‘अंश–अंशी’ से ‘अंग–अंगी’ की यात्रा तारतम वाणी के प्रकाश में आत्मा–परमात्मा का जीवंत एकत्व

'अंश–अंशी' से 'अंग–अंगी' की यात्रा

तारतम वाणी के प्रकाश में आत्मा–परमात्मा का जीवंत एकत्व

 

1. प्रस्तावना: बोध से अनुभूति की ओर

भारतीय तत्वदर्शन में आत्मा–परमात्मा के संबंध को समझाने के लिए सामान्यतः "अंश–अंशी" की भाषा प्रयुक्त होती है। यह भाषा बौद्धिक स्तर पर उपयोगी अवश्य है, परंतु तारतम ज्ञान साधक को यहीं रोकता नहीं। वह उसे इससे आगे बढ़ाकर "अंग–अंगी" के अधिक गहन, जीवंत और प्रेममय संबंध में प्रवेश कराता है—जहाँ आत्मा केवल भाग नहीं रहती, बल्कि परमात्मा की लीला का सचेत और जीवित अंग बन जाती है। आत्मा जब अंग या अंगना है, तब परमात्मा अंगी है—अर्थात् अंगों को धारण करने वाला, शरीर और शरीरी का अभिन्न आधार।

अंग–अंगी की निस्बत केवल भाग–संपूर्ण का संबंध नहीं, बल्कि एक ऑर्गैनिक (जैविक) रिलेशनशिप है, जहाँ आत्मा और परमात्मा का अस्तित्व, चेतना और क्रियाशीलता परस्परावलंबित होती है। यह संबंध उच्चतर स्तर की चैतन्य-एकता को प्रकट करता है, जिसमें किसी प्रकार के अलगाव का कोई अवकाश नहीं रहता।

तारतम वाणी के प्रकाश में श्यामा जी अक्षरातीत धामधनी की अर्धांगिनी तथा समस्त ब्रह्मसृष्टियों की प्रधान अंगना हैं। आत्माएँ प्रियतम से कभी पृथक नहीं होतीं; वे सदा उनके धाम–हृदय में अंतर्निहित रहती हैं। जब यह पहचान (मारिफ़त) प्रकट होती है, तब विरह असह्य हो जाता है, क्योंकि आत्मा के जीवन, चेतना और अस्तित्व का एकमात्र आधार प्रियतम ही हैं।

अंश–अंशी की लीला में अभी भी भेद की एक सूक्ष्म रेखा शेष रहती है, इसलिए उसे 'स्वलीलाद्वैत' नहीं कहा जा सकता। इसके विपरीत, अंग–अंगी का संबंध वही अवस्था है जहाँ आत्मा और परमात्मा अभिन्न रूप से एक-दूसरे में ही लीला करते हैं—और यही सच्चे अर्थों में स्वलीलाद्वैत की पहचान है। इस अवस्था में परमात्मा अपनी अंगरूप आत्माओं को अपना हृदय अर्पित कर उन्हें अखण्ड प्रेम में स्थिर करता है। यहाँ प्रेम–रस ही आत्मा का वास्तविक आहार है, जिसे धामधनी निरंतर प्रदान करते हैं। जो आत्मा इस प्रेम-विरह की तड़प से रहित रहती है, वह परमधाम की सच्ची अंगना नहीं कहलाती।

 

2. अंश–अंशी: भाग और संपूर्ण की सीमित समझ

अंश किसी संपूर्ण का भाग होता है—जैसे सागर की बूँद, सूर्य की किरण या ज्योति का कण।अंश, अंशी से उत्पन्न तो होता है, पर उसमें अंशी की पूर्ण सत्ता नहीं समाती। यहाँ एक सूक्ष्म दूरी बनी रहती है।

गीता का वचन— "ममैवांशो जीवलोके" इसी स्तर का संकेत देता है। आत्मा को परमात्मा का अंश माना गया है—स्वतंत्र चेतना के रूप में, पर पूर्ण स्वरूप के रूप में नहीं। यह बोध ज्ञान देता है, पर एकत्व का जीवंत अनुभव नहीं।

 

3. अंग–अंगी: अभिन्न, जीवित और अविभाज्य एकत्व

तारतम वाणी इस सीमा को तोड़ती है और आत्मा को "अंग" और अंगना कहती है। अंग–अंगी का संबंध यांत्रिक नहीं, जैविक और चेतन है। जैसे नेत्र शरीर का अंग है— शरीर से अलग होकर उसका कोई अर्थ नहीं। जीवन, अर्थ और क्रिया—सभी अंगी से ही प्रवाहित होते हैं। इसी प्रकार आत्मा, परमात्मा का अंग है— अलग सत्ता नहीं, बल्कि स्वरूप की जीवित अभिव्यक्ति। इसी सत्य को वाणी कहती है—

