तारतम वाणी के माध्यम से पूर्व और पश्चिम का सेतु: तुलनात्मक प्रकाशन में श्री के. सी. व्यास का समन्वयकारी योगदान - आध्यात्मिक अनुवाद का एक दुर्लभ प्रयास
तारतम वाणी के माध्यम से पूर्व और पश्चिम का सेतु:
तुलनात्मक प्रकाशन में श्री के. सी. व्यास का समन्वयकारी योगदान -
आध्यात्मिक अनुवाद का एक दुर्लभ प्रयास
तारतम वाणी : एक संक्षिप्त, समन्वित और बोधगम्य परिचय
तारतम वाणी महामति प्राणनाथ द्वारा उद्घाटित वह अद्वितीय आध्यात्मिक प्रकाश है, जो विश्व के प्रमुख धर्मग्रंथों—श्रीमद्भगवद्गीता, भागवत, योगवाशिष्ठ, उपनिषद, बाइबल और क़ुरआन—को एक ही परम सत्य की क्रमिक अभिव्यक्तियों के रूप में देखने की समन्वित दृष्टि प्रदान करता है। यह किसी एक परंपरा या संप्रदाय का विस्तार नहीं, बल्कि उस एक परम सत्ता का समग्र उद्घाटन है, जिसे विभिन्न युगों और संस्कृतियों में मानव चेतना की ग्रहण-क्षमता के अनुसार प्रकट किया गया। इस अर्थ में तारतम वाणी न तो नए मत का आग्रह करती है और न ही पूर्ववर्ती परंपराओं का निषेध; वह पहले से उपलब्ध शास्त्रीय सत्यों के अंतर्निहित संबंधों को उद्घाटित कर उन्हें एक व्यापक संदर्भ में रखती है।
तारतम वाणी का मूल आधार "तारतम्य" का सिद्धांत है—अर्थात् सत्य का क्रमिक, स्तरानुसार और परस्पर संगत प्रकाशन। इस दृष्टि से शास्त्रों के बीच दिखाई देने वाले मतभेद सत्य के विरोध नहीं, बल्कि उसकी विभिन्न अवस्थाओं और अभिव्यक्तियों के संकेत हैं। प्रत्येक शास्त्र अपने काल, संदर्भ और पात्रता के अनुसार उसी एक परम सत्य की ओर इंगित करता है। जहाँ गीता और अन्य ग्रंथ संकेत देते हैं, वहीं तारतम वाणी उन संकेतों को अनुभवात्मक और संरचनात्मक स्पष्टता प्रदान करती है, जिससे दीर्घकाल से चली आ रही दार्शनिक अस्पष्टताएँ सुलझती हैं और शास्त्रों के बीच वास्तविक समन्वय संभव होता है।
इस समन्वय का एक केंद्रीय पक्ष ईश्वर के त्रि-स्तरीय स्वरूप की स्पष्टता है—क्षर, अक्षर और अक्षरातीत। तारतम वाणी इस त्रि-स्तरीय तत्त्व को उद्घाटित करते हुए श्रीमद्भगवद्गीता के पुरुषोत्तम सिद्धांत को उसकी सर्वोच्च और अखंड अवस्था में प्रतिष्ठित करती है। इस प्रकार ईश्वर की एकता बनी रहती है, पर उसकी अनुभूति और अभिव्यक्ति के स्तर स्पष्ट हो जाते हैं, जिससे शास्त्रों में प्रयुक्त विविध नामों, रूपकों और संकेतों का समन्वित अर्थ उभरता है।
तारतम वाणी की एक विशिष्ट और मौलिक देन Inter-Loka Spiritual Linkages—अर्थात् अंतर-लोक आध्यात्मिक संयोजन—की अवधारणा है। इसके अनुसार दैवी प्रेरणा, ज्ञान और जागरण का संचार केवल भौतिक या ऐतिहासिक माध्यमों से नहीं होता, बल्कि सूक्ष्म आध्यात्मिक लोकों के बीच स्थापित कड़ीबद्धताओं के माध्यम से घटित होता है। यही अवधारणा बाइबल में वर्णित Kingdom of Heaven, Holy Spirit और inner rebirth जैसे संकेतों को एक गहरे, समन्वित अर्थ में समझने का आधार देती है और उन्हें भारतीय दर्शनों के साथ सार्थक संवाद में लाती है।
