सत्य से चुभन क्यों होती है? — प्रतिक्रिया, प्रक्षेपण और संबंध की पुनर्स्थापना

सत्य से चुभन क्यों होती है? — प्रतिक्रिया, प्रक्षेपण और संबंध की पुनर्स्थापना

(महामति प्राणनाथजी की तारतम वाणी के प्रकाश में)

महामति प्राणनाथ जी की तारतम वाणी मानव चेतना के उस अधूरेपन को पूर्ण करने का दिव्य प्रयत्न है, जहाँ मनुष्य सत्य को जान तो लेता है, पर सहन नहीं कर पाता।

यह अधूरापन बौद्धिक नहीं, बल्कि संबंधात्मक (relational) है — सत्य से हमारा संबंध टूट गया है।

तारतम वाणी कहती है—
"आज सांच केहेना सो तो काहू ना रुचे,
तो भी कछुक प्रकासूं सत।
सत के साथी को सत के बान चूभसी,
दुष्ट दुखासी दुरमत।
अखंड सुख लागियो।।"

इस चोपाई में केवल युग-वर्णन नहीं, बल्कि मानव मन की सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक स्थिति का उद्घाटन है।

सत्य अप्रिय क्यों लगता है?
आज के युग में जब कोई हमें ऐसा सत्य कह देता है जो हमारी बनी-बनाई छवि, अहं-रक्षा या आत्म-कथा से मेल नहीं खाता, तो भीतर तुरंत प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है— क्रोध, तर्क, अस्वीकार, या चुप्पी।

यह प्रतिक्रिया सत्य के विरुद्ध नहीं होती।
यह उस भीतरी हिस्से की रक्षा होती है, जिससे हमारा संवाद अभी टूटा हुआ है।

महामति स्पष्ट करते हैं— सत्य स्वयं कष्टदायक नहीं है। कष्ट इस बात का संकेत है कि सत्य से हमारा संबंध सुरक्षित नहीं रहा।

"सत के साथी" और "दुरमत" का अंतर

चोपाई दो प्रकार की चेतना दिखाती है—
1. सत के साथी: जिनके भीतर सत्य के लिए स्थान है।उनके लिए सत्य "मधुर बाण" है— चुभता जरूर है, पर जाग्रत करता है।
2. दुरमत (भ्रमित बुद्धि): जिनकी पहचान, अहं या डर सत्य से बँधी हुई नहीं है।उनके लिए वही सत्य पीड़ा बन जाता है

यहाँ तारतम यह नहीं कहती कि कोई व्यक्ति अच्छा या बुरा है।यह कहती है कि किसका सत्य से संबंध जीवित है और किसका टूटा हुआ।

प्रतिक्रिया दोष नहीं है, पर टूटे हुए संबंध का संकेत है। आधुनिक भाषा में जिसे हम reactivity कहते हैं, तारतम उसे दुरमत की अवस्था कहती है।

जब कोई हमें सच कहता है और हम विचलित हो जाते हैं, तो वास्तव में— कोई दबा हुआ डर छू गया है। कोई अस्वीकार्य कमजोरी उजागर हुई है। या कोई ऐसा गुण सामने आ गया है, जिसे हमने स्वयं में स्वीकार नहीं किया है। इसलिए मन सत्य को नहीं, उससे उपजे असहज संपर्क को अस्वीकार करता है।

समाधान: सत्य को ठीक करना नहीं, उससे उपजे असहज संबंध को ठीक करना

महामति का मार्ग यह नहीं है कि— सत्य को मीठा बना दिया जाए या लोगों को खुश रखने के लिए छुपा दिया जाए। वे कहते हैं— "तो भी कछुक प्रकासूं सत", अर्थात् थोड़ा-सा भी सत्य-प्रकाश आवश्यक है।

पर यह प्रकाश तभी अखंड सुख देता है, जब भीतर यह भाव हो—"यह सत्य मेरे अस्तित्व को नष्ट नहीं करता, बल्कि मुझे अधिक पूर्ण बनाता है।"

तारतम-दृष्टि से व्यवहारिक साधना:
जब अगली बार कोई अप्रिय सत्य सुनकर प्रतिक्रिया उठे, तो इतना करें:
  1. तुरंत प्रतिक्रिया न करें (भाव को नहीं, क्रिया को रोकें)
  2. भीतर पूछें—"मेरे भीतर कौन-सा भाग असुरक्षित हो गया?"
  3. मन में कहें—"यह अनुभव चेतना में रहने योग्य है, भले ही कर्म में उतरे।"

यही सत के साथी बनने की पहली सीढ़ी है।

अखंड सुख का रहस्य:
चोपाई का अंतिम वाक्य अत्यंत महत्वपूर्ण है—
"अखंड सुख लागियो"

अखंड सुख तब नहीं आता जब कोई हमें चुनौती न दे या कोई सच न बोले। अखंड सुख तब आता है जब सत्य से हमारा संबंध पुनः स्थापित हो जाता है। तब सत्य के बाण शत्रु नहीं लगते, प्रकाश बन जाते हैं।

निष्कर्ष: तारतम वाणी हमें यह नहीं सिखाती कि
"सच सुनो और सह लो"। वह सिखाती है—
सत्य के साथ जीवित संबंध बनाओ।

जहाँ सत्य से संबंध है, वहाँ चुभन नहीं। जहाँ सत्य से संबंध है, वहाँ प्रतिक्रिया नहीं— वहाँ जागनी है।
और यही महामति प्राणनाथजी का दिव्य प्रयत्न है।
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