समय, काल, महाकाल और समया


समय, काल, महाकाल और समया


1. समय और काल : भ्रम और बोध

भारतीय दर्शन में समय वह है जो बीतता दिखाई देता है, और काल वह है जो बीतने की प्रक्रिया को चलाता है।पर मनुष्य अक्सर समय को ही सत्य मान बैठता है—यही मूल भ्रम है।


समय वह है जो बीतता दिखाई देता है—दिन-रात, तिथि, वर्ष, उम्र। यह घटनाओं का मापन है और परिवर्तन का अनुभव कराता है।काल वह तत्त्व है जो समय को चलाता है—उत्पत्ति, स्थिति और लय का नियम। यह घड़ी में नहीं बँधता; घड़ी काल के भीतर चलती है।


ग्रन्थ कलश इस भ्रम को तीखे शब्दों में खोल देता है—"काल ना देखें इन फेरे, याही तिमर के फंद।

ए सूरज आंखों देखिए, पर याही फंद के बंध॥"(ग्रन्थकलशप्रकरण 1, चौपाई 17)

अर्थ स्पष्ट है— सूरज आँखों के सामने है, सत्य प्रकट है, पर जीव काल–समय के फंदे में फँसकर उसे देख नहीं पाता। यहाँ समय = फेरा, और काल = फंदा है।


2. काल की साधना और समय की भूख

मनुष्य समय को जीतना चाहता है—दीर्घायु, फल, उपलब्धियाँ, सुख।पर यह सब काल के भीतर की साधना है, काल के पार की नहीं।

"कई फल फूल पत्र भखी, कई आहार अलप।

कई करें काल की साधना, जिया चाहें कलप॥"(ग्रन्थकलशप्रकरण 14, चौपाई 26)

यह चौपाई बताती है कि लोग काल को साधकर समय बढ़ाना चाहते हैं, पर इससे मुक्ति नहीं आती— केवल जीने की इच्छा (कलप) बढ़ती है।


3. काल निराकार है, पर अविनाशी नहीं

यह एक गूढ़ बिंदु है—काल स्वयं भी अंतिम सत्य नहीं।

"आकार न कहिए तिनको, काल को जो ग्रास।काल सो निराकार है, आकार सदा अविनास॥"(ग्रन्थकलशप्रकरण 16, चौपाई 26)

काल निराकार है, पर अविनाशी नहीं।जो काल को भी "ग्रास" कर ले, वही महाकाल / अक्षरातीत है।यहाँ वेदांत और तारतम एक स्वर में बोलते हैं।


महाकाल भारतीय दर्शन में समय या मृत्यु मात्र नहीं, बल्कि समय से परे स्थित परम सत्ता है। वह समय को उत्पन्न करता है, उसी में सृष्टि का संचालन करता है और अंततः समय को भी अपने में लीन कर लेता है। वेदान्त में महाकाल परब्रह्म का कार्यात्मक बोध है—परब्रह्म कालातीत है और काल उसकी शक्ति; इसलिए महाकाल काल का भी स्वामी है ("कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्"). पुराणों में महाकाल शिव का उग्र–रक्षक रूप है, और योग–भक्ति परंपराओं में उनका स्मरण मृत्यु-भय से मुक्ति, वैराग्य और मोक्ष-पथ का द्वार खोलता है।निष्कर्ष: महाकाल समय को चलाता है, पर स्वयं समय से परे रहता है। तारतम वाणी की तारतम्य (क्रमिक) दृष्टि में अक्षरातीत महाकाल के भी महाकाल है। 


4. कालमाया : खेल और फँसाव

मनुष्य काल को केवल बाहर घटते देखता है, पर असली जाल कालमाया है—जहाँ समय, मोह और विकार साथ-साथ चलते हैं।

"खेल देख्या कालमाया का, सो कालमाया में भिल।

अब देखो सुख जागनी, होसी निरमल दिल॥"(ग्रन्थकलशप्रकरण 21, चौपाई 12)

