ष सत्य को ही परम सत्य समझ लिया जाता है, और जैसे ही कोई अपने मत को पूर्ण घोषित करता है, संवाद रुक जाता है और टकराव आरम्भ हो जाता है।


सत्य का स्वभाव खोज है, न कि रक्षा। और जहाँ सत्य की जगह निष्ठा बैठ जाए—वहीं से विभाजन की रेखा खिंच जाती है।


5️⃣ त्वरित विजय का मोह: ‘कर के दिखा दिया’ की मानसिकता


“कर के दिखा दिया”—यह वाक्य बाहर से साहस और क्षमता का प्रतीक लगता है, पर भीतर अक्सर अहं की अधीरता छिपी होती है। त्वरित, बड़े और दिखावटी कदम तत्काल जीत का भ्रम देते हैं, लेकिन वे दीर्घकालिक शांति, स्थिरता और करुणा की कीमत पर लिए जाते हैं। यही वह बिंदु है जहाँ प्रभुत्व (domination) और नेतृत्व (leadership) के बीच की रेखा स्पष्ट होती है।


तारतम वाणी की यह चौपाई उसी मानसिकता को उजागर करती है—

“कई लोभें लिए लज्या लिए, कई लिए अहंकार।

यों छलें पीछे कई पटके, जो केहेते हम सिरदार।।१२।।

यहाँ ‘सरदार’ होने का दावा करने वाले लोग वास्तविक नेतृत्व से नहीं, बल्कि लोभ, लज्जा और अहंकार से संचालित हैं। वे सेवा, सीख और धैर्य से बचते हैं, क्योंकि उन्हें तुरंत श्रेष्ठ सिद्ध होना है। यही त्वरित विजय का मोह है—जहाँ दिखना, होना से बड़ा हो जाता है।


अगली चौपाइयाँ बताती हैं कि ऐसी मानसिकता का परिणाम क्या होता है—

“कोई जीते कोई हारे, हरख सोक न माय…”

जीत पर अति-हर्ष, हार पर गहरा शोक—यह संकेत है कि विजय चित्त की परिपक्वता नहीं, बल्कि अहं की पुष्टि बन गई है। जो हर दिशा जीत लेने को ही सफलता मानता है, वह बाहर तो ‘दिग्विजयी’ कहलाता है, पर भीतर अस्थिर रहता है।


यही कारण है कि ऐसे लोग आपस में भी लड़ते हैं—

“करें लड़ाइयां आप में, कहें हम हैं धाम के।”

जो स्वयं को ‘धाम का’ बताता है, वही जब उतावलेपन में उलझता है, तो संघर्ष को ही साधन बना लेता है। त्वरित परिणाम की भूख संवाद को समाप्त कर देती है, और शक्ति ही सत्य लगने लगती है।


इस पूरे प्रवाह का समाधान अंतिम चौपाई में स्पष्ट किया गया है—

“तुम आकले होए ना उरझियो… आकले काम सैतान के।”

उतावलापन यहाँ केवल गति नहीं, अविवेकपूर्ण जल्दबाज़ी का प्रतीक है। तारतम सिखाती है कि सही समय पर, विवेक के साथ किया गया कर्म ही स्थायी फल देता है। अधीरता से लिया गया निर्णय चाहे तुरंत ‘कामयाब’ दिखे, पर अंततः वह उलझन ही बढ़ाता है।


सरल शब्दों में, अहं को त्वरित विजय चाहिए — ताकि वह कह सके मैंने कर केदिखा दिया।” चेतना को दीर्घ दृष्टि चाहिए — ताकि परिणाम टिकाऊ, शीतल और मानवोचित हों।जो केवल जीत चाहता है, वह प्रभुत्व रचता है। जो समय, विवेक और करुणा को साथ रखता है—वही सच्चा नेतृत्व करता है। यही अंतर तारतम इन चौपाइयों के माध्यम से स्पष्ट करती है।


6️⃣ सच्ची सरदारी: सेतु बनाना है, सिंहासन पर बैठना नहीं


महामति प्राणनाथ के अनुसार सरदार का कार्य शासन करना नहीं, जोड़ना है। सरदार स्वयं केंद्र नहीं होता, वह दो केंद्रों के बीच सेतु होता है—धनी (परम उद्देश्य) और साथ (समूह) के बीच। यही भाव इस चौपाई में अत्यंत स्पष्ट रूप से व्यक्त हुआ है—