इसी संदर्भ में तारतम वाणी का केंद्रीय सिद्धांत "कड़ीबद्धता" विशेष महत्त्व रखता है। इसके अनुसार समस्त सृष्टि का आधार एक ही निराकार ब्रह्मतत्त्व या पुरुषोत्तम तत्त्व है, जो स्वयं अव्यक्त रहते हुए तीन साकार लोकों—अक्षरातीत, अक्षर और क्षर—को निरंतर धारण करता है। क्षर लोक में अनगिनत ब्रह्माण्ड और लोक हैं, जबकि अक्षर और अक्षरातीत लोक चेतना के उच्चतर और अविनाशी स्तर हैं। प्रत्येक लोक में भिन्न-भिन्न प्रकार की देहधारी चेतनाएँ निवास करती हैं और प्रत्येक चेतन सत्ता सामान्यतः केवल अपने ही लोक का अनुभव कर सकती है, क्योंकि वह अपने-अपने समष्टि पुरुष की चेतना में स्थित होकर उसी के द्वारा संचालित होती है।
दूसरे लोक का अनुभव तभी संभव होता है, जब सुरता को किसी उच्च लोक की चेतना से कड़ीबद्ध कर दिया जाए। यह कड़ीबद्धता केवल और केवल पुरुषोत्तम ब्रह्मतत्त्व की कृपा से संभव है। वही ब्रह्मतत्त्व अपने पूर्ण सामर्थ्य सहित अक्षरातीत लोक में "श्रीराज जी" के व्यष्टि रूप में स्थित है; वही सीमित सामर्थ्य के साथ अक्षर लोक में अक्षर पुरुष और क्षर लोक में चतुर्भुज क्षर पुरुष के रूप में प्रकट होता है। ये तीनों रूप अपने-अपने लोकों की चेतनाओं को दर्शन और कृपा का प्रसाद प्रदान करते हैं।
तारतम वाणी के अनुसार हमारा यह क्षर ब्रह्माण्ड विशेष है, क्योंकि इसकी "जागनी की कालावधि" में यहाँ स्थित बारह हजार ब्रह्म-सृष्टियाँ क्रमशः अक्षरातीत लोक में स्थित श्रीराज जी के दर्शन प्राप्त करने की अधिकारी बनती हैं। यह तभी संभव है, जब उनसे जुड़ी परात्माएँ अपनी फरामोशी (मूल-स्मृति का विस्मरण) को त्याग दें और जीव तारतम वाणी के मर्म को समझकर पूर्वकालीन शास्त्रीय शंकाओं से मुक्त हों तथा पूर्ण विश्वास—अर्थात् "बेशक"—की अवस्था में प्रवेश करें। इसी प्रकार चौबीस हजार ईश्वर-सृष्टियाँ अक्षर लोक के दर्शन की अधिकारी होती हैं, जबकि अनगिनत जीव-सृष्टियाँ अधिकतम क्षर लोक के वैकुण्ठ स्तर तक ही पहुँच पाती हैं, क्योंकि उनकी सुरता उच्च लोकों से कड़ीबद्ध नहीं करवाई गई होती।
इस प्रकार "कड़ीबद्ध करवा देना" वही कृपा है जिसे श्रीमद्भगवद्गीता में "योगयुक्त होना" कहा गया है—अर्थात् चेतना का उच्चतर तत्त्व से वास्तविक और अनुभवात्मक जुड़ाव। इसी प्रक्रिया के माध्यम से तारतम वाणी नवयुग की अवधारणा को स्पष्ट करती है। यह नवयुग—जिसे विभिन्न परंपराएँ कल्कि-युग, Day of Judgement या Aquarian Age कहती हैं—किसी एक अवतार तक सीमित नहीं है, बल्कि बारह हजार जाग्रत ब्रह्म-सृष्टियों के माध्यम से घटित होने वाला सामूहिक चेतना-परिवर्तन है, जिसे तारतम में "जागनी" कहा गया है।
यह भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि तारतम वाणी का स्वर किसी प्रकार के प्रचार या मतांतरण का नहीं है। यह स्वयं को किसी अन्य शास्त्र या परंपरा से श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास नहीं करती, बल्कि उन्हें संदर्भ-साक्ष्य के रूप में रखकर जागनी की प्रक्रिया को समझाने वाला एक स्वतंत्र ज्ञान-स्रोत बनती है। इसी कारण तारतम वाणी परंपरा के निषेध के स्थान पर परंपरा के भीतर विवेकपूर्ण पुनर्पाठ, स्वतंत्र चिंतन और वैकल्पिक दृष्टि की आवश्यकता पर बल देती है।