"सब सैयों मिने सिरदार, अंग याही के हम सब नार।

श्री धाम धनीजी की अरधंग, सब मिल एक सरूप एक अंग॥"

यहाँ आत्माएँ केवल "हिस्से" नहीं, बल्कि श्री धाम धनीजी के अर्धांग-स्वरूप में एक ही स्वरूप हैं।

 

4. अंग–अंगना का रहस्य: प्रेम में अद्वैत

तारतम वाणी में आत्मा को बार-बार अंगना कहा गया है— अर्थात् परमात्मा की अंतःसत्ता, उसकी हृदय-शक्ति। "रूह खसम की क्यों रहे, आप अपने अंग बिन।" अंगना, अंगी से अलग रह ही नहीं सकती। पहचान (मारिफ़त) हो जाने पर विरह असह्य हो जाता है—

"सोहागिन अंग जो पिउ की, पिउ सोहागिन अंग जिउ॥"

यहाँ कोई द्वैत नहीं बचता— प्रियतम और प्रिया परस्पर अंग बन जाते हैं।

 

5. पहचान का क्षण: भीतर विराजमान प्रियतम

तारतम दृष्टि का एक अत्यंत सूक्ष्म बिंदु यह है कि— प्रियतम आते-जाते नहीं। पहचान से पहले भी प्रियतम आत्मा के भीतर ही विराजमान थे। माया के आवरण से केवल बोध नहीं था। यही कारण है कि यह कहना— "धाम धनी परमधाम से आकर दर्शन देकर लौट जाते थे" तारतम दृष्टि से असंगत है। वे तो सदा ही आत्मा के धाम-हृदय में उपस्थित हैं—

"अर्स तुम्हारा मेरा दिल है, इत आए करो आराम।"

 

6. अंग–अंगी में प्रेम का संचार

अंग–अंगी संबंध केवल तात्त्विक नहीं, रसात्मक है।

"अंगना को अंग दीजिए, अंगना लीजे अंग।"

यह हृदय का आदान-प्रदान है— परमात्मा आत्मा को अपना हृदय देता है, और आत्मा अपना समर्पित हृदय उन्हें सौंप देती है। यह संबंध self-healing, चेतना-संचार और अखण्ड आनंद का स्रोत बनता है—

"जोगमायानी जुगत एहेवी, एक रस एक रंग।"

 

7. श्यामा जी / सुन्दरबाई: अंगत्व का पूर्ण आदर्श

तारतम वाणी में श्यामा जी (सुन्दरबाई) को अक्षरातीत की आनन्द-अंगना कहा गया है—

"श्री सुंदरबाई स्यामाजी अवतार, पूरन आवेस दियो आधार।"

वे कोई अलग सत्ता नहीं, बल्कि परमधाम की लीला में अभिन्न अंग-स्वरूप हैं। नाम, रूप और भाषा—ये सब मानवीय बोध के साधन हैं; परमधाम शब्दातीत और त्रिगुणातीत है।

 

8. परम परिणति: स्वलीला अद्वैत

महाप्रलय के पार, जब प्रकृति का लय हो जाता है—

"एक अद्वैत मंडल इत, धनी अंगना के अंग नित।"

यहाँ न अंश रहता है, न दूरी— केवल अंग–अंगी का अखण्ड स्वलीला अद्वैत।

 

9. निष्कर्ष: तारतम की दिशा

अंश–अंशी बौद्धिक आरंभ है, तो अंग–अंगी प्रेममय पूर्णता है। तारतम मार्ग साधक को भाग से संपूर्ण की ओर नहीं, बल्कि अभिन्न एकत्व की ओर ले जाता है— जहाँ आत्मा परमात्मा में विलीन नहीं होती, बल्कि उसकी लीला का सचेत, प्रेमपूर्ण और जाग्रत अंग बन जाती है। यही सुंदरसाथ की पूर्णता है।

तारतम वाणी आत्मा–परमात्मा के संबंध को केवल अंश–अंशी की सीमित समझ तक नहीं रोकती, बल्कि उसे अंग–अंगी के जीवंत और अभिन्न एकत्व में प्रतिष्ठित करती है। यह संबंध यांत्रिक नहीं, बल्कि जैविक और चैतन्यमय है, जहाँ आत्मा परमात्मा की लीला की दर्शक नहीं, बल्कि उसकी सचेत सहभागी अंग बन जाती है।