“साथ अंग सिरदार को, सिरदार धनी को अंग।

बीच सिरदार दोऊ अंग के, करे न रंग को भंग॥”

(ग्रंथकिरंतन, 95/9)


यहाँ ‘सरदार’ सिंहासन पर बैठा शासक नहीं, बल्कि एक bridge है—जो ऊपर के उद्देश्य और नीचे के जीवन को जोड़ता है, बिना किसी का रंग या स्वरूप बिगाड़े। सरदारी का अर्थ किसी को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि सबको जोड़कर दिशा देना है।


आधुनिक भाषा में यही Servant Leadership है, सेवाभावी नेतृत्व है—जहाँ नेता स्वयं को केंद्र नहीं बनाता, बल्कि समूह और उद्देश्य के बीच सेतु बनकर खड़ा रहता है। ऐसा नेतृत्व आदेश से नहीं, विश्वास से चलता है; भय से नहीं, सहभागिता से चलता है।


यही कारण है कि आज के मनोवैज्ञानिक और संगठनात्मक शोध भी यही संकेत देते हैं—जो नेता विनम्र, सहानुभूतिशील और सेवा-भावी होते हैं, वे संकट के समय अधिक स्पष्ट, संतुलित और दीर्घदर्शी निर्णय लेते हैं। क्योंकि उनका ध्यान अपनी छवि बचाने पर नहीं, सामूहिक भलाई पर होता है।


इसी संदर्भ में प्रभुत्व बनाम नेतृत्व का सबसे केंद्रीय अंतर उभरता है। प्रभुत्व कहता है— यह मेरा क्षेत्र है। नेतृत्व कहता है— यह हमारा साझा दायित्व है। प्रभुत्व केंद्र बनाता है—सब कुछ उसी के चारों ओर घूमे। नेतृत्व सेतु बनाता है—ताकि सब एक-दूसरे तक पहुँच सकें।


और सेतु केवल बाहरी संरचना नहीं होता। सच्चा सेतु पहले मनुष्य को स्वयं से जोड़ता है—उसकी शक्ति को उसकी करुणा से, उसकी भूमिका को उसके उद्देश्य से, और उसके अधिकार को उसकी जिम्मेदारी से। यही सेतु परिवारों को जोड़ता है, संस्थाओं को स्थिर करता है, और राष्ट्रों को टिकाऊ बनाता है।


इसलिए सच्ची सरदारी सिंहासन पर आसीन होने का नाम नहीं—वह है बीच में खड़े होकर सबको जोड़ने का साहस।


7️⃣ सहयोग का विस्मरण: अकेले ‘मैं’ का भ्रम


यह धारणा कि मैं अकेला पर्याप्त हूँ शक्ति का नहीं, अलगाव का संकेत होती है। समग्रता कभी अकेलेपन से जन्म नहीं लेती—वह सहयोग से प्रकट होती है। अहंकार स्वयं को अलग और पूर्ण मानने की चेष्टा करता है, जबकि तारतम का मूल सूत्र इसके ठीक विपरीत है—अंग–अंगी भाव। यहाँ कोई भी पूर्ण अकेला नहीं होता; प्रत्येक अंग तभी अर्थवान है, जब वह अंगी से जुड़ा हो।


इसी सत्य की ओर संकेत करती है यह चौपाई—

“हकीकत ए समझियो… सब मिल क्यों न होत तैयार।” जब व्यक्ति माया से ऊब जाता है, तो वह उतावलेपन में यह प्रश्न करने लगता है कि काम तुरंत क्यों नहीं होता और सब एक साथ क्यों नहीं जागते। यह अधीरता दरअसल उसी अकेले ‘मैं की मानसिकता से उपजती है—जो प्रक्रिया, सहयोग और सामूहिक परिपक्वता को अनावश्यक विलंब मानती है।


बीतक इसके विपरीत यह स्पष्ट करती है कि समाधान अकेले नहीं, साथ बैठकर निकलता है—“जवाब न आवे उनको… तब सब मिलके विचारहीं।” जब व्यक्तिगत बुद्धि सीमा पर पहुँच जाती है, तब सामूहिक विवेक जन्म लेता है। यहाँ मिलकरसोचना कमजोरी नहीं, बल्कि चेतना की अगली अवस्था है।