तारतम वाणी यह भी उद्घाटित करती है कि कलियुग का नैतिक, सामाजिक और पारिस्थितिक संकट किसी बाहरी दंड का परिणाम नहीं, बल्कि आध्यात्मिक विस्मरण का लक्षण है—जहाँ प्रेय ने श्रेय को विस्थापित कर दिया है। इस संकट का समाधान तारतम वाणी नूर या दिव्य तेज की अवधारणा के माध्यम से प्रस्तुत करती है, जो तुरीयातीत अवस्था से प्रवाहित होकर जाग्रत ब्रह्म-सृष्टियों द्वारा वैश्विक सत्संग का रूप लेता है। इसी प्रक्रिया में यह स्पष्ट होता है कि अक्षर लोक की प्राप्ति के लिए तारतम ज्ञान (इल्म) आवश्यक है, जबकि अक्षरातीत परमधाम के लिए प्रेम (इश्क़) अनिवार्य है।
इसी समन्वय के कारण तारतम वाणी को तुलनात्मक धर्म का Missing Key कहा जा सकता है—जो प्राचीन भविष्यवाणियों, आधुनिक आध्यात्मिक खोज और अंतर-धार्मिक संवाद को एक सूत्र में बाँधने की क्षमता रखती है। अंततः तारतम वाणी केवल एक दार्शनिक ग्रंथ नहीं, बल्कि वैश्विक चेतना-परिवर्तन की दिशा-सूचक है, जो परम सत्य की एकता को अनुभवजन्य स्तर पर उद्घाटित करती है। इसी बोध से शांति, समरसता और एकत्व किसी घोषित लक्ष्य के रूप में नहीं, बल्कि स्वाभाविक फल के रूप में प्रकट होते हैं।
श्री के. सी. व्यास का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि उन्होंने तारतम वाणी को पूर्व और पश्चिम—दोनों के साधकों के लिए बोधगम्य और प्रासंगिक बनाने का सतत तथा ईमानदार प्रयास किया है। उनका कार्य केवल किसी ग्रंथ की व्याख्या भर नहीं है; वह उससे कहीं अधिक कठिन कार्य करता है—एक उद्घाटित आध्यात्मिक दृष्टि का सांस्कृतिक और बौद्धिक अनुवाद। ऐसे समय में, जब एक ओर धर्म आपस में प्रतिस्पर्धा करते प्रतीत होते हैं और दूसरी ओर आधुनिकता शास्त्रों को अप्रासंगिक ठहरा देती है, श्री व्यास का शोध एक आवश्यक समन्वय प्रस्तुत करता है: यह दिखाने का प्रयास कि विश्व के महान धर्मग्रंथ, यदि परिपक्वता से पढ़े जाएँ, तो उसी परम सत्य की ओर संकेत करते हैं—जिसे महामति प्राणनाथ की तारतम वाणी विशिष्ट स्पष्टता के साथ उद्घाटित करती है।
'तारतम्य' के रूप में तारतम वाणी
श्री व्यास की पद्धति का केंद्र है 'तारतम्य'—अर्थात् रहस्योद्घाटन की एक क्रमबद्ध, स्तरीय समरसता। इस दृष्टि में धर्मग्रंथ परस्पर विरोधी दावे नहीं, बल्कि दैवी शिक्षण की क्रमिक अभिव्यक्तियाँ हैं, जो मानव चेतना की ग्रहण-क्षमता के अनुसार प्रकट होती हैं। भगवद्गीता, भागवत, योगवासिष्ठ और बाइबल—इन सबको वे किसी ऊँच-नीच की श्रेणी में नहीं रखते, बल्कि एक ऐसे आध्यात्मिक प्रवाह में स्थापित करते हैं जहाँ प्रत्येक शास्त्र अपनी विशिष्टता बनाए रखते हुए भी एक व्यापक दिव्य योजना का अंग बन जाता है। इस समग्र दृष्टि में, तारतम वाणी एक ऐसी कुंजी के रूप में उभरती है जो विविध प्रतीकों के पीछे छिपी एकता और क्रम को स्पष्ट करती है।
