सुन्दरसाथ” के लिए प्रेरणा: छाया से लड़ना नहीं, उसे पहचानकर धनी की तरफ़ लगाना ही जागृति का मार्ग है
```"सुन्दरसाथ" के लिए प्रेरणा: छाया से लड़ना नहीं, उसे पहचानकर धनी की तरफ़ लगाना ही जागृति का मार्ग है~।~~```
🌗 छाया को धनी की तरफ़ लगाना
तारतम-वाणी के "आत्मा–जीव–गुणों" संवाद (प्रकाश हि २०) के आधार पर
हम अक्सर सोचते हैं कि अध्यात्म का अर्थ है—कुछ ऊँचे अनुभव, कुछ मीठे शब्द, कुछ अनुशासन और कुछ सेवा। पर बहुत बार भीतर की वही पुरानी "छाया" (Shadow)—अहंकार, आलस्य, मोह, लोभ, शर्म, भोग-तृष्णा, भ्रम—इन सबको छिपाकर व्यक्ति आगे बढ़ता रहता है। परिणाम यह होता है कि बाहर भक्ति दिखती है, पर भीतर प्रतिक्रिया चलती रहती है; बाहर सेवा होती है, पर भीतर मान-अपमान की भूख जागती रहती है; बाहर ज्ञान की चर्चा होती है, पर भीतर "मैं सही हूँ" का सूक्ष्म घमंड बैठा रहता है। यही कारण है कि तारतम-वाणी छाया को केवल दोष नहीं मानती—वह उसे "पहचान की परीक्षा" मानती है। क्योंकि जब तक छाया पहचानी नहीं जाती, तब तक वही हमें चला रही होती है। और जब छाया धनी की तरफ़ लगने लगती है, तब वही गुण साधना के सहयोगी बन जाते हैं।
इसी सत्य का एक अत्यंत जीवंत चित्र हमें उस संवाद में मिलता है जहाँ आत्मा अपने ही भीतर बैठे गुणों और अवगुणों से सीधे बात करती है। यह कोई बाहरी उपदेश नहीं, बल्कि भीतर का "प्रामाणिक कोर्ट-रूम" है—जहाँ आत्मा साक्षी नहीं रहती, बल्कि जागरण की घोषणा करती है। वह बुद्धि को झकझोरती है—"अब तक आगे होकर भी तूने ज्ञान-रूपी न्यामत क्यों नहीं ली?" और बुद्धि जागकर कहती है—"अब तो मैं बुद्धि का अवतार हूँ; धनी के चरणकमल हृदय में आ गए हैं।" यहाँ संदेश स्पष्ट है: जागरण केवल भावुकता नहीं, बुद्धि का जागना भी है—ऐसी बुद्धि जो माया और ब्रह्म के भेद को पहचानकर पार का द्वार खोल दे।
फिर आत्मा "कान" को पुकारती है—क्योंकि धनी के वचन सुने गए, पर ग्रहण नहीं किए गए। कान स्वीकार करता है कि अब नींद में नहीं रहेंगे; प्यारी वाणी को ऐसे ग्रहण करेंगे कि सब धन्य-धन्य कहें। यह वही मनोविज्ञान है जिसे आज की भाषा में हम कहते हैं: "सुनना" और "समझना" अलग हैं। सूचना बहुत है, पर ग्रहण नहीं। धनी की तरफ़ लगना मतलब—सिर्फ़ सुनना नहीं, भीतर उतरने देना।
इसके बाद आत्मा नींद को कठोर शब्दों में पकड़ती है—क्योंकि नींद ने सब गुणों पर परदा डाल दिया, और अखंड वाणी से जीव को वंचित रखा। नींद मान लेती है: "मैं तब तक हूँ, जब तक तुम जाग्रत नहीं।" यह वाक्य आज के युवाओं की भाषा में एक बड़ा सूत्र बन जाता है—अवचेतन की छाया तब तक चलती है, जब तक चेतना जागती नहीं। यानी shadow work का पहला कदम "लड़ना" नहीं, "जागना" है। जैसे ही जागरण आता है, छाया का स्वामित्व टूटने लगता है।
फिर अरुचि, अनिच्छा, मौन, लोभ-लालच, तृष्णा, मोह, हर्ष-शोक, मद-मत्सर-अहंकार—एक-एक करके वे सभी शक्तियाँ सामने आती हैं जो मनुष्य को भीतर से बाँधती हैं। आश्चर्य यह नहीं कि आत्मा उन्हें डाँटती है; आश्चर्य यह है कि डाँट का लक्ष्य किसी को "ख़त्म" करना नहीं, बल्कि दिशा बदलवाना है। तारतम-वाणी का छाया-ज्ञान यही है: गुण-अवगुण को मारना नहीं; उसे धनी की तरफ़ लगाना है। यही कारण है कि जब आत्मा तृष्णा को कहती है "तू बड़ी कठोर है", तब उत्तर आता है—"अब तुमने मुझे अखंड आधार का दर्शन करा दिया है; अब मैं धनी को नहीं छोड़ूँगी।" यहाँ छाया का "detox" नहीं, "conversion" हो रहा है—ऊर्जा वही है, दिशा बदल गई।