जहाँ यह सहयोग टूटता है, वहाँ उसका परिणाम भी स्पष्ट दिखाया गया है— “ए तो बुरे वैरागी… इनकी निंदा कीजिए।” जब ‘हम’ का भाव लुप्त हो जाता है, तो मसलत (विचार-विमर्श) की जगह निंदा और दोषारोपण ले लेते हैं। यही वह क्षण है जहाँ अहंकार सहयोग को खतरा समझने लगता है—क्योंकि सहयोग में नियंत्रण साझा होता है।


तारतम वाणी यह भी स्पष्ट करती है कि भक्ति, निर्णय और दिशा—तीनों का आधार सामूहिक उपस्थिति होना चाहिए। यहाँ ‘मैं’ साधना नहीं करता—‘हम’ साधना करता है। और इसी कारण माया की शक्ति वहाँ टिक नहीं पाती— “हम सब मिल मोमिन बैठेंगे… माया क्या कर लेगी।”


तारतम वाणी और बीतक केवल भावनात्मक या आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं हैं—वे एक एकीकृत कार्य-पद्धति भी सिखाते हैं। बार-बार आता है यह सूत्र—आपस मेंमसलत करीसब मिल बैठकर विचार करना, और अंत में यह स्पष्ट निर्देश—“बिना मसलत, जिन करो कोई काम।” अर्थात् बिना साझा विवेक के किया गया कोई भी कार्य, चाहे कितना ही उचित दिखे, अपूर्ण रहता है।


निष्कर्ष: अकेला मैं तेजी चाहता है, पर गहराई नहीं।साझा हम भले धीरे चले, पर दिशा सही रखता है। अहंकार कहता है— मैं जानता हूँ।तारतम वाणी कहती है— आओमिलकर देखेंभूल कहाँ है। इसीलिए सच्ची शक्ति अलग खड़े होने में नहीं, साथ बैठकर सोचने में है।और यही सहयोग—व्यक्ति, समाज और साधना को—वास्तविक समग्रता तक ले जाता है।


8️⃣ वर्तमान पर लौटने का आमंत्रण

वास्तविक दुनिया के सहज, जीवंत समुदाय मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिकता के लिए अधिक पोषक सिद्ध हुए हैं। वहाँ देह-उपस्थिति है, आँखों का संपर्क है, मौन की जगह है—और मतभेद के बीच भी मनुष्य बने रहने की गुंजाइश है। 


इसके विपरीत, जब लोग अपना बहुत अधिक समय ऑनलाइन बिताने लगते हैं, तो वे धीरे-धीरे एक अलग ही दुनिया में रहने लगते हैं। यह वह दुनिया है जहाँ संवाद कम और प्रतिक्रिया अधिक होती है, जहाँ समझ की जगह उत्तेजना ले लेती है।


इस आभासी संसार में व्यक्ति अक्सर पहले से ज़्यादा क्रोधितकड़वा और विभाजनकारी होता चला जाता है। ऑनलाइन माहौल यह भ्रम पैदा करता है कि हम “सच” के लिए लड़ रहे हैं, जबकि भीतर-ही-भीतर हम अपने गुस्से, असुरक्षा और पहचान-भ्रम को ही पोषित कर रहे होते हैं। धीरे-धीरे सामने मनुष्य नहीं, केवल प्रोफ़ाइल, लेबल और विरोधी दिखाई देने लगते हैं। यही आज की स्थिति है—जहाँ प्रश्न पूछने की जिज्ञासा नहीं रहती, केवल प्रतिक्रिया करने की उतावली बची रहती है।


“People who spend a lot of time online are increasingly occupying a different world… angrier, more bitter, more divisive.”


यह स्थिति हमें सावधान करती है कि ऑनलाइन समय बढ़ने के साथ अंतर-मन की सजगता घट सकती है—और यदि चेतना न जागे, तो समाज संवाद नहीं, टकराव पैदा करता है।


ऐसे में एक प्रश्न स्वाभाविक है: हम यहाँ तक कैसे पहुँचे?” पर उससे भी अधिक आवश्यक प्रश्न यह सामने आता है: “हम अभी कहाँ खड़े हैं?” क्योंकि जब तक वर्तमान अवसर स्पष्ट नहीं होता, तब तक छिपी संभावनाएँ प्रकट नहीं होतीं और अतीत की व्याख्या भी भ्रम बन जाती है।