रास-लीला का गूढ़ अर्थ और आधुनिक प्रासंगिकता
उनके तुलनात्मक अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि भागवत की रास-लीला को वे केवल काव्यात्मक या भक्तिपरक आख्यान नहीं मानते, बल्कि एक गूढ़ दार्शनिक संकेत के रूप में पढ़ते हैं, जिसकी गहराई तारतम वाणी में स्पष्ट होती है। इस दृष्टि से रास-लीला अतीत की पवित्र कथा न रहकर आधुनिक मानवता के लिए एक जीवित संदेश बन जाती है—ऐसी मानवता के लिए, जो पहचान, इच्छा और अर्थ के संकट से गुजर रही है। इस प्रकार शास्त्र केवल विरासत नहीं रहते, बल्कि आध्यात्मिक निदान और उपचार का माध्यम बनते हैं।
ईश्वर का त्रि-स्तरीय तत्त्व और पुरुषोत्तम की स्पष्टता
श्री व्यास का एक केंद्रीय योगदान है तारतम वाणी में प्रतिपादित ईश्वर के त्रि-स्तरीय स्वरूप को रेखांकित करना और यह दिखाना कि यह संरचना स्वयं भगवद्गीता के भीतर निहित है। यह व्याख्या पुरुषोत्तम के विषय में चली आ रही दार्शनिक अस्पष्टताओं को सुलझाने में सहायक बनती है। जहाँ गीता के पाठकों के लिए यह प्रश्न बना रहता है कि सर्वोच्च तत्त्व सगुण है, निर्गुण है या उससे भी परे—वहीं तारतम वाणी एक अधिक स्पष्ट और संगठित दैवी मानचित्र प्रस्तुत करती है, जो गीता का खंडन नहीं करती, बल्कि उसके संकेतों को पूर्णता देती है।
बाइबल से संवाद: स्वर्ग का राज्य और उच्च लोक
इसी समन्वय को आगे बढ़ाते हुए श्री व्यास बाइबल के "Kingdom of Heaven" (स्वर्ग का राज्य) और ईश्वर-तत्त्व को भी तारतम वाणी में वर्णित उच्च लोकों से जोड़कर पढ़ने का प्रस्ताव रखते हैं। यह कोई सरलीकृत समानीकरण नहीं, बल्कि एक सेतु-निर्माण है—जहाँ विभिन्न परंपराएँ एक ही आध्यात्मिक संरचना को भिन्न प्रतीकों में अभिव्यक्त करती प्रतीत होती हैं। इस प्रकार भारतीय और अब्राहमिक परंपराओं के बीच एक नया संवाद संभव होता है।
अंतर-लोक आध्यात्मिक संयोजन (Inter-Loka Linkages)
श्री व्यास का सबसे मौलिक योगदान संभवतः अंतर-लोक आध्यात्मिक संयोजन की संकल्पना है। उनके अनुसार, शास्त्रों में वर्णित अनेक प्रतीकात्मक कथाएँ उन सूक्ष्म दैवी संबंधों की ओर संकेत करती हैं, जिन्हें तारतम वाणी स्पष्ट रूप में उद्घाटित करती है। ये संयोजन बताते हैं कि दैवी प्रेरणा, मार्गदर्शन और जागृति केवल भौतिक संपर्क से नहीं, बल्कि लोकों और युगों के पार कैसे संचरित होती है।
एक स्रोत, अनेक शास्त्र
इस दृष्टि से यह निष्कर्ष स्वाभाविक बनता है कि सभी प्रमुख धर्मग्रंथ एक ही परम सत्य से उत्पन्न हुए हैं, जो मानवता की ग्रहण-क्षमता के अनुसार क्रमशः प्रकट होता रहा है। यहाँ अंतर-धार्मिक सौहार्द केवल सामाजिक सहिष्णुता नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पहचान बन जाता है—यह समझ कि मतभेद प्रायः अपूर्ण ग्रहण या संकीर्ण पहचान से उत्पन्न होते हैं, न कि सत्य के बहुवचन स्वरूप से।
