समग्रता के बिना शक्ति : तारतम दृष्टि से अमेरिका का आत्मपरीक्षण
समग्रता के बिना शक्ति : तारतम दृष्टि से अमेरिका का आत्मपरीक्षण : एक आध्यात्मिक–नैतिक चिंतन
आज हम एक ऐसे समय में खड़े हैं, जब राष्ट्रों की शक्ति का मापन प्रायः सैन्य सामर्थ्य, आर्थिक वृद्धि और तकनीकी विस्तार से किया जाता है। अमेरिका इस दृष्टि से स्वयं को "नंबर वन" मानता रहा है—और कई क्षेत्रों में वह है भी।
किन्तु उसी समय, सामान्य नागरिक के जीवन में स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा, सामाजिक भरोसे और मानसिक शांति के स्तर पर गिरावट स्पष्ट दिखाई देती है।
यह विरोधाभास केवल राजनीतिक नहीं है। यह सभ्यतागत है।
1. मूल प्रश्न : प्रगति किसके लिए?
आधुनिक व्यवस्था प्रगति को प्रायः इन शब्दों में परिभाषित करती है—
- अधिक उत्पादन
- अधिक शक्ति
- अधिक गति
परंतु आध्यात्मिक दृष्टि एक भिन्न प्रश्न पूछती है:
क्या यह प्रगति जीवन को गहरा बना रही है, या केवल व्यवस्था को बड़ा?
समग्र (Integral) दृष्टिकोण हमें स्मरण कराता है कि कोई भी समाज तभी स्वस्थ होता है, जब उसका विकास चारों स्तरों पर संतुलित हो—
- व्यक्ति का अंतर्जगत (बोध, मूल्य, विवेक)
- व्यक्ति का बाह्य जीवन (स्वास्थ्य, कौशल)
- सामूहिक संस्कृति (विश्वास, संवाद, नैतिकता)
- सामाजिक तंत्र (नीतियाँ, संस्थाएँ)
जब इनमें से केवल एक—जैसे शक्ति या पूँजी—अत्यधिक बढ़ जाती है, और शेष उपेक्षित रह जाते हैं, तब असंतुलन जन्म लेता है।
2. तारतम ज्ञान की चेतावनी : शक्ति का अनुशासन आवश्यक है
महामति परंपरा में यह बात अत्यंत स्पष्ट कही गई है। Mahamati Prannath के तारतम ज्ञान में शक्ति को कभी भी स्वतंत्र नहीं छोड़ा गया।
शक्ति का धर्म है—सेवा।
शक्ति का मार्गदर्शक है—बोध।
जब शक्ति बोध से कट जाती है, तब—
- समृद्धि करुणा खो देती है
- अधिकार उत्तरदायित्व से अलग हो जाता है
- स्वतंत्रता आत्मकेंद्रितता बन जाती है
यह स्थिति उन्नति नहीं, विकृति है।
3. जीडीपी बढ़े, पर जीवन-गुणवत्ता क्यों गिरे?
आज अमेरिका जैसे देश अत्यधिक संपन्न हैं, फिर भी—
- स्वास्थ्य सेवाएँ सब तक नहीं पहुँचतीं
- शिक्षा असमान हो जाती है
- सामाजिक भरोसा टूटता है
- मानसिक तनाव और अकेलापन बढ़ता है
तारतम भाषा में यह है—रसहीन समृद्धि।
जहाँ धन तो है, पर जीवन में रस नहीं।
जहाँ साधन तो हैं, पर संतुलन नहीं।
सच्ची समृद्धि वह है, जो समाज के अंतिम व्यक्ति तक मंगल बनकर पहुँचे।
4. बढ़ता असंतोष : एक आध्यात्मिक संकेत
आज समाज में जो क्रोध, ध्रुवीकरण और सरल उत्तरों की भूख दिखाई देती है, उसे केवल राजनीति से समझना अधूरा है।
यह दरअसल एक अंतरिक असुरक्षा का संकेत है।
तारतम दृष्टि कहती है—जब भीतर का संतुलन टूटता है, तब मनुष्य बाहर कठोर सहारे खोजता है।
यह व्यक्तिगत दोष नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना की थकान है।
5. अंग–अंगी भाव की विस्मृति
तारतम का मूल सूत्र है—अंग–अंगी भाव।
कोई भी अंग तब तक स्वस्थ नहीं रह सकता, जब तक पूरा शरीर संतुलित न हो।
जब समाज केवल कुछ वर्गों की सफलता को विकास मान लेता है, और शेष को पीछे छोड़ देता है, तब अंग पीड़ित होता है—और अंततः अंगी भी दुर्बल हो जाता है।
6. समाधान क्या है?
समाधान न तो केवल सत्ता परिवर्तन में है, न ही नारों में।
समाधान है—प्राथमिकताओं के पुनर्संतुलन में।
- बच्चों, शिक्षा और कौशल में निवेश
- स्वास्थ्य और नशा-उपचार को नैतिक दायित्व मानना
- संवाद, भरोसे और सामुदायिक भावना का पुनर्निर्माण
- ऐसी संस्थाएँ, जो केवल लाभ नहीं, बल्कि जीवन की सेवा करें
यही धर्म का सामाजिक रूप है।
7. उपसंहार
अमेरिका की चुनौती शक्ति की कमी नहीं है।
चुनौती है—शक्ति का उद्देश्य भूल जाना।
शक्ति जीवन की रक्षा के लिए थी, न कि जीवन को कुचलने के लिए। समृद्धि समाज को उठाने के लिए थी,
न कि उसे बाँटने के लिए।
तारतम की भाषा में—शक्ति जब सेवा से जुड़ी रहती है, तब वह मंगल बनती है। और जब वह सेवा से कट जाती है, तब वही शक्ति बोझ बन जाती है।
आज आवश्यकता है भय या गर्व की नहीं, बल्कि बोध, करुणा और समन्वय की—ताकि हम एक असंतुलित युग में
संतुलित जीवन का साक्षात उदाहरण बन सकें।
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