तारतम वाणी के आलोक में कर्मकांड की सीमा और ज्ञान-विज्ञान की महिमा
तारतम वाणी के आलोक में कर्मकांड की सीमा और ज्ञान-विज्ञान की महिमा
यह लेख सरियत/शरीयत और कर्मकांड के स्वरूप, उद्देश्य और सीमाओं का विश्लेषण करता है तथा तारतम वाणी के प्रकाश में कर्मकांड, उपासना-कांड, ज्ञान-कांड और विज्ञान-कांड—अर्थात सरियत, तरिकत, हकीकत और मारिफत—की क्रमिक साधना को स्पष्ट करता है। इस दृष्टि में कोई भी पड़ाव निरुपयोगी नहीं है; सभी एक-दूसरे के पूरक हैं। बाह्य अनुशासन (सरियत/कर्मकांड) सामाजिक-नैतिक व्यवस्था और साधक के आरंभिक प्रशिक्षण के लिए उपयोगी है, पर उसे ही अंतिम सत्य मान लेना आध्यात्मिक भ्रांति बन जाता है। वास्तविक धर्म-परिणाम वही है जिसमें मनुष्य की चेतना करुणा, विवेक और सत्य-जीवन की ओर रूपांतरित हो। अन्यथा विधि-विधान, नियम-पालन और पहचान-आधारित गर्व—धर्म के "खोल" बनकर संघर्ष और भ्रम को बढ़ाते हैं।
1. परिचय
धार्मिक परंपराओं में मानव जीवन को अनुशासित करने के लिए विविध आचार-संहिताएँ विकसित हुईं। कर्मकांड का अर्थ केवल विधि-विधान नहीं, बल्कि वह संरचित धार्मिक व्यवहार है जो मूलतः स्मृति, नैतिकता और संयम की दिशा में मनुष्य को स्थिर करने के लिए रचा गया था। समस्या तब उत्पन्न होती है जब साधन ही साध्य बन जाए और चेतना का रूपांतरण पीछे छूट जाए। यह प्रवृत्ति किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है; लगभग सभी संगठित परंपराओं में यह दिखाई देती है—जहाँ नियम, पहचान और बाह्य पालन प्रधान हो जाते हैं और करुणा-विवेक का अंतःप्राण दुर्बल पड़ जाता है।
हिंदू परंपरा में कर्मकांड (यज्ञ, व्रत, संस्कार, पूजा) वेदों की कर्ममीमांसा-धारा से व्यवस्थित हुआ। इसका उद्देश्य जीवन-व्यवस्था था, किंतु जब वह फल-लालसा, यांत्रिकता या श्रेष्ठताबोध में सीमित होने लगा, तब संत-परंपरा (कबीर, नानक, दादू) और तारतम वाणी ने इसकी तीखी आलोचना की—क्योंकि बिना ज्ञान और अंतःशुद्धि के अनुष्ठान "रूप" रह जाते हैं, "रस" नहीं बनते।
यहूदी परंपरा में यही प्रवृत्ति हलाख़ा जैसी विधि-व्यवस्था में दिखती है; ईसाई परंपरा में संस्कारों की औपचारिकता बढ़ने पर सुधार आंदोलन उठा; बौद्ध परंपरा में बुद्ध ने "सील-ब्बत-परामास" (केवल नियम-व्रत में उलझ जाना) को बंधन कहा; और जैन परंपरा में बाह्य तप को भाव-शुद्धि से रहित होने पर अहंकारजनक माना गया। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि समस्या ritual या law की नहीं, बल्कि चेतना-विच्छेद की है।
2. कर्मकांड और सरियत/शरीयत: स्वरूप एवं उद्देश्य
कर्मकांड भारतीय धार्मिक परंपरा में यज्ञ, पूजा, संस्कार, व्रत और विधि-आधारित अनुष्ठानों का समुच्चय है। इसका केंद्रीय ढाँचा कर्म-फल, पात्रता और समय-नियमन पर टिकता है। इसका लाभ यह है कि यह आचरण को दिशा देता है और साधक में अनुशासन का अभ्यास कराता है।
सरियत/शरीयत इस्लामी परंपरा का विधिक-नैतिक ढाँचा है, जिसका मूल आशय "ईश्वरीय मार्ग" है—न्याय, संतुलन और आज्ञापालन। इसके अंतर्गत व्यक्तिगत, सामाजिक और न्यायिक जीवन के नियम आते हैं।