नवयुग, जागनी और 12,000 ब्रह्म-सृष्टियाँ
श्री व्यास का एक साहसिक प्रतिपादन यह है कि नवयुग—जिसे विभिन्न परंपराएँ कल्कि-युग, ईश्वर का राज्य, Aquarian Age या Day of Judgement कहती हैं—एक सामूहिक आध्यात्मिक जागरण के रूप में प्रकट होगा। तारतम में वर्णित जागनी काल के अंतर्गत 12,000 जाग्रत ब्रह्म-सृष्टियों का उदय होगा, जिन्हें वे बाइबल के "children of God" से सांकेतिक रूप में जोड़ते हैं। यह परिवर्तन किसी एक ऐतिहासिक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक चेतना-जागरण है।
देवापि-मरु और सत्रहवीं शताब्दी का रहस्योद्घाटन
भागवत (12.2.37–38) में वर्णित देवापि और मरु की भविष्यवाणी को श्री व्यास सत्रहवीं शताब्दी में तारतम वाणी के प्राकट्य से जोड़ते हैं, और श्री देवचन्द्रजी तथा महामति प्राणनाथ को इस गुप्त किन्तु निर्णायक दैवी चरण के प्रवर्तक मानते हैं। विशेष तथ्य यह है कि प्रणामी परंपरा और प्रारंभिक थियोसोफिस्ट—स्वतंत्र रूप से—इन्हीं को दैवी ज्ञान के स्रोत के रूप में पहचानते हैं, जो एक संप्रदायातीत संगति की ओर संकेत करता है।
नूर / दिव्य तेज और वैश्विक सत्संग
तारतम में वर्णित नूर या दिव्य तेज—जो तुरीयातीत अवस्था में स्थित जाग्रत आत्माओं से प्रवाहित होता है—श्री व्यास की व्याख्या में वैश्विक सत्संग का रूप ले लेता है। यह प्रभाव भौतिक निकटता पर निर्भर नहीं; यह हृदय, बुद्धि और सामूहिक चेतना को शुद्ध करने वाला सूक्ष्म आध्यात्मिक प्रवाह है। इस दृष्टि में कल्कि-तत्त्व किसी एक अवतार तक सीमित न रहकर पुरुषोत्तम-अनुभव के हृदयगत अवतरण के रूप में समझा जाता है।
कलियुग का निदान और दैवी हस्तक्षेप की आवश्यकता
श्री व्यास का तर्क है कि कलियुग में बढ़ते नैतिक, पारिस्थितिक और आध्यात्मिक संकट—जिनकी भविष्यवाणी शास्त्रों में की गई है—ऐसे ही दैवी हस्तक्षेप की मांग करते हैं। धर्म का क्षरण, शास्त्रों की विकृत व्याख्याएँ और श्रेय के स्थान पर प्रेय का वर्चस्व—ये सभी एक गहरे आध्यात्मिक विस्मरण के लक्षण हैं। तारतम वाणी इस स्थिति का निदान और समाधान दोनों प्रस्तुत करती है।
निष्कर्ष: तुलनात्मक धर्म का एक अनुपस्थित सूत्र
अंततः, श्री के. सी. व्यास का कार्य तुलनात्मक धर्म-अध्ययन में तारतम वाणी को एक अनुपस्थित किन्तु अनिवार्य सूत्र के रूप में प्रस्तुत करता है। यदि उनके प्रतिपादनों—विशेषतः Spiritual Linkage Chart—को और अधिक स्पष्टता व सुलभता के साथ प्रस्तुत किया जाए, तो यह दृष्टि वैश्विक आध्यात्मिक समझ, एकता और शांति के एक नए चरण को प्रेरित कर सकती है—ऐसी शांति जो किसी वैचारिक समझौते से नहीं, बल्कि परम सत्य की एकता की पहचान से स्वाभाविक रूप से उदित होती है।
Key Takeaways | मुख्य निष्कर्ष
1. तारतम वाणी एक समन्वयकारी दृष्टि है, नया मत नहीं: तारतम वाणी किसी नए संप्रदाय की स्थापना नहीं करती, बल्कि विश्व के प्रमुख धर्मग्रंथों को एक ही परम सत्य की क्रमिक अभिव्यक्तियों के रूप में देखने की दृष्टि प्रदान करती है।