जो इस खेल को खेल समझ लेता है, वही जागनी की ओर बढ़ता है।अन्यथा—

"लेस है कालमाया को, बढ़यो साथ में विकार।"(ग्रन्थकलशप्रकरण 21, चौपाई 18)

कालमाया का स्पर्श भी विकार बढ़ा देता है।


5. मोह–अज्ञान–कर्म : समय के नाम

"मोह अग्यान भरमना, करम काल और सुंन।

ए नाम सारे नींद के, निराकार निरगुन॥"(ग्रन्थकलशप्रकरण 24, चौपाई 19)

यह चौपाई अद्भुत है।यह कहती है—मोह, अज्ञान, कर्म, काल, शून्य सब नींद के नाम हैं।जागरण में ये सब छूट जाते हैं।


6. योग–तंत्र भी काल के भीतर

किरन्तन स्पष्ट करता है कि सूक्ष्म योगिक अवस्थाएँ भी यदि पहचान न हो तो काल के भीतर ही रहती हैं—

"त्रिकुटी त्रिवेनी तीनों ही काल में, ना अनहद अजपा आसन॥"(ग्रन्थकिरन्तनप्रकरण 11, चौपाई 5)

अर्थात— योग की ऊँचाइयाँ भी अंतिम मुक्ति नहीं, यदि अक्षरातीत पहचान न हो।


7. "समया" : अवसर, जो लौटता नहीं

किरन्तन और प्रकाश ग्रन्थ में "समया" शब्द बार-बार आता है।यह साधारण समय नहीं, बल्कि जागरण का अवसर है।

"पीछे पछतावा क्या करे, जब गया समया चल॥"(ग्रन्थकिरन्तनप्रकरण 77, चौपाई 11)

"जो जो खिन इत होत है, लीजो लाभ साथ धनी पेहेचान।ए समया तुमें बहुरि न आवे॥"(ग्रन्थकिरन्तनप्रकरण 89, चौपाई 10)

यहाँ समय नहीं, निर्णय–क्षण की बात है।


8. महाकाल : काल से भी परे

भक्ति दृष्टि में यही भाव महाकाल का है— जो काल को भी निगल ले, वही मेरा पालनहार। तारतम की भाषा में यह अक्षरातीत धनी हैं—जो काल, समय, माया—सबके पार हैं।


9. अंतिम सार (Integrated Conclusion)

समय = जो बीतता है, काल = जो बीतने को चलाता है, कालमाया = जो जीव को फँसाती है, समया = जो अवसर है, महाकाल / अक्षरातीत = जो इन सबसे परे अंतिम विषय है।

"फेर नहीं आवे ऐसा समया" (ग्रन्थप्रकाशप्रकरण 20, चौपाई 113)


इसलिए तारतम का संदेश स्पष्ट है—समय को मत गिनो, काल से मत डरो, कालमाया को पहचानो, समया में जागो, और महाकाल / अक्षरातीत में स्थिर हो जाओ। यही काल–समय का तारतम-सार है।


नीचे "समय–समया–काल–महाकाल" की तारतम्य दृष्टि पर आधारित

व्यावहारिक जीवन-प्रैक्टिस दी जा रही हैं।

इन्हें साधना नहींजीने की कला समझकर रखा गया है—सरल, दैनिक और जागरण-उन्मुख।



1. समय (जो बीतता है) : सजगता की प्रैक्टिस


उद्देश्य: समय को गिनने से हटकर उसे देखना।


प्रैक्टिस

दिन में 2–3 बार रुककर स्वयं से पूछें—

👉 "अभी मैं समय में बह रहा हूँ या जागकर देख रहा हूँ?"


