सोशल मीडिया पर: “अब मरजादा चलियो”


सोशल मीडिया पर: "अब मरजादा चलियो" — तारतम वाणी के विवेक के आलोक में


"सोशल मीडिया को सत्संग न बनाएं" — इस शीर्षक का अर्थ यह नहीं है कि सोशल मीडिया अपने आप में कोई बुरी या निषिद्ध वस्तु है। इसका आशय यह है कि जिस प्रकार बिना सोचे-समझे, अत्यधिक और अनियंत्रित बोलते रहने वाले व्यक्ति के शब्द अर्थहीन ही नहीं, बल्कि कई बार व्यापक रूप से हानिकारक भी सिद्ध हो जाते हैं, उसी प्रकार सोशल मीडिया की प्रकृति भी सत्संग जैसी नहीं होती। वहाँ थोड़ी-सी जल्दबाज़ी, भावावेश या बेहोशी एक बड़े सामाजिक, वैचारिक या कानूनी संकट का कारण बन सकती है।


सत्संग की अपनी एक मर्यादा होती है—वहाँ शांति होती है, संदर्भ स्पष्ट होता है, गुरु-परंपरा का अनुशासन होता है, श्रोताओं की पात्रता का ध्यान रखा जाता है और बोलने वाले की प्रत्यक्ष उत्तरदायित्व-भावना बनी रहती है। इसके विपरीत सोशल मीडिया में त्वरित प्रतिक्रिया, अधूरा संदर्भ, काट-छाँट (editing), ट्रोलिंग और ध्रुवीकरण बहुत सहज रूप से हो जाता है। इसलिए जो बात सत्संग में भी पात्र-काल-देश का विवेक रखकर कही जाती है, उसे डिजिटल मंच पर तो और भी अधिक सावधानी से रखने की आवश्यकता होती है।


बीतक वाणी में श्री प्राणनाथ जी की पत्री का यह विवेक निम्न चौपाई में अत्यंत स्पष्ट रूप से व्यक्त हुआ है—


"कोई लड़काई बुध सों, राखियो नही सोहबत।

भारी कर बुलाइयो, जब तुमें पूछें इत।।"


इस चौपाई का भाव यह है कि चंचल, अस्थिर या प्रतिक्रिया-प्रधान बुद्धि से अनावश्यक संगति नहीं करनी चाहिए। जो व्यक्ति सुनने के लिए नहीं, बल्कि उलझाने या जीतने के लिए संवाद करता है, उससे दूरी बनाए रखना भी साधना का अंग है। सोशल मीडिया पर ऐसे ही चंचल संवाद बहुतायत में मिलते हैं, जहाँ प्रश्न जिज्ञासा से नहीं, उकसावे से जन्म लेते हैं। ऐसे में मौन या संयम रखना कमजोरी नहीं, बल्कि प्रज्ञा का संकेत है।


चौपाई का दूसरा भाग—"भारी कर बुलाइयो"—यह सिखाता है कि जब बोलना आवश्यक हो, तब वाणी हल्की, उत्तेजित या अपमानजनक न हो, बल्कि गंभीर, मर्यादित और संतुलित हो। और "जब तुमें पूछें इत" यह स्पष्ट करता है कि सत्य को थोपना नहीं है; जो पूछा जाए, वही कहा जाए। बिना आमंत्रण के, बिना संदर्भ के, भारी विषयों को सार्वजनिक मंचों पर उछालना तारतम की मर्यादा के विरुद्ध है।


इसी संदर्भ में वाक्य "डिजिटल मंचों पर संयम रखें—हर बात सार्वजनिक करने योग्य नहीं होती" का भाव और भी स्पष्ट हो जाता है। इसका अर्थ यह है कि हर सत्य सार्वजनिक नहीं होता। कुछ बातें अध्ययन-चर्चा की होती हैं, कुछ केवल साधकों या शिक्षकों के बीच की होती हैं, और कुछ निजी आत्मचिंतन की। इसी प्रकार हर संदर्भ हर मंच के लिए उपयुक्त नहीं होता—ऐतिहासिक तुलना, धर्म-तुलना, तीखे शब्द या संवेदनशील उद्धरण ऑनलाइन रखने से बिना संदर्भ के उनका अर्थ विकृत हो सकता है।