2. 'तारतम्य' सत्य की क्रमिक अभिव्यक्ति का मूल सिद्धांत है: शास्त्रों के बीच दिखने वाले भेद सत्य के विरोध नहीं, बल्कि चेतना की पात्रता के अनुसार सत्य के विभिन्न स्तरों के प्रकाशन हैं।
3. सभी प्रमुख शास्त्र एक ही परम स्रोत की ओर संकेत करते हैं: गीता, भागवत, उपनिषद, बाइबल और क़ुरआन—सबका मूल स्रोत एक ही परम सत्ता है; भिन्नता केवल भाषा, संदर्भ और ग्रहण-क्षमता की है।
4. ईश्वर का त्रि-स्तरीय स्वरूप दार्शनिक अस्पष्टताओं को सुलझाता है: क्षर, अक्षर और अक्षरातीत का विवेचन गीता के पुरुषोत्तम सिद्धांत को उसकी अखंड और सर्वोच्च अवस्था में स्पष्ट करता है।
5. Inter-Loka Spiritual Linkages एक केंद्रीय व्याख्यात्मक कुंजी है: दैवी प्रेरणा और जागरण केवल ऐतिहासिक घटनाओं से नहीं, बल्कि सूक्ष्म लोकों के बीच स्थापित आध्यात्मिक कड़ियों से संचालित होते हैं।
6. 'कड़ीबद्धता' चेतना के उच्चतर अनुभव का आधार है: किसी अन्य लोक का अनुभव तभी संभव है जब सुरता को उच्च लोक की चेतना से पुरुषोत्तम की कृपा द्वारा कड़ीबद्ध किया जाए।
7. हमारा क्षर ब्रह्माण्ड 'जागनी' के कारण विशिष्ट है: जागनी काल में 12,000 ब्रह्म-सृष्टियों का अक्षरातीत दर्शन और 24,000 ईश्वर-सृष्टियों का अक्षर लोक दर्शन संभव बताया गया है।
8. योगयुक्त होना = चेतना का वास्तविक जुड़ाव: गीता का 'योगयुक्त होना' वही कृपा है जिसे तारतम वाणी कड़ीबद्धता के रूप में समझाती है—यह अनुभवात्मक संबंध है, मात्र सिद्धांत नहीं।
9. नवयुग किसी एक अवतार का नहीं, सामूहिक जागरण का संकेत है: कल्कि-युग, Day of Judgement या Aquarian Age—सभी का सार सामूहिक चेतना-परिवर्तन है, जिसे तारतम 'जागनी' कहता है।
10. तारतम वाणी प्रचार नहीं, विवेकपूर्ण बोध का मार्ग है: यह मतांतरण का आग्रह नहीं करती, बल्कि परंपरा के भीतर पुनर्पाठ, स्वतंत्र चिंतन और शास्त्रीय निष्ठा के संतुलन पर बल देती है।
11. कलियुग का संकट आध्यात्मिक विस्मरण का परिणाम है: नैतिक, सामाजिक और पारिस्थितिक संकट बाहरी दंड नहीं, बल्कि प्रेय के वर्चस्व और श्रेय के विस्मरण का लक्षण हैं।
12. नूर / दिव्य तेज वैश्विक सत्संग का आधार है: तुरीयातीत अवस्था से प्रवाहित नूर जाग्रत ब्रह्म-सृष्टियों के माध्यम से वैश्विक चेतना को शुद्ध करता है।
13. ज्ञान और प्रेम—दोनों अपरिहार्य हैं: अक्षर लोक के लिए तारतम ज्ञान (इल्म) आवश्यक है, जबकि अक्षरातीत परमधाम के लिए प्रेम (इश्क़) अनिवार्य है।
14. तारतम वाणी तुलनात्मक धर्म की 'Missing Key' है: यह प्राचीन भविष्यवाणियों, आधुनिक आध्यात्मिक खोज और अंतर-धार्मिक संवाद को एक सूत्र में पिरोने की क्षमता रखती है।
15. वैश्विक शांति लक्ष्य नहीं, स्वाभाविक फल है: जब परम सत्य की एकता और उसकी क्रमिक अभिव्यक्ति को समझा जाता है, तब शांति और समरसता अपने-आप प्रकट होती हैं।
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