यह संवाद आज के "Shadow Work" की भाषा में एक क्रांतिकारी बात कह देता है: भीतर जो भी शक्ति है—क्रोध, तृष्णा, मोह, मान—वह मूलतः ऊर्जा है। समस्या ऊर्जा नहीं; समस्या दिशा है। जब वही ऊर्जा माया की ओर जाती है, तो बंधन बनती है। जब वही ऊर्जा धनी की ओर लगती है, तो सेवा बन जाती है। आधुनिक मनोविज्ञान इसे "projection integration" कहेगा; तारतम इसे "गुणों को धनी की तरफ़ लगाना" कहता है। अंतर शब्दों का है, सत्य एक है।
इसका सबसे सुंदर फल तब प्रकट होता है जब सभी गुण मिलकर मान लेते हैं कि दोष "मालिक जीव" का ही रहा—क्योंकि जीव जागा नहीं था। यह स्वीकार हमें दोषारोपण से बाहर निकालता है। छाया का अर्थ यह नहीं कि "मेरे भीतर बुराई है"—छाया का अर्थ यह है कि मेरे भीतर जागरण का काम अधूरा है। और जैसे ही जागरण शुरू होता है, वही गुण—जो कल तक गिराते थे—आज उठाने लगते हैं। हर्ष और शोक तक कह देते हैं कि अब हमारा हर्ष सेवा में होगा, और सेवा न हो पाने पर शोक होगा। यानी भावनाएँ मिटती नहीं, परिष्कृत होती हैं।
यहीं से सुन्दरसाथ के लिए प्रेरणा का केंद्रीय संदेश निकलता है: आध्यात्मिक जीवन का लक्ष्य "निर्दोष दिखना" नहीं, बल्कि "जाग्रत होना" है। "धनी की महिमा" केवल गाने की चीज़ नहीं; वह भीतर की छाया को पहचानने की रोशनी है। जब आत्मा कहती है कि धनी तो नदी के प्रवाह के समान ज्ञान दे रहे थे, पर मैंने चित्त देकर सुना ही नहीं—तो यह हर साधक की ईमानदार स्वीकारोक्ति बन जाती है। हमारा बड़ा नुकसान अज्ञान नहीं, बल्कि अवधान-हीनता है—कान सुनते हैं, पर चित्त नहीं सुनता। और आज के समय में यही अवधान-हीनता फोन-स्क्रॉल, रील-लत, तुलना, मान्यता की भूख के रूप में और तेज़ हो गई है।
इसलिए सुन्दरसाथ के लिए व्यावहारिक शिक्षा यह है कि हर दिन के ट्रिगर को "दोष" नहीं, "दर्पण" समझें। जो irritate करता है, वह shadow है; जो अत्यधिक attract करता है, वह golden shadow है। पर तारतम का अगला कदम और भी गहरा है: उस shadow को धनी की तरफ़ लगाओ। क्रोध उठे तो उसे धनी की जय-जयकार में बदलो—अर्थात् क्रोध की ताक़त को सत्य-रक्षा और सेवा में लगाओ। तृष्णा उठे तो उसे अखंड रस की चाह में बदलो—अर्थात् भोग की भूख को परमानंद की प्यास में ढालो। मोह आए तो उसे "धनी-लगन" में बदलो—अर्थात् चिपकाव को प्रेम में रूपांतरित करो। शर्म आए तो उसे "लोक-लाज" की बेड़ी नहीं, बल्कि भीतर की विनम्रता बनाओ—जो धनी से जोड़ दे, लोगों से डराकर तोड़ न दे।
अंततः, यह पूरा संवाद हमें एक बहुत कोमल और शक्तिशाली बात सिखाता है: छाया शत्रु नहीं, संदेशवाहक है—यदि आत्मा जागी हो। और जब आत्मा जागती है, तो वह अपने ही गुणों को डाँटती भी है, समझाती भी है, दिशा भी देती है—और उन्हें सहयोगी बनाकर जीव को धनी के मार्ग पर ले आती है। यही "छाया-केंद्रित साधना" है—जो न आत्म-घृणा है, न आत्म-गौरव; बल्कि आत्म-परिचय है।
सुन्दरसाथ की प्रेरणा यही है: जीव को दोष देकर छोड़ना नहीं, जीव को जगाना है। और जगाने का सबसे विश्वसनीय रास्ता यही है—अपने भीतर बैठे गुणों-अवगुणों से ईमानदार संवाद, और फिर उन्हें धनी की तरफ़ लगाना। जब यह होता है, तब साधना केवल नियम नहीं रहती—वह जागनी-विधि बन जाती है। और तब जीवन का हर ट्रिगर—घर में, समूह में, सोशल-मीडिया पर—शत्रु नहीं, गुरु बन जाता है; क्योंकि अब छाया पर प्रकाश पड़ चुका है।
सदा आनंद मंगल में रहिए
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