माया : उत्पत्ति, शक्ति, स्वभाव और उसे वश करने के उपाय

माया : उत्पत्ति, शक्ति, स्वभाव और उसे वश करने के उपाय

(तारतम–वाणी और श्री रास–ग्रंथ के प्रकाश में एक सैद्धान्तिक अध्ययन)


सार (Abstract)

यह शोधपत्र श्री कुलजम स्वरूप, विशेषतः श्री रास–ग्रंथ, सनंध–ग्रंथ और मारफ़त सागर के आधार पर माया की अवधारणा का समग्र, दार्शनिक एवं व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन का उद्देश्य माया की उत्पत्ति, उसकी शक्ति, उसका स्वभाव तथा उससे मुक्त होने के उपायों को स्पष्ट करना है। शोध यह स्थापित करता है कि माया कोई स्वतंत्र या अंतिम सत्ता नहीं, बल्कि अनुभव का एक दिव्य-नियोजित खेल है, जिसका संचालन क्षरपुरुष के अधीन होता है, न कि अक्षरातीत परब्रह्म के। माया का लक्ष्य आत्माओं को बाँधना नहीं, बल्कि उन्हें अनुभव के माध्यम से आत्म-जागृति की ओर ले जाना है। तारतम ज्ञान के बिना माया की पहचान असंभव है, और माया की सही पहचान के बिना न आत्म-जागृति संभव है, न श्री रासलीला के वास्तविक रस का अनुभव।


कुंजी शब्द (Keywords)

माया, दज्जाल, तारतम ज्ञान, क्षरपुरुष, अक्षरब्रह्म, अक्षरातीत, आत्म-जागृति, रासलीला, मोह, विवेक


1. प्रस्तावना : माया का केंद्रीय प्रश्न

श्री रास–ग्रंथ के प्रारंभिक तीन प्रकरणों का मूल विषय माया है। यही विषय कुलजम स्वरूप के समस्त ग्रंथ–क्रम में निरंतर विकसित होता है—रास–ग्रंथ से लेकर क़यामतनामा तक। यह तथ्य स्वयं संकेत करता है कि माया को समझे बिना न तो तारतम ज्ञान का यथार्थ विवेचन संभव है और न ही रासलीला के गूढ़ रस का अनुभव। मारफ़त सागर में आत्म-जागृति (क़यामत) की सात निशानियों में से प्रथम चार माया के प्रभाव को रेखांकित करती हैं, जबकि अंतिम तीन पारब्रह्म की शक्तियों के प्रकट होने की ओर संकेत करती हैं। अतः माया पर विचार तारतम–वाणी के अध्ययन की अनिवार्य पूर्वशर्त है।


2. माया की संकल्पना : असत्य होते हुए भी प्रभावी

माया वह शक्ति है जो जीव या आत्मा को उसके मूल स्वरूप और पारब्रह्म के ज्ञान से विमुख करती है। इसे मोह, अज्ञान, निद्रा, भ्रम, शून्य, साकार–निर्गुण आदि अनेक नामों से जाना गया है। भाषिक दृष्टि से 'मा' (नहीं) और 'या' (जो है) के संयोग से बना माया शब्द स्वयं इसकी असत्यता की ओर संकेत करता है। शास्त्रों में खरगोश के सींग, बाँझ स्त्री के पुत्र और आकाश के फूल जैसे रूपकों द्वारा इसकी अवास्तविकता को समझाया गया है। फिर भी, अनुभव–स्तर पर माया अत्यंत प्रभावशाली है। बाइबिल और क़ुरान में जिसे शैतान या दज्जाल कहा गया है, वही तत्व श्री मुखवाणी में खेल, स्वप्न और नाटक के रूप में व्यक्त होता है।


3. माया और अज्ञान : तारतम ज्ञान का अभाव

तारतम ज्ञान के अभाव में साधक स्थूल, साकार अथवा गहरी निद्रा की अवस्थाओं को ही निराकार या परम सत्य मान बैठता है। परिणामस्वरूप वह पंचतत्त्व, त्रिगुण और चौदह लोकों से युक्त क्षर–जगत को ही अंतिम सत्य समझ लेता है। श्री मुखवाणी स्पष्ट करती है कि केवल वही व्यक्ति तारतम का सच्चा विचार कर सकता है, जो माया को पार कर चुका हो। अन्यथा साधक माया के ही रूपों को पारब्रह्म मानकर उसी में संतोष खोजता रहता है।