साथ ही, हर भावना तुरंत पोस्ट करने योग्य नहीं होती। क्रोध, आहत भाव या अत्यधिक उत्साह में लिखी गई पोस्ट प्रायः विवाद बढ़ाती है और बाद में पछतावे का कारण बनती है। यह भी समझना आवश्यक है कि हर पोस्ट स्थायी रिकॉर्ड बन जाती है—स्क्रीनशॉट, फॉरवर्ड और कट-पेस्ट के माध्यम से बात नियंत्रण से बाहर चली जाती है। इसके अतिरिक्त, हर सोशल मीडिया मंच सत्संग की मर्यादा नहीं निभाता; वहाँ लोग सीखने नहीं, बल्कि अक्सर प्रतिक्रिया देने, जीतने या टिप्पणी करने आते हैं—जिससे शब्दों का प्रभाव बदल जाता है।


इसलिए डिजिटल संयम के कुछ व्यावहारिक संकेत अत्यंत आवश्यक हैं। अध्ययन की बातें अध्ययन-मंच तक सीमित रहें; संवेदनशील विषय प्रत्यक्ष और नियंत्रित संवाद में रखें; और भावावेश में पोस्ट करने से पहले कम से कम 24 घंटे का ठहराव अवश्य रखें। एक सरल नियम यह हो सकता है—"जो बात आप मंदिर के प्रांगण में, सबके सामने, शांति और सम्मान के साथ नहीं कह सकते, उसे ऑनलाइन पोस्ट न करें।" इस सुवाक्य को घर और कार्यालय में प्रदर्शित रखना भी एक व्यावहारिक साधना हो सकती है।


इस संदर्भ में श्री बीतक साहब में उपलब्ध वह अत्यंत मार्मिक और सीधी सीख विशेष रूप से स्मरणीय है, जहाँ महामति श्री प्राणनाथ जी छोटी पाती में संयम और मर्यादा का स्पष्ट निर्देश देते हैं—


"अब मरजादा चलियो, राखियो मेरी लाज।"


इस एक पंक्ति में तारतम साधना का संपूर्ण सामाजिक अनुशासन समाहित है। इसका आशय यह नहीं है कि सत्य को छिपा लिया जाए या धर्म-सेवा से पीछे हट जाया जाए, बल्कि यह है कि धर्म-सेवा मर्यादा के भीतर ही शोभित होती है। श्री जी अपने अनुयायियों से केवल इतना ही आग्रह करते हैं—धर्म के नाम पर, सेवा के नाम पर, या सत्य के नाम पर ऐसा कुछ न किया जाए जिससे धर्म की गरिमा आहत हो और उनके मार्ग की लाज न रहे।


आज के संदर्भ में, विशेषकर डिजिटल माध्यमों और सार्वजनिक मंचों पर, यह वाक्य और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। जब शब्द अनुशासन से बाहर जाते हैं, जब भाव विवेक से कट जाते हैं, और जब प्रचार सेवा से बड़ा हो जाता है—तब धर्म का स्वर कठोर हो जाता है और साधना विवाद में बदल जाती है। "मरजादा चलियो" का अर्थ यही है कि सेवा में भी सीमा हो, वाणी में भी संयम हो, और अभिव्यक्ति में भी उत्तरदायित्व बना रहे।


इसलिए सोशल मीडिया, सार्वजनिक वक्तव्य और डिजिटल प्रचार के संदर्भ में यही तारतम-सम्मत कसौटी है—

क्या यह बात धर्म की मर्यादा में है?

क्या इससे सेवा की लाज बनी रहती है?

क्या इससे सत्गुरु-पथ की गरिमा सुरक्षित रहती है?


यदि उत्तर हाँ है, तो वाणी सेवा बनती है; और यदि नहीं, तो मौन ही श्रेष्ठ साधना है।"बस इतनी सी मेरी लाज बचाये रखना" यह केवल एक भावुक आग्रह नहीं, बल्कि तारतम वाणी का व्यावहारिक संविधान है।


अंततः, तारतम वाणी यह स्मरण कराती है कि हमारी जागरूकता की अवस्था में माया के शस्त्र निष्प्रभावी हो जाते हैं, और हमारी बेहोशी में वही शस्त्र अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। जागृति की अवस्था माया के तिरोहित होने की अवस्था है—और डिजिटल संयम उसी जागृति का एक आधुनिक अभ्यास है।


सदा आनंद मंगल में रहिए। 

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