क्षमा का अर्थ: क्रोध से जागरण तक, और जागरण से करुणा तक।
मनुष्य का क्रोध प्रायः किसी एक घटना से नहीं, बल्कि लंबे समय तक संचित अस्वीकृति, भय और अपमान से जन्म लेता है। जब सामाजिक अन्याय, राजनीतिक कठोरता या व्यक्तिगत पीड़ा बार-बार हमारी चेतना को आहत करती है, तब भीतर एक स्थायी रोष आकार लेने लगता है। यह रोष हमें सजग तो बनाता है, पर धीरे-धीरे वही हमारी पहचान भी बनने लगता है। यहीं सबसे सूक्ष्म संकट उत्पन्न होता है—जब हम अन्याय के विरोध में नहीं, बल्कि क्रोध के सहारे जीने लगते हैं।
आज के समय में क्रोध केवल व्यक्तिगत भावना नहीं रहा, वह एक सामाजिक मुद्राबन गया है। धर्म के मंचों से, प्रवचनों में, सोशल मीडिया की पोस्टों और वीडियो क्लिप्स में, यहाँ तक कि "सत्य" और "न्याय" के नाम पर भी, क्रोध को चेतना का प्रमाण समझ लिया गया है। ऐसे धर्म-प्रचारकों, आचार्यों, स्वामियों, संतों, नेताओं, डिजिटल मंचों के संचालकों और तथाकथित सुंदरसाथ की संख्या अपार हो गई है, जो अपने अस्तित्व को किसी न किसी विरोध, आक्रोश या शत्रु-छवि के सहारे टिकाए हुए हैं। उनके शब्दों में उत्तेजना है, स्वर में कटुता है और श्रोताओं में क्षणिक जोश है—पर भीतर कहीं स्थिर बोध का अभाव दिखाई देता है।
तारतम ज्ञान इस प्रवृत्ति को अत्यंत सूक्ष्म रूप से पहचानता है। वह कहता है कि जब क्रोध साधन बन जाता है, तब साध्य खो जाता है। जो चेतना दूसरों के अंधकार से ऊर्जा ग्रहण करती है, वह स्वयं प्रकाश नहीं बन सकती। ऐसा धर्म, ऐसा नेतृत्व और ऐसी साधना अंततः प्रतिक्रिया का विस्तार बन जाते हैं, रूपांतरण का माध्यम नहीं।
इसी संदर्भ में मिहिरराज जी का आचरण एक जीवित दृष्टान्त बनकर सामने आता है। बिहारी जी द्वारा बार-बार अन्यायी व्यवहार होने के बावजूद मिहिरराज जी ने कभी भी बिहारी जी के क्रोध के सहारे जीवन नहीं जिया। उन्होंने न तो अपने आत्मबोध को शिकायत की आग में झोंका, न ही अपने सत्य को विरोध की तलवार बनाया। उनका मौन पलायन नहीं था, और उनकी सहनशीलता कमजोरी नहीं थी। वह एक ऐसी चेतना का परिचय था जो जानती थी कि अन्याय का उत्तर क्रोध से नहीं, स्थिर बोध से दिया जाता है।
मिहिरराज जी ने यह नहीं कहा कि अन्याय नहीं हुआ; उन्होंने यह भी नहीं कहा कि पीड़ा असत्य है। पर उन्होंने अपनी पहचान उस पीड़ा से नहीं गढ़ी। तारतम की भाषा में कहें तो—उन्होंने प्रतिक्रिया को साधना नहीं बनाया। यही कारण है कि उनका जीवन विरोध की कथा नहीं, बल्कि अंतःस्थ स्वराज्य की अभिव्यक्ति बन गया। जहाँ क्रोध व्यक्ति को बाहर की ओर खींचता है, वहीं बोध उसे भीतर स्थापित करता है।