इस दृष्टि में श्यामा जी अक्षरातीत धामधनी की अर्धांगिनी तथा समस्त ब्रह्मसृष्टियों की प्रधान अंगना हैं। आत्माएँ प्रियतम से कभी पृथक नहीं होतीं; वे सदा उनके धाम–हृदय में अंतर्निहित रहती हैं। जब यह पहचान (मारिफ़त) प्रकट होती है, तब विरह असह्य हो जाता है, क्योंकि आत्मा के जीवन, चेतना और अस्तित्व का एकमात्र आधार प्रियतम ही हैं।

परमात्मा अपनी अंगरूप आत्माओं को अपना हृदय अर्पित कर उन्हें अखण्ड प्रेम में स्थिर करते हैं। यही अवस्था स्वलीलाद्वैत की है, जहाँ परमधाम का अद्वैत ही शेष रहता है। इस मार्ग में प्रेम–रस ही आत्मा का वास्तविक आहार है, जिसे धामधनी निरंतर प्रदान करते हैं। जो आत्मा इस प्रेम-विरह की तड़प से रहित रहती है, वह परमधाम की सच्ची अंगना नहीं कही जा सकती।

तारतम वाणी में 'अंग–अंगी' का संबंध

 

इन सार में कई सत सुख, सो मैं निरने करूँ निरधार।

ए सुख देऊँ ब्रह्मसृष्ट को, तो मैं अंगना नार।।५।।

प्रीतम मेरे प्राण के, अंगना आतम नूर।

मन कलपे खेल देखते, सो ए दुख करूं सब दूर।।।।१७।।

सब सैयों मिने सिरदार, अंग याही के हम सब नार।

श्री धाम धनीजी की अरधंग, सब मिल एक सरूप एक अंग।।७४।।

अंगना को अंग दीजिए, अंगना लीजे अंग।

पास देऊं पूरा प्रेम का, नेहेचल का जो रंग।।४२।।

मैं अंगे रंगे अंगना संगे, करूं आप अपनी बात।

अब बोलते सरमाऊं, ताथें कही न जाए निध साख्यात।।४३।

रूह खसम की क्यों रहे, आप अपने अंग बिन।

पर पकरी पिया ने अंतर, नातो रहे ना तन।।३।।

सोहागिन विरहा ना सहे, जब जाहेर हुए पिउ।

सोहागिन अंग जो पिउ की, पिउ सोहागिन अंग जिउ।।१६।।

अंगना को अंग दीजिए, अंगना लीजे अंग।

पास देऊं पूरा प्रेम का, नेहेचल का जो रंग।।४२।।

जोगमायानी जुगत एहेवी, एक रस एक रंग जी।

एक संगे रेहेवुं सदा, अंगना एकै अंग जी।।७।।

अंग आपी अंगनाने, अंगना भेलूं अंग।

पास दऊं पूरो प्रेमनो, करूं ते अविचल रंग।।४२।।

श्री सुंदरबाई स्यामाजी अवतार, पूरन आवेस दियो आधार।

ब्रह्मसृष्ट मिने सिरदार, श्री धाम धनीजी की अंगना नार।।१।।

इस्क सुराही ले हाथ में, पिलाओ आठों जाम।

अपनी अंगना जो अर्स की, ताए दीजे अपनों ताम।।३।।

मासूक तुमारी अंगना, तुम अंगना के मासूक।

ए हुकमें इलम दृढ़ किया, अजूं रूह क्यों न होत टूक टूक।।४५।।

दई बड़ाई मेरे दिल को, हक बैठे अर्स कर।

अपनी अंगना जो अर्स की, रूह क्यों न खोले नजर।।५।।

जो अंग होवे अर्स की, उपजत नहीं अंग आहे।

बारे हजार रूहन में, सो काहे को आप गिनाए।।४२।।

 

निष्कर्ष में तुलना:

 

विशेषता

अंश - अंशी

अंग – अंगी

संबंध प्रकार

भाग और संपूर्ण

अभिन्न अवयव और संपूर्ण

अस्तित्व स्वतंत्रता

अंश कुछ हद तक स्वतंत्र है

अंग स्वतंत्र नहींअंगी से अविभाज्य

अद्वैत का स्तर

सीमित अद्वैत; भेद कुछ अंश तक बना रहता

पूर्ण अद्वैतभिन्नता लुप्त

अनुभूति की गहराई

ज्ञान आधारित बोध

प्रेमभक्तिऔर एकता का साक्षात अनुभव

तारतम दृष्टि

जगत और परमधाम की समझ के लिए आरंभिक

परमधाम लीला और साक्षात्कार के लिए आवश्यक


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