घड़ी देखें, पर मन को घड़ी न बनने दें।

यह अभ्यास समय = फेरा की पहचान कराता है

(ग्रन्थकलश 1/17 का व्यावहारिक रूप)।



2. काल (जो चलाता है) : भय-मुक्ति की प्रैक्टिस


उद्देश्य: काल से डरना नहीं, उसे समझना।


प्रैक्टिस

किसी परिवर्तन (हानि, उम्र, बीमारी, असफलता) के समय मन में कहें—

👉 "यह काल की गति हैमेरा स्वरूप नहीं।"


यह स्मरण काल को फंदा मानने से मुक्त करता है

और उसे नियम के रूप में देखना सिखाता है।



3. काल की साधना से विरति : लालसा-जाँच


उद्देश्य: समय बढ़ाने की लालसा को पहचानना।


प्रैक्टिस

दिन के अंत में एक प्रश्न लिखें—

👉 "आज मैंने क्या केवल अधिक पाने / अधिक जीने के लिए किया?"


जहाँ "और चाहिए" दिखे, वहाँ विराम लें।

यह कलप (जीने की अतृप्त इच्छा) को ढीला करता है

(ग्रन्थकलश 14/26)।



4. कालमाया : खेल-दृष्टि की प्रैक्टिस


उद्देश्य: फँसने के बजाय खेल देखना।


प्रैक्टिस

किसी भावनात्मक स्थिति (क्रोध, ईर्ष्या, मोह) में मन ही मन कहें—

👉 "यह कालमाया का खेल हैमैं खिलाड़ी नहींदर्शक हूँ।"


जो खेल समझ लेता है, वही जागनी की ओर बढ़ता है

(ग्रन्थकलश 21/12)।



5. मोह–कर्म–अज्ञान : नींद से जागरण


उद्देश्य: "मैं सही हूँ" की नींद तोड़ना।


प्रैक्टिस

हर रात सोने से पहले पूछें—

👉 "आज मैंने किस बात को बिना जाँचे सच मान लिया?"


यह अभ्यास नींद के नामों (मोह, कर्म, काल) से बाहर लाता है

(ग्रन्थकलश 24/19)।



6. योग-तंत्र का अतिक्रमण : पहचान-स्मरण


उद्देश्य: अनुभव में अटकने से बचना।


प्रैक्टिस

ध्यान, जप या किसी ऊँचे अनुभव के बाद कहें—

👉 "यह अवस्था हैमेरा स्वरूप नहीं।"


यह योग को काल के भीतर रखकर

अक्षरातीत पहचान की ओर ले जाता है

(ग्रन्थकिरन्तन 11/5)।



7. समया (निर्णय-क्षण) : त्वरित जागरण


उद्देश्य: अवसर को टालना नहीं।


प्रैक्टिस

जब सही बात दिखे, उसी क्षण छोटा कदम लें—

फोन करना, क्षमा माँगना, सेवा करना, सच बोलना।


👉 "कल देखेंगे" कहना = समया खोना

(ग्रन्थकिरन्तन 77/11, 89/10)।



8. महाकाल / अक्षरातीत : स्थिरता की प्रैक्टिस


उद्देश्य: जो बदलता नहीं, उसमें टिकना।


प्रैक्टिस

दिन में एक बार शांत होकर कहें—

👉 "जो सब बदल रहा हैवह मैं नहीं हूँ।"


यह स्मरण मन को समय और काल से ऊपर

महाकाल-भाव में टिकाता है।



9. एक संयुक्त दैनिक सूत्र


सुबह: समय को देखो

दोपहर: काल से मत डरो

शाम: कालमाया को पहचानो

रात: समया का लेखा लो

भीतर: महाकाल में स्थिर रहो



अंतिम जीवन-सूत्र (तारतम-सार)


समय को मत गिनो,

काल को समझो,

कालमाया से जागो,

समया को मत खोओ,

और महाकाल / अक्षरातीत में टिक जाओ।


क्विज : समय – समया – काल – महाकाल


(तारतम वाणी  जीवन-प्रैक्टिस आधारित | पाठ्यक्रम हेतु)



भाग–A : बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)


(सही विकल्प चुनिए)


1. 'समय' का सही अर्थ क्या है?

A) जो सब कुछ चलाता है

B) जो बीतता दिखाई देता है

C) जो अविनाशी है

D) जो माया है

👉 उत्तर: B



2. 'काल' को तारतम दृष्टि में कैसे समझा गया है?