आज जब धर्म और विचारधाराएँ लोगों को उकसाने में अधिक और जगाने में कम रुचि ले रही हैं, तब मिहिरराज जी का उदाहरण हमें स्मरण कराता है कि वास्तविक अध्यात्म शोर नहीं करता। वह क्रोध की भीड़ नहीं जुटाता, बल्कि चेतना की शांति में भरोसा रखता है। जो क्रोध के सहारे जीता है, वह किसी न किसी रूप में अपने विरोधी का ही विस्तार बन जाता है। और जो बोध के सहारे जीता है, वह विरोध के बीच भी स्वतंत्र रहता है।
इसलिए स्मरण रखना आवश्यक है—क्रोध से ऊर्जा मिल सकती है, पर दिशा नहीं। दिशा केवल उसी चेतना से आती है जो दूसरे के अज्ञान को भी अपनी यात्रा का एक चरण समझ सके। यही तारतम का मर्म है, और यही मिहिरराज जी के जीवन का मौन उपदेश।
तारतम ज्ञान इस स्थिति को बाहरी संघर्ष की नहीं, बल्कि अंतःचेतना के ठहराव की अवस्था मानता है। जब चेतना किसी विरोध से स्वयं को परिभाषित करने लगती है, तब वह आगे नहीं बढ़ती, केवल प्रतिक्रिया करती है।
कल्पना कीजिए यदि मिहिरराज जी की अंतःचेतना यदि बिहारीजी की फरियादों में ही ठहर गई होती तो क्या उन्हें दर्शन हुए होते? क्या उन के श्री मुख से ब्रह्म वाणी अवतरित हुई होती? कदापि नहीं।
एक उदाहरण: जैसे एक पुत्र अपने पिता की बुराइयों और विफलताओं से स्वयं को अलग सिद्ध करके जीवन गढ़ता है। पिता का जीवन हिंसा, नशा और पलायन से भरा रहा; पुत्र ने इस से विपरीत अच्छा सा परिवार बनाया, संयम चुना, जिम्मेदारी निभाई। बाहर से यह नैतिक उन्नति दिखती है, पर भीतर कहीं यह उन्नति पिता के विरोध से पोषित होती है। वह अच्छाई की ओर नहीं दौड़ रहा होता, बल्कि अंधकार से दूर भाग रहा होता है। इस प्रकार पिता का पतन ही पुत्र की पहचान का आधार बन जाता है।
जब ऐसा पिता वर्षों बाद क्षमा माँगता है, तब यह क्षमा पुत्र को राहत देने के बजाय विचलित कर देती है। क्योंकि यदि पिता बदल सकता है, तो पुत्र का नैतिक सिंहासन हिल जाता है। अब वह "अच्छा" केवल तुलना से नहीं रह जाता।
तारतम दृष्टि में यह क्षण अत्यंत महत्त्वपूर्ण है—यहाँ अहं का मुखौटा उतरता है। क्षमा माँगने वाला व्यक्ति नहीं बदलता, बल्कि क्षमा करने वाले की चेतना बदलने को बाध्य होती है। इसलिए क्षमा कठिन है। वह हमें अपनी प्रतिक्रियात्मक पहचान छोड़ने के लिए विवश करती है और एक सकारात्मक, स्वतंत्र जीवन-दृष्टि गढ़ने को कहती है।
याद करें, बिहारीजी या उन के साथियों ने कभी भी क्षमा नहीं माँगी। फिर भी श्री मिहिरराज जी ने स्वयं की भलाई हेतु, कभी भी प्रतिक्रियात्मक पहचान नहीं बनने दी।
यही बोध दूसरे एक दृष्टान्त से और अधिक स्पष्ट होगा। एक ओर मृत प्राणियों की खाल निकाल कर बेचने वाला विनम्र शुद्ध दिल वाला चण्डाल है, और दूसरी ओर सभी कर्मकांडों को नियमानुसार पालनेवाला ब्राह्मण है।