4. माया की उत्पत्ति : कार्य–कारण की प्रक्रिया

शास्त्रीय परंपरा में माया को ईश्वर की प्रकृति कहा गया है, किंतु तारतम–दृष्टि से सृष्टि की वास्तविक रचयिता माया ही है; ब्रह्म केवल निमित्त है। अक्षरब्रह्म के अव्यक्त मन में स्थित सुमंगला शक्ति जब चिदानंदलहरी से संयोग करती है, तब मूल प्रकृति प्रकट होती है। इसी में विक्षोभ से मोह–तत्त्व और फिर जगत की रचना होती है। यह बनना–मिटना अनादि काल से चलता आ रहा है। जीव और ईश्वर का व्यक्त रूप भी इसी प्रवाह में प्रकट होता है, इसीलिए वे अनादि प्रतीत होते हैं, जबकि वास्तव में अनादि और अखंड केवल वही है जो महाप्रलय से भी परे है।


5. माया का स्वामी : क्षरपुरुष, न कि अक्षरातीत

तारतम ज्ञान स्पष्ट करता है कि माया का संचालन क्षरपुरुष आदिनारायण के अधीन है। अक्षरातीत परब्रह्म और उनका धाम त्रिगुणातीत, अद्वैत और अखंड हैं; वहाँ माया का प्रवेश असंभव है। यह भ्रम कि माया "मूल धणी से उत्पन्न हुई है" इसलिए अक्षरातीत उसका कारण हैं—तारतम दृष्टि से निरस्त होता है। यहाँ 'मूल धणी' से आशय विशेष दिव्य संकल्प और आदेश से है, प्रत्यक्ष कारण से नहीं।


6. विशेष ब्रह्मांड और इश्क़ का संकल्प

वर्तमान ब्रह्मांड किसी सामान्य माया–प्रवाह से नहीं, बल्कि एक विशेष दिव्य प्रयोजन से उत्पन्न हुआ है। परमधाम में स्थित आत्माओं को अनुभव कराने हेतु धामधणी ने अक्षरब्रह्म को विशेष आदेश दिया। इस सृष्टि का मूल कारण परमधाम में लिया गया इश्क़ का संकल्प है। आत्माएँ वास्तव में परमधाम में ही स्थित हैं, किंतु शरीर और ब्रह्मांड—इन दो परदों के माध्यम से वे माया के स्वप्नवत खेल का अनुभव करती हैं।


7. माया का स्वभाव और उसका सर्वव्यापक प्रभाव

माया का स्वभाव सम्मोहक है। वह काम, क्रोध, लोभ, मद, मत्सर और द्वेष के माध्यम से जीव को कर्म–बंधन में बाँधती है। उसका प्रभाव इतना व्यापक है कि स्वर्ग, वैकुंठ, कैलास और सत्यलोक जैसे लोक भी उससे अछूते नहीं हैं। इतिहास और पुराणों में ऋषियों, राजाओं और देवताओं के उदाहरण यह दर्शाते हैं कि माया को माया–जन्य बुद्धि से नहीं जीता जा सकता।


8. माया भीतर और बाहर : पलायन बनाम उत्तरदायित्व

माया का अस्तित्व व्यक्ति–स्तर और समष्टि–स्तर—दोनों पर है। इसे केवल बाह्य मान लेने से मनुष्य पलायनवादी हो जाता है, और केवल आंतरिक मान लेने से वह व्यवस्था की वास्तविकताओं की उपेक्षा करता है। तारतम दृष्टि दोनों को स्वीकार करती है। यही संतुलन आत्म-जागृति की शर्त है।


9. माया के शस्त्र और मनुष्य की पीड़ा

माया तीन प्रकार के दुखों—आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक—के माध्यम से जीव को जलाती रहती है। वह सुख को अमृत की तरह दिखाकर छल करती है, इंद्रिय–भोग में उलझाती है, और कथनी–करनी में विरोध उत्पन्न करती है। उसका स्वरूप बहुरूपिणी और अत्यंत चतुर है।


10. माया पर विजय : दिव्य शस्त्र और साधना

माया के विरुद्ध धामधणी ने तारतम–वाणी रूपी अमोघ शस्त्र प्रदान किया है। सद्गुरु ने तीन मुख्य दिव्य शस्त्र बताए हैं—शुकर (कृतज्ञता), ग़रीबी (विनय) और सबर (धैर्य)। इनके साथ पाँच परहेज़—सत्य-अहिंसा, नशा-त्याग, मांसाहार-त्याग, व्यभिचार-त्याग और अश्लीलता से दूरी—अनिवार्य बताए गए हैं। जब साधक इनका पालन करता है, तब माया बाधा नहीं रह जाती, बल्कि आत्म-जागृति का साधन बन जाती है।


निष्कर्ष

यह अध्ययन स्थापित करता है कि माया कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं, बल्कि अनुभव का नियोजित खेल है। उसका उद्देश्य आत्माओं को बाँधना नहीं, बल्कि उन्हें जागृत करना है। माया को समझे बिना तारतम ज्ञान अधूरा है, और तारतम ज्ञान के बिना माया पर विजय असंभव। वास्तविक विजय तब है जब माया साधक के मार्ग में बाधा न रहकर साधन बन जाए—और यही श्री रासलीला के वास्तविक रस का द्वार खोलती है।


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