A) घड़ी का मापन

B) केवल मृत्यु

C) समय को चलाने वाली सत्ता

D) केवल दुःख

👉 उत्तर: C



3. ग्रन्थकलश (1/17) में 'फेरा' और 'फंदा' किसके प्रतीक हैं?

A) देह और मन

B) समय और काल

C) सुख और दुःख

D) कर्म और ज्ञान

👉 उत्तर: B



4. 'काल की साधना' का मुख्य परिणाम क्या बताया गया है?

A) मुक्ति

B) ज्ञान

C) जीने की इच्छा (कलप) का बढ़ना

D) वैराग्य

👉 उत्तर: C

(ग्रन्थकलश 14/26)



5. 'काल निराकार है, पर अविनाशी नहीं' — इसका तात्पर्य क्या है?

A) काल ही अंतिम सत्य है

B) काल को भी कोई ग्रास कर सकता है

C) काल कभी समाप्त नहीं होता

D) काल ही आत्मा है

👉 उत्तर: B

(ग्रन्थकलश 16/26)



6. 'कालमाया' का सही अर्थ क्या है?

A) केवल समय

B) केवल कर्म

C) समय, मोह और विकार का संयुक्त जाल

D) ध्यान की अवस्था

👉 उत्तर: C



7. ग्रन्थकलश (24/19) के अनुसार मोह, अज्ञान, कर्म, काल किसके नाम हैं?

A) साधना के

B) जागरण के

C) नींद के

D) भक्ति के

👉 उत्तर: C



8. किरन्तन (11/5) के अनुसार योग की ऊँची अवस्थाएँ भी किसके भीतर रहती हैं?

A) महाकाल

B) काल

C) अक्षरातीत

D) परमधाम

👉 उत्तर: B



9. 'समया' शब्द का सही भाव क्या है?

A) रोज़ का समय

B) बीता हुआ समय

C) जागरण का निर्णायक अवसर

D) भविष्य

👉 उत्तर: C



10. महाकाल का सबसे सही दार्शनिक अर्थ क्या है?

A) मृत्यु

B) समय

C) काल का भी स्वामी, कालातीत सत्ता

D) केवल शिव का रूप

👉 उत्तर: C



भाग–B : सही / गलत


11. समय और काल भारतीय दर्शन में एक ही हैं।

👉 उत्तर: ❌ गलत


12. कालमाया को पहचान लेने से विकार कम होने लगते हैं।

👉 उत्तर: ✅ सही


13. योगिक अनुभव ही अंतिम मुक्ति हैं।

👉 उत्तर: ❌ गलत


14. 'समया' एक बार चला जाए तो फिर लौटता नहीं।

👉 उत्तर: ✅ सही


15. महाकाल समय के अधीन है।

👉 उत्तर: ❌ गलत



भाग–C : रिक्त स्थान भरिए


16. जो बीतता है उसे ______ कहते हैं।

👉 उत्तर: समय


17. जो समय को चलाता है उसे ______ कहते हैं।

👉 उत्तर: काल


18. समय + मोह + विकार = ______

👉 उत्तर: कालमाया


19. जागरण का दुर्लभ अवसर ______ कहलाता है।

👉 उत्तर: समया


20. जो काल से भी परे है, वही ______ है।

👉 उत्तर: महाकाल / अक्षरातीत



भाग–D : जीवन-प्रैक्टिस आधारित प्रश्न


21. आज आपने कौन-सा समया पहचाना, जिसे पहले टाल देते थे? (1–2 पंक्ति)


22. किसी एक स्थिति का उदाहरण दें जहाँ आपने कालमाया को खेल समझकर प्रतिक्रिया बदली।


23. "यह काल की गति है, मेरा स्वरूप नहीं" — यह वाक्य आपको किस परिस्थिति में सहायक लगा?



अंतिम एक-लाइन क्विज प्रश्न (चिंतन)


24. यदि आज का दिन अंतिम समया हो, तो आप क्या अलग करेंगे?

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