ये दोनों परमात्मा के सामने खड़े हैं। ब्राह्मण अपने नियम, उपवास और धर्म कार्य की सूची रखता है। वह परमात्मा से नहीं, अपने ही कर्म -पुण्य से संवाद कर रहा होता है। उसका धर्म एक सूक्ष्म अहं का विस्तार - उस की पहचान बन चुका है। दूसरी ओर चाण्डाल अपने कर्मों को छिपाता नहीं है, पर उनसे स्वयं को सही ठहराने का प्रयास भी नहीं करता है। वह केवल इतना स्वीकार करता है कि वह भटका हुआ है और उसे हल्की कोटि के काम करने पड़ते हैं।
तारतम ज्ञान कहता है कि चाण्डाल का यही भीतरी स्वीकार चेतना जागृति का पहला द्वार है। जहाँ स्वयं को सही मानने की जिद समाप्त होती है, वहीं से आत्मबोध आरंभ होता है।
इन दोनों दृष्टान्तों का साझा सूत्र यह है कि परमात्मा या सत्य को बाहरी कर्म नहीं, भीतरी अवस्था दिखती है। जो स्वयं को दोषमुक्त मानता है, वह बदल नहीं सकता। और जो अपनी सीमाओं को देख लेता है, वही परिवर्तन के योग्य होता है। इसलिए चांडाल मुक्त होता है, और कर्मकांडी पहचान बनाया ब्राह्मण अपने पुण्य की पहचान -गर्व में ही बँधा रह जाता है।
इसी प्रकार ऊपर दर्शाये दुराचारी पिता को क्षमा करने वाला पुत्र स्वयं मुक्त होता है—पिता नहीं।
आज के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में भी यही संकट व्यापक रूप में दिखाई देता है। अन्याय, दमन और असंवेदनशीलता के विरुद्ध उठता हुआ क्रोध धीरे-धीरे हमारे भीतर एक सामूहिक पहचान बनता जा रहा है। लोग एक-दूसरे से आशा के आधार पर नहीं, बल्कि घृणा के साझा भाव से जुड़ रहे हैं।
तारतम ज्ञान चेतावनी देता है कि ऐसा प्रतिक्रियात्मक पहचान वाला समुदाय परिवर्तन नहीं, केवल ध्रुवीकरण पैदा करता है। क्रोध चेतना को जगाता है, पर उसमें टिक -ठहर जाना चेतना को कठोर अवश्य बना देता है। यही तो खेल में खेल चल रहा है।
क्षमा का अर्थ यहाँ अन्याय को स्वीकार करना नहीं है। तारतम में क्षमा का अर्थ है—यह जानना कि अज्ञान अंतिम सत्य नहीं है। हर आत्मा एक यात्रा पर है, और कोई भी अवस्था स्थायी नहीं। जब हम यह संभावना जीवित रखते हैं कि दूसरा कभी बदल भी सकता है, तभी हमारी चेतना भी जड़ नहीं होती। क्षमा हमें नैतिक ऊँचाई नहीं, आत्मिक विस्तार देती है। अंततः प्रश्न यह नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत, बल्कि यह है कि हमारी चेतना किस पर टिक रही है—द्वेष पर या बोध पर।
यदि हम केवल प्रतिक्रिया में जीते हैं, तो चाहे हम कितने ही न्यायप्रिय क्यों न हों, ब्रह्म वाणी का जोरशोर से प्रचार सफलतापूर्वक कर भी रहे हो, भीतर से थकते और कठोर होते चले जाते हैं। पर यदि हम बोध के साथ खड़े होते हैं—स्पष्टता, करुणा और धैर्य के साथ—तो हम न केवल दूसरों के लिए, बल्कि स्वयं के लिए भी एक नई संभावना खोलते हैं।
यही तारतम का क्षमा मार्ग है—क्रोध से जागरण तक, और जागरण से करुणा तक।
सदा आनंद मंगल में रहिए
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