“भक्ति का व्यवहारिक रूप : सेवा”


"भक्ति का व्यवहारिक रूप : सेवा" 


आज का समय बाहर से जितना अशांत दिखाई देता है, भीतर से उतना ही निर्णायक भी है। युद्ध, भूख, बीमारी और निराशा के बीच मनुष्य बार-बार स्वयं से पूछता है—मैं क्या कर सकता हूँ? तारतम वाणी इस प्रश्न को टालती नहीं, बल्कि मन की जड़ तक ले जाती है। वह सीधे मनुष्य की स्थिति बताती है कि उसके भीतर संकल्प भी है और विकल्प भी—और यहीं से उसका धर्म आरंभ होता है। इसलिए वह कहती है—


"संकल्प विकल्प छे तूं माहीं,

ते तूं कर सेवा नी।

मन उमंग आणे तूं अति घणो,

श्री धाम धणी मलवा नी।।८५।। "


अर्थ यह है कि जब मन विकल्पों में उलझे, तब सेवा को चुनना ही सही दिशा है। सेवा वह मार्ग है जहाँ संकल्प शुद्ध होता है और जीवन की दिशा स्पष्ट होती है।


तारतम ज्ञान में सेवा कोई अतिरिक्त पुण्य या सामाजिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि चेतना के जागरण का साधन है। धाम धणी के प्रकट होने का उद्देश्य ही चेतन को जगाना है, और यह जागरण सेवा के बिना संभव नहीं। इसी भाव को तारतम वाणी और स्पष्ट करती है—


"सेवा कीजे पहचान चित धर,

कारन अपने आए फेर।

भी अवसर आयो है हाथ,

चेतन कर दिए प्राणनाथ।।३।। "


यह चौपाई स्मरण कराती है कि यह समय साधारण नहीं है। सेवा का अवसर हाथ में है, और यही वह क्षण है जब मनुष्य अपनी चेतना को जाग्रत कर सकता है। आज जब थोड़े से साधन से किसी को अंधेपन से बचाया जा सकता है, किसी भूखे बच्चे का जीवन बचाया जा सकता है, या किसी बालक की शिक्षा और भविष्य बदला जा सकता है, तब यह केवल सामाजिक दान नहीं रहता—यह आत्मिक जागरण का सीधा साधन बन जाता है।


तारतम वाणी सेवा के साथ-साथ उसके भाव पर भी अत्यंत कठोर है। वह स्पष्ट चेतावनी देती है कि सेवा यदि प्रतिष्ठा, प्रशंसा या बड़ाई के लिए की जाए, तो वही सेवा प्रेम में बाधा बन जाती है। इसी सूक्ष्म सत्य को वह इस प्रकार प्रकट करती है—


"वे सेवा करें बहु बिध,

फेर फेर देवें बड़ाई।

हेत करें जान के साहेब,

मोहे एही होत अंतराई।।११।। "


अर्थात जब सेवा में बड़ाई और सम्मान की आकांक्षा आ जाती है, तब प्रियतम से दूरी बनने लगती है। इसलिए सच्ची सेवा वही है जिसमें करने वाला स्वयं पीछे हट जाए और सामने केवल जीवन-कल्याण रह जाए। आज के दान और सेवा के संदर्भ में भी यही कसौटी लागू होती है—सेवा का मूल्य प्रचार में नहीं, उस जीवन में है जो बचा।


तारतम वाणी आगे स्पष्ट करती है कि अनन्य प्रेम और सेवा के बिना न तो संसार की वास्तविकता समझी जा सकती है और न ही परम सत्य का साक्षात्कार हो सकता है। वह कहती है—


"जिन सुध सेवा की नहीं,

ना कछू समझे बात।

सो काहे को गिनावे आप साथ में,

जिन सुध ना सुपन साख्यात।।१।। "


यह चौपाई अध्यात्म की निष्क्रियता को अस्वीकार करती है। सेवा से दूर रहकर केवल नाम, पहचान या वाणी के आधार पर स्वयं को साधक मान लेना तारतम की दृष्टि में स्वीकार्य नहीं है। सेवा-विहीन भक्ति, भक्ति नहीं रह जाती—वह केवल आत्म-भ्रम बनती है।


तारतम यह भी सिखाती है कि सेवा का मूल प्रेम है, न कि चतुराई या खींचतान। इसलिए वह उस सेवा से सावधान करती है जो सुविधा, पद या नियंत्रण के लिए की जाए। इसके विपरीत, वह उस सेवा को श्रेष्ठ मानती है जो मौन हो, सरल हो और भीतर से उपजी हो—


"सेवा करे न जनावहीं,

अपनी आतम के कारन।

दिखावें नहीं काहू को,

समझावें अपना मन।।४९।। "


यह चौपाई सेवा के सर्वोच्च स्वरूप को प्रकट करती है—ऐसी सेवा जो दिखाई नहीं जाती, जो प्रचार नहीं खोजती, और जो केवल आत्म-शुद्धि के लिए की जाती है।


इतिहास भी इसी सत्य का साक्षी है कि सच्चा शौर्य तलवार में नहीं, सेवा में प्रकट होता है। जिसने सिर झुकाकर सेवा को अपनाया, वही वास्तव में नेतृत्व का अधिकारी बना। इसलिए तारतम वाणी आज भी उतनी ही जीवित और प्रासंगिक है। उसका संदेश सरल है—जब मन संकल्प और विकल्प के द्वंद्व में फँसे, तब सेवा चुनो। भक्ति को व्यवहार में उतारो। जहाँ जीवन बचे, वहीं धाम धणी प्रसन्न होते हैं। आज का छोटा-सा दान, आज की सच्ची सेवा, किसी के लिए पूरा जीवन बन सकती है—और हमारे लिए पूर्ण भक्ति।




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