यही बोध हमें यह चौपाई देती है—

“पीछे पछतावा क्या करे, जब गया समया चल।

ऐसे क्यों भूलें अंकूरी, जाके सांचे घर नेहेचल।।११।। ”

अर्थात् जब स्वर्णिम अवसर निकल जाएगा, तब पछतावे का कोई लाभ नहीं। जो चेतना अपनी सच्चाई को पहचानती है, वह इस अवसर को नहीं भूलती। भूल केवल वहीं होती है जहाँ वर्तमान से कटाव होता है—और पकड़ केवल वहीं बनती है जहाँ अभी को देखा-जिया जाता है।


यहीं से साक्षीभाव की वापसी शुरू होती है—यहीं से सुधार संभव होता है। जैसा कि एक और चौपाई स्मरण कराती है—

“संभारो साथ अवसर आयो हैं हाथ जी।”

अर्थात् यह क्षण ही वह द्वार है—जहाँ से हम ऑनलाइन उत्तेजना से हटकर, वास्तविक दुनिया, सहज समुदाय और मानवीय संवाद की ओर लौट सकते हैं। अब नहीं तो फिर कब? 


9️⃣ निजी जीवन में भी सत्ता की भाषा


उदाहरण के तौर पर एक साधारण-सा वाक्य, जो आज के समय में प्रासंगिक है, बहुत कुछ खोल देता है— “मुझे अब यह छोड़ना होगा—अपने बच्चों को उपदेश देना, उन्हें लगातार समझाते रहना, और यहाँ तक कि अपनी 79 वर्ष की माँ को भी यह बताने की प्रवृत्ति कि क्या सही है और क्या नहीं।”


यह वाक्य सत्ता या राजनीति का नहीं है, फिर भी इसमें वही गहरी मानसिकता झलकती है—उपदेश देना, नियंत्रित करना और स्वयं को सही सिद्ध करने की आदत। यही प्रवृत्तियाँ जब सत्ता में उतरती हैं तो तानाशाही कहलाती हैं, और जब रिश्तों में उतरती हैं तो प्रेम को बोझ बना देती हैं। बच्चे हों या वृद्ध माता—जहाँ संवाद की जगह उपदेश ले लेता है, वहाँ संबंध धीरे-धीरे श्वास लेना बंद कर देते हैं।


इसलिए यह बोध सदा जीवित रहना चाहिए कि जहाँ प्रेम है, वहाँ आदेश की आवश्यकता नहीं होती; जहाँ करुणा है, वहाँ नियंत्रण अपने-आप ढीला पड़ जाता है; और जहाँ साक्षीभाव है, वहाँ “मैं सही हूँ” की ज़िद गल जाती है। 


ऑनलाइन आक्रोश, टूटते समुदाय और घरों के भीतर का सूक्ष्म नियंत्रण—इन सभी प्रसंगों का सार यही है कि नेतृत्व पद नहीं, चेतना की अवस्था है। यह शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व का विस्तार है।


जब नैतिकता केवल भाषा बन जाए, संसाधन लक्ष्य बन जाएँ और सत्य की जगह निष्ठा ले ले, तब कोई भी व्यवस्था, कोई भी धर्म, कोई भी नेतृत्व सेतु नहीं रहता—सिंहासन बन जाता है। और यहीं महामति की चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है—सरदारी पद नहीं, प्रक्रिया है; अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है। वही नेतृत्व टिकता है जो स्वयं को घटाकर समग्र चेतना को बढ़ा दे—जो घर से शुरू होकर समुदाय में परिपक्व हो और समाज को विभाजन से नहीं, संवाद से जोड़े


निष्कर्ष: विखंडन का उपचार अधिक शोर नहीं—अधिक विवेक है। तारतम वाणी सिखाती है कि सत्य की रक्षा नहीं, सत्य की खोज करो; शक्ति का प्रदर्शन नहीं, संतुलन साधो; नेता बनकर ऊपर मत बैठो, सेतु बनकर बीच में खड़े रहो; और ‘मैं’ की उतावली छोड़कर ‘हम’ की मसलत-युक्त, धीमी पर सही चाल अपनाओ।


यही यात्रा है—विखंडित यथार्थ से एकीकृत चेतना तक।


सदा आनंद मंगल में रहिए 

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