दोनों में समानता यह है कि ये बाह्य अनुशासन को प्राथमिक बनाते हैं। अंतर यह है कि कर्मकांड कर्म-फल और परंपरा-आधारित है, जबकि शरीयत अधिक विधिक-आज्ञात्मक रूप ग्रहण करती है। किंतु दोनों के भीतर एक ही जोखिम निहित है: जब बाह्य पालन को ही धर्म मान लिया जाए और अंतःशुद्धि गौण हो जाए।
3. भारतीय त्रिस्तरीय दृष्टि और सूफ़ी क्रम: कर्म–उपासना–ज्ञान तथा सरियत–तरिकत–हकीकत–मारिफत
यहीं भारतीय चेतना की त्रिस्तरीय यात्रा और इस्लामी-सूफ़ी क्रम का गहरा साम्य स्पष्ट होता है। भारतीय दर्शन जीवन को शरीर-मन-चेतना की परतों में पढ़ता है। कर्मकांड शरीर और समाज की मर्यादा रचता है—यह खेत की जुताई है। उपासना मन को एकाग्र करती है—दीपक की लौ को स्थिर करना। ज्ञान चेतना का उलटाव है—"मैं कौन हूँ?" का मौन उत्तर। इसी क्रम को तारतम वाणी सरियत → तरिकत → हकीकत → मारिफत के रूप में व्यक्त करती है। सरियत/कर्मकांड देह-मन का प्रशिक्षण है; तरिकत/उपासना भाव-केंद्रित साधना; हकीकत सत्य का प्रत्यक्ष बोध; और मारिफत वह अवस्था है जहाँ प्रेम में साधक स्वयं को भूल जाता है।
4. हकीकत और मारिफत: बाह्य से आंतरिक की निर्णायक छलाँग
तारतम वाणी का केंद्रीय प्रतिपादन यह है कि बाह्य अनुशासन तभी सार्थक है जब वह हृदय को मजाजी से मोमिन की ओर ले जाए। अन्यथा साधक "पुल-हद" (सीमा-पुल) पर अटक जाता है।
"दिल मजाजी दुनी सरियत, सो सके ना पुल हद भान। याको तोड़ उलंघे ले हकीकत, जो दिल मोमिन अर्स सुभान॥"
अर्थात—मजाजी दिल नियमों में ही उलझा रहता है; मोमिन दिल सीमा को तोड़कर हकीकत में प्रवेश करता है। अर्स-सुभान कोई बाहरी सिंहासन नहीं, बल्कि शुद्ध अंतर-चेतना है।
इसी संदर्भ में तारतम वाणी "दज्जाल" का रूपक प्रस्तुत करती है—जो किसी व्यक्ति से अधिक अज्ञान, अहं और कट्टरता की व्यवस्था है। जब नियम ही परम बन जाते हैं, तब धर्म सत्ता, भय और आरोप का औज़ार बन जाता है। तब "धर्म-रक्षा" भी धर्म-विरोध बन जाती है।
5. क्रम-तालिका: साधना का रूपांतरण
| क्रम | अवस्था | उद्देश्य | साधक की स्थिति |
| 1 | सरियत/कर्मकांड | नैतिक-सामाजिक अनुशासन | हृदय मजाजी |
| 2 | तरिकत/उपासना | मन-एकाग्रता, भाव-शुद्धि | संक्रमण अवस्था |
| 3 | हकीकत/ज्ञान | सत्य का प्रत्यक्ष बोध | हृदय मोमिन |
| 4 | मारिफत/विज्ञान | प्रेम में परम-स्थिरता | पूर्ण जागृति |
धारा: बाह्य अनुशासन → अंतः अनुभूति → आत्म-प्रकाश
6. सार्वभौमिक निष्कर्ष: विधि बनाम चेतना
धर्मों के इतिहास में rituals और कानून आवश्यक रहे हैं, पर वे सेतु हैं—गंतव्य नहीं। यदि विधि मनुष्य को अधिक करुणामय और विवेकी बनाती है, तो वह धर्म है; यदि वही विधि पहचान, भय और श्रेष्ठताबोध को बढ़ाती है, तो वह धर्म का खोल मात्र रह जाती है।
शरीयत और कर्मकांड सामाजिक-नैतिक अनुशासन के लिए उपयोगी हैं, पर उन्हें ही परम सत्य मान लेना आध्यात्मिक भ्रांति है। वास्तविक उन्नति तब संभव है जब साधक बाह्य अनुशासन के पार जाकर हकीकत और मारिफत की ओर बढ़े—जहाँ धर्म का केंद्र भय नहीं, मेहर/करुणा हो।
तारतम वाणी का सार्वभौमिक संदेश यही है: धर्म पहचान नहीं, परिणाम है। जो साधना मनुष्य को अधिक मानवीय, अधिक जागरूक और अधिक करुणामय बनाती है—वही जीवित धर